सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

दीपक आचार्य का आलेख - निभाएं दायित्व दिवंगतों के प्रति

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आज सर्वपितृ अमावास्या है।

यह दिन याद दिलाता है हमें अपने पूर्वजों की, उनके प्रति निभाए जाने वाले अपने उत्तरदायित्वों की।

ये पारिवारिक दायित्व उस परंपरा का हिस्सा हैं जो एक पीढ़ी अपने से पहले वाली पीढ़ियों के कल्याण और गति-मुक्ति के लिए निभाती रही है।

इस दृष्टि ये यह परंपरा शाश्वत और सनातन प्रवाह का अपना एक अहम् हिस्सा है।

जो पुरानी पीढ़ियां अब तक करती रहीं, उनका निर्वाह भी करने में अब हमें मौत आती है।

 

श्राद्ध का पूरा पखवाड़ा आज समाप्त हो रहा है।

हमारे यहां हर मामले में कितनी सहजता है इसका अंदाजा हर अवसर पर लगाया जा सकता है।

जो लोग तिथियों पर कुछ नहीं कर पाए, जिन्हें अपने परिजनों की श्राद्ध तिथियों का भान नहीं है अथवा नहीं कर पाए हैं उनके लिए आज का दिन सर्वसुलभ अवसर के रूप में हमारे सामने है।

कुछ अनास्थावादी और नास्तिक लोग इसे स्वीकार न भी करें तब भी भारतीय परंपराओं को आत्मसात कर उनके मुताबिक जीने और परंपराओं का निर्वाह करने वाले लोग ही हैं जिन्होंने भारत को विश्व गुरु के रूप में पूरी दुनिया में मनवाया और संसार भर में ज्ञान-विज्ञान का परचम लहराया।

परंपराओं के निर्वाह में कहीं कोई शिथिलता बरतना अपने आप में बेमानी है लेकिन जो लोग परंपराओं का निर्वाह श्रद्धापूर्वक करते हैं उन्हें इसका प्रतिफल और आत्मतोष अवश्य प्राप्त होता है।

यही कारण है कि हमारी संस्कृति और परंपराएं आज भी जीवन्त हैं, उनके प्रति श्रद्धा का ज्वार हमेशा लहराता रहा है।

हम सभी के दायित्व सभी के प्रति हैं।

हर वर्तमान  भूत के प्रति भी जवाबदेह होता है और वर्तमान के प्रति भी।

 

जो दोनों के प्रति संवेदनशील और वफादार होता है वह संतुलित जीवन पाता है और उसके जीवन में बहुविध संतुलन बना रहता है।

आज मौका है श्रद्धा अभिव्यक्त करने का।

श्राद्ध अपने आप में श्रद्धा का ही दूसरा नाम है। 

इसमें जितनी अधिक श्रद्धा होगी उतना अधिक पुण्य प्राप्त होगा वहीं अपने पितरों का आशीर्वाद भी प्राप्त होगा।

आज के दिन श्राद्ध के नाम पर जो कुछ होता है उसका लाभ सभी प्रकार के पितरों को प्राप्त होता है।

इस दृष्टि से यह जरूरी है कि हम आज के दिन चूके नहीं, ज्यादा न कर सकें तो कुछ सूक्ष्म परिमाण में ही कर लें।

 

हमारे अपने जीवन में बहुत सारे अवसर आते हैं जब हमें उस तिथि विशेष के लिए निर्धारित कर्म करने चाहिएं। इसमें तिथि व समय का महत्व होता है और उसी में निर्धारित कर्म करने पर उसका लाभ एवं आनंद प्राप्त होता है।

श्राद्ध भी उन्हीं में एक है जिनमें हमें वह सब कुछ करना चाहिए, जो पुरखों के निमित्त है।

हम सभी को गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि हम यदि हमारे पूर्वजों के प्रति वफादारी नहीं निभाते हैं तो हमारी आने वाली पीढ़ी भी हमारा ही अनुकरण करने वाली है।

आजकल पारिवारिक संस्कारों और परंपराओं के मामले में यही सब कुछ हो रहा है। 

 

हममें से बहुत सारे लोग ऎसे हैं जो कि परंपरा निर्वाह में ढीले या उदासीन हैं और बहुत से ऎसे हैं जो इनमें विश्वास नहीं रखते हैं।

जिन लोगों का विश्वास परंपराओं और संस्कृति में नहीं है उन लोगों का अपने आप पर भी कभी विश्वास नहीं हो सकता। 

चाहे जो हो, हमारी संस्कृति, हमारी परंपराएं और हमारी आस्थाएं आज भी वैज्ञानिक हैं और इनका अनुसरण करना हमारा कर्तव्य।

समय का पूरा-पूरा उपयोग करें और हर अवसर के अनुरूप अपने गुरुतर दायित्वों को निभाएं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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