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मनीषा पांडेय का संस्मरण - दो रुपए की मेरी पहली कमाई

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मां को कितना अच्‍छा लगता है मेरे बचपन के बारे में बात करना। ये बताना कि जब छोटी थी तो मैं क्‍या-क्‍या करती थी।
इस बार घर पर यूं ही बातों-बातों में मां ने पूछ लिया, अब तुम पेंटिंग नहीं करती न।
बिलकुल नहीं। कभी नहीं।
क्‍यों छोड़ दिया।
पेंटिंग ने मुझे छोड़ दिया।
तुम्‍हें याद है, अपनी पहली पेंटिंग एक्जिबिशन।
हां याद है, और ये भी कि कितनी डांट पड़ी थी उसके लिए।


और फिर मां ने वो बात याद दिला दी। मेरी नहीं, हमारी पहली पेंटिंग एक्जिबिशन और मेरे जीवन की पहली कमाई।


तब मुझे जीवन में सिर्फ दो-तीन कामों से ही प्‍यार था। दिन भर चित्र बनाना, कागज, दफ्ती, पन्‍नी काटकर कुछ-कुछ हैंडीक्राफ्ट करना और नाचना


मुझे स्‍कूल से ड्रॉइंग के अलावा और किसी सब्‍जेक्‍ट में कभी होमवर्क नहीं मिलता था। ऐसा मां बताती हैं।


तब मैं पांचवी क्‍लास में थी। मई का महीना था। गर्मियों की छुट्टियां चल रही थीं। स्‍कूल बंद और दिन-रात धुंआधार पेंटिंग चालू। फिर एक दिन मैंने और अपर्णा से सोचा कि हमें अपनी पेंटिंग एक्जिबिशन लगानी चाहिए। हम अपनी कला को लेकर काफी गंभीर थे और चाहते थे कि दुनिया भी इसके बारे में जाने।


फिर क्‍या था। ड्रॉइंग बुक के सारे पन्‍ने करीने से फाड़कर अलग किए गए। कोई चित्र गणित की धारीदार पन्‍नों वाली कॉपी में बना था तो कोई अंग्रेजी की तीन धारियों वाली कॉपी में। ढेर सारे ए फोर साइज के पन्‍नों पर बने चित्र थे। इलाहाबाद में एलन गंज में शिक्षा विभाग का ऑफिस हुआ करता था। हम दोनों अपनी सारी पेंटिंग लेकर वहां पहुंच गए। दो पेड़ों के बीच एक चादर बांधी रस्‍सी से और पेपर पिन से अपनी सारी पेंटिंग उस पर साट दी। पेपर पिन वो लाई थी। चादर मैं घर से चुपके से उठाकर ले गई थी। मम्‍मी को दूर-दूर तक हमारी हरकतों की कोई खबर नहीं थी। उन्‍हें सिर्फ ये पता था कि मैं अपर्णा के घर पर हूं। बीच-बीच में वो अपने घर से कुछ खाने की चीज चुराकर ले आती। रोटी में सब्‍जी डालकर, उसका रोल बनाकर, फ्रॉक में छिपाकर।


अब दोनों बारी-बारी से ऑफिस में जाकर वहां काम कर रहे लोगों को बोल भी आए कि हमारी एग्जिबिशन लगी है। आप लोग आइए देखने। दिन भर बड़ी उम्‍मीद से हम दोनों वहां बैठे रहे। बीच-बीच में वहां से गुजरते हुए कोई देख लेता। कहता, बच्‍चों तुम लोग इतनी धूप में बाहर क्‍या कर रहे हो। कोई बिना देखे गुजर जाता। इसके अलावा कोई खास प्रतिक्रिया नहीं। हमने हर आते-जाते व्‍यक्ति से कहा कि हमारी पेंटिंग देखिए। लेकिन किसी ने कोई तवज्‍जो नहीं दी। हम सब्‍जी रोटी का रोल खाते, फ्रॉक से नाक पोंछते वहीं बैठे रहे।


फिर शाम होते-होते एक कपल आया। वो दोनों उसी ऑफिस में काम करते थे। दोनों हमें देखकर प्‍यार से मुस्‍कुराए थे और काफी देर पेंटिंग देखते रहे थे। उन्‍होंने चार पेंटिंग खरीदी।
उन्‍होंने मेरी एक पेंटिंग पसंद की। पूछा कितने की।
मैंने कहा- दो रुपए।
उन्‍होंने हम दोनों की दो-दो पेंटिंग ली और हमें कुल आठ रुपए दिए।


शाम ढल रही थी। दुकान उठाने का समय हो चुका था। लेकिन तभी दूर से मेरी और अपर्णा की मम्‍मी आती दिखाई दीं। उन्‍हें किसी ने खबर कर दी थी। छोटे शहरों में घर के बगल में हो रही कोई बात छिपती है भला।


दोनों चली आ आ रही थी गुस्‍से में लाल-पीली हुई। धुनाई करने की मुद्रा में। अपर्णा की मम्‍मी ज्‍यादा गुस्‍सैल थीं। उसे दो झापड़ रसीद किए। मेरी मां मार-पिटाई में कभी एक्‍सपर्ट नहीं रहीं। वो सिर्फ गुस्‍सा हुईं। हाथ नहीं उठाया। फिर मैंने उन्‍हें अपनी मुट्ठी में चिमटे हुए, पसीने में भीगे दो-दो रुपए के दो नोट दिखाए और कहा, मेरी दो पेंटिंग बिकी है।


मां ने बस प्‍यार से देखा और कहा, चलो अब घर चलकर पेंटिंग करना। बहुत शाम हो गई।
हम घर लौट आए। मां ने उस शाम मेरा फेरवेट सूजी का हलुआ बनाया।

(मनीषा पांडेय के फ़ेसबुक वाल से साभार)

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