शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

सुरेन्द्र बोथरा ’मनु’ की कविता - तनहाई

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विश्व वृद्ध-जन दिवस के अवसर पर विशेष

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तनहाई

 

आज मेरी तनहाई

मुझसे पूछे है वो कहाँ गये,

अपनेपन का दावा करते

वो बेगाने कहाँ गये ?


आये तब मेले लाये थे

पर जाना है मेरे साथ,

जनम-जनम का साथ

निभाने वाले बोलो कहाँ गये ?


एक समय आनन्द बहुत था

सपने सब सच होते थे,

उलझी ज़ुल्फें, मादक नयना,

बाँके चितवन कहाँ गये ?


बहुत दिनों की बात है

झोली भर कर सपने लाया था,

अब बैठा सोचा करता हूँ

सब के सब वो कहाँ गये ?


तब ललाट की सलवट से

तनहाई मेरी बोल उठी,

नश्वर में अक्षर बैठा है

दोनों ही कब कहाँ गये ?


पुष्ट करो तुम उस अंकुर को

जो धरती से फूट रहा,

काल-अकाल निगल ले जिनको,

क्यों सोचो कब कहाँ गये ?


अनुभव के पल-पल को चुन-चुन

संचित कर लो मेरे पास,

रीत-रीत कर बीत गये जो

उनका क्या, कब कहाँ गये ?

 

सुरेन्द्र बोथरा,  email— surendrabothra@gmail.com

-- 
Surendra Bothra
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