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दीपक आचार्य का आलेख - हम सब रावण हैं

हम सब रावण हैं

 

कहने, दिखाने और सुनाने को आज हम सारे के सारे बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय, रावण पर राम की विजय, असत्य पर सत्य, अन्याय पर न्याय, अधर्म पर धर्म की विजय और ऎसे ही जाने कितने आदर्शवादी और सिद्धान्त दर्शाने वाले जुमलों का इस्तेमाल करते हुए अपने आपको महान सिद्ध करने के लिए आतुर बने रहें लेकिन असल में हम सब इसके विपरीत ही हैं।

बातें तो हम अच्छी-अच्छी, लुभावनी और मीठी-मीठी करते हुए सभी को भ्रमित करने में सिद्ध हैं लेकिन आचरण के मामले में हर प्रकार से विरोधाभासी हैं।

विजयादशमी या दशहरे के दिन संदेशों और भाषणों से लेकर खबरों तक में सभी जगह यही सब कुछ देखने-पढ़ने और सुनने को मिलता है लेकिन इन वाक्यों की हकीकत क्या है, इसे जानने की पड़ताल करें तो हम हैरान रह जाएं।

हैरत की बात यह कि ऎसे-ऎसे लोग ये बातें इस तरह की बातेंं करते हैं, जिनके भीतर रावणत्व ठूंस-ठूंस कर भरा हुआ है।  वे लोग रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाते हैं जो इन्हीं असुरों के स्वभाव वाले हैं, इन्हीं असुरों की परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं, उन्हीं की तर्ज पर सारे काम-काज और व्यवहार कर रहे हैं जो राक्षस करते रहे हैं।

इस मामले में आज के इन लोगों का कहना ही क्या, जो कि राक्षसों से भी सौ कदम आगे निकल चुके हैं। असुरों की भी अपनी कोई नीतियों और नियम हुआ करते थे जिनका पालन करना वे कभी नहीं भूलते।

आज के ये लोग तो सारे कायदे-कानूनों और मर्यादाओं को तिलांजलि देकर फ्री-स्टाईल व्यवहार करने लगे हैं, हर तरह से उन्मुक्त और स्वेच्छाचारी जीवन जीने लगे हैं। इनसे अपने लोग भी दुःखी हैं और दूसरे लोग भी।

उन्हीं की बात क्यों करें, हम लोग भी उन्हीं की परंपराओं में किसी न किसी रूप में सहभागी बने हुए हैं। जो भी इस किस्म के लोगों के सहयोगी हैं, किसी भी प्रकार से सहयोग करते हैं, उनके कुकर्मों और दुराचारों को चुपचाप देखते रहते हैं, अपने स्वार्थ या नाजायज कामों को पूरा करने-कराने के लिए ऎसे लोगों का जयगान करते हैं, ऎसे लोगों का मिथ्या प्रचार या महिमा मण्डन करते हैं, इनके नाम पर कमाई करते हैं, अपने चमड़े के सिक्के चलाते हैं, वे सारे के सारे लोग भी राक्षसी परंपरा के संवाहक ही माने जाने चाहिएं।

आज के माहौल में संवेदनहीनता, अन्याय-अत्याचार, दुराचार, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, मुनाफाखोरी, जमाखोरी, आतंकवाद और दूसरे सारे कुकर्म इतनी अधिक संख्या में देखे जा रहे हैं कि इन्होंने रावणकाल को भी बौना सिद्ध कर दिया है। उस जमाने में सिर्फ एक ही रावण था। आज हर तरफ रावण ही रावण दिखाई दे रहे हैं। किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जिसे देखों उसके कर्म, शक्ल और व्यवहार में रावण झलकता है।

और हम हैं कि इन कर्मों में लिप्त रावणी परंपरा के लोगों को किसी न किसी प्रकार से सहयोग कर ही रहे हैं। और कुछ नहीं तो ऎसे लोगों को हम झुक कर अभिवादन करते हैं, इनसे हाथ मिलाते हैं, इनके पाँव छूकर श्रद्धा अभिव्यक्त करते हैं, यह सब कुछ पाप ही है।

इससे राक्षसी परपंरा के लोगों का अहंकार पुष्ट होता रहा है और उन्हें लगता है कि उनकी अधीनता स्वीकार करने वालों की कोई कमी नहीं है। यह अहंकार ही उन्हें आसमान की ऊँचाइयों पर पहुंचा कर जमाने भर में अन्याय का प्रेरक बना रहता है।

रावण को दोष न दें, अपने भीतर देखें, अपने आपको जानने की कोशिश करें, खुद को महसूस हो जाएगा कि हमारे भीतर जो बुराइयां हैं उनसे तो यही सिद्ध होता है कि हमसे तो रावण अच्छा था। कम से कम उसमें बुद्धिमत्ता, राष्ट्रभक्ति और अपने देशवासियों के संरक्षण और विकास का माद्दा कूट-कूट कर भरा हुआ था। हम तो बिना सामथ्र्य या बौद्धिक क्षमताओं के फालतू के अहंकारी बने विघ्नसंतोषी अवस्था पा गए हैं।

कुंभकर्ण को भी गलत न मानें।  वह तो खान-पान में ही अजीब था। आजकल के कुंभकर्ण तो सब कुछ उदरस्थ कर जाते हैं और डकार भी न लें। इतना सारा हजम कर डालने के बाद भी मरते दम तक भूखे और प्यासे बने रहते हैं।

बुराइयां हम सभी में हैं, और जिन चंद लोगों में बुराइयों का अभाव है वे मूकद्रष्टा और नपुंसक बने हुए द्रष्टा भाव को अपना चुके हैं, कुछ करना नहीं चाहते, न उनमें इतना स्वाभिमान या साहस ही  बचा है कि वे कुछ कर पाएं। ज्यादातर लोग या तो किसी भी स्वार्थ या कीमत पर बिकने वाले हैं अथवा जो कुछ मिले, उसे ओने-पौने भाव में बेच डालने के आदी हैं।

दशहरा पर्व हम सभी के लिए आत्मचिन्तन दिवस के रूप में सामने है। हम सभी इस बात को सोचें कि रावण हमसे खराब क्यों था, हम रावण से अच्छे कैसे हैं। हम सभी ईमानदारी से चिन्तन करें तो अपनी आत्मा से एक ही वाक्य निकलेगा, और वह होगा - हम सब रावण हैं। इस रावण का खात्मा किए बगैर रावण दहन और दशहरा मनाना बेमानी है।

कोरी औपचारिकता का निर्वाह हम अर्से से कर रहे हैं लेकिन रावण और दूसरे सारे राक्षस अमर होकर और भी अधिक विकृत और विस्तार रूप में हमारे भीतर घुसते जा रहे हैं। बाहर के रावणों को इज्जत देना छोड़ें, उनका संहार करें। और भीतर के रावण को भस्मीभूत करें। रामत्व की प्राप्ति के लिए यही एक सूत्र है।

विजयादशमी पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ...।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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