आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - कलमकुटौव्वल

पुरस्कार वापस करने के हल्ले में भगत जी भी शामिल हो गये हैं। उन्होंने जिला लेखक संघ के अध्यक्ष को पत्र लिखकर जता दिया है कि 'जिला साहित्यश्री' का सम्मान और साथ में मिले ग्यारह सौ रुपये वापस कर रहे हैं। यह कदम उन्होंने अपनी आत्मा की आवाज पर किया है इसके लिए किसी दूसरे की आत्मा को दोषी न माना जाये। वर्त्तमान समय में जिस प्रकार लेखकों की आवाज को सुनने वाला कोई नहीं है ऐसे में उनके पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था। अखबारों में नाम आया।

उनके इस कदम से सबसे ज्यादा चिढ़े अलबेला जी क्योंकि उन्हें आज भी लगता है कि साहित्यश्री सम्मान के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार वही थे। भगत जी ने जिला अध्यक्ष से अपनी रिश्तेदारी खोज निकाली और सम्मान ले उड़े। अलबेला जी ने बयान दिया कि भगत जी उन दिनों कहां थे जब देश सिख दंगों की चपेट में आ गया था। उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी के समय क्यों नहीं सम्मान वापस किया ? कलकत्ता में तस्लीमा नसरीन का अपमान हुआ तो उन्होंने सम्मान वापस क्यों नहीं किया ? अलबेला जी के इस बयान ने भगत जी के लिए अमृत का काम किया क्योंकि दोनों ओर के सक्षम आलोचक चिल्लाने लगे। फेसबुक, टिवटर, वाट्सप इत्याद पर चिल-पों मच गई। भगत जी को गालियां दी जाने लगीं। उघर अलबेला जी के पुरखों को सलामी देने वाले भी कम नहीं थे। जिलाध्यक्ष साहित्य संघ के अध्यक्ष में दोनों को बुलाया-

-'' भाई, भगत जी आपने यह अच्छा नहीं किया। यही पुरस्कार है जिसके लिए अपने इतनी गोटियां सेट की थीं। गुठली चूस ली तो फेंक दिया। उन दिनो तो आपका नाम खूब चमका था जब सम्मान मिला था। सीना आपका भी छप्पन ईंच का हो गया था।''

-'' वही तो सर, मैं वही कहने की कोशिश कर रहा था। पुरस्कार वापस करना तो साहित्य का अपमान है। भगतजी को यह नहीं करना चाहिए था।''

अलबेला जी ने मौक पर चौका जड़ा। अध्यक्ष महोदय का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने अलबेला जी को भी समझाया-

-'' सीखो यार, कुछ इन नेताओं से सीखो। अपने परिवार के खिलाफ एक शब्द भी बर्दाश्त नहीं करते। गठबंधन से काम नहीं चलता तो महागठबंधन बना लेते हैं। एक दूसरे को सरेआम गालियां भी देते हैं तो तभी जब चुनाव सर पर हो। लेखकों को यदि चुनाव लड़ना हो तो नेताओं से भी अधिक गाली-गलौज करें। आपका गुस्सा इस बात पर नहीं है कि भगत जी सम्मान वापस कर रहे हैं आपको चिढ़ इस बात की है कि यह सम्मान आपको क्यों नहीं मिला। आज आपके मन की भड़ास निकल रही है।''

-'' यह आप हम पर आरोप लगा रहे हैं। हम राष्ट्रवादी लेखक हैं और ये साम्यवादी।''

-'' देशद्रोही तो आप हैं महादेय जो लेखकों की सरेआम हत्या पर भी मौन साधे हुये है। कुलबर्गी ने तो लिखकर ही विरोध किया था क्यों मार दिया गया ? पनसरे साहब बंदूक लेकर घूम रहे थे? क्या गारंटी है कि कल कहीं से गोली आकर मेरा काम न तमाम कर दे। कलम कूंद कर दी गई, तभी विरोध करने का यह तरीका निकाला गया है।''

भगत जी अचानक मुखर हो गये।

-'' आप कुलबर्गी नहीं हैं न। आपको याद है पिछले कितने साल पहले आपने कुछ लिखा था। आपको तो लोग भूल ही गये थे। जिला साहित्यश्री का सम्मान पाने के बाद से आपने कितने शब्द लिखे हैं ? हां, भूमिकायें लिखते रहे हैं। साहित्यिक कार्यक्रमों के अध्यक्ष बनते रहे हैं। अपना षष्टीपूर्ति खुद ही मनवाया था आपने। चले हैं कुलबर्गी और पनसरे बनने।''

-'' अच्छा जी, मैने नहीं लिखा तो अपने कौन सी मिसाइल दाग दी है। हमने तो सम्मान पाने के बाद से नहीं लिखा आपने तो उसके पहले भी कुछ नहीं लिखा। आपके लिखे हुये को नकल के सिवा कोई कुछ मानने के लिए तैयार ही नहीं है। साहित्य संसार ने आपको कभी अपनाया ही नहीं। साहित्य श्री सम्मान के लिए आपने कितने पापड़ बेले थे सब पता है। यह कहिये कि वर्त्तमान सरकार से लाभ पाने की उम्मीद में तलवे चाट रहे हैं। किसी संगठन अध्यक्ष बनने के लिए मंत्रियों की दुम में तेल लगाओ। हम तो कबीर के वंशज हैं।''

-'' तलवे चाटता है तू। तू चाटुकार है। कलम पकडनी नहीं आती, कबीर बनेगा। पत्रिका में विज्ञापन के लिए मंत्रियों के......................।''

-'' तुम तो ससुर कलम लिए ही पैदा हुये थे। पिता तो तंबाकू बेचते थे बेटा हो गया जयशंकर प्रसाद। जाकर बाप के साथ तंबाकू बेचो।''

-'' थू है तुझपर'

-'' थू थू थू।''

सभा सम्पन्न हो गई। जिला साहित्य संघ के बाहर पुलिस का पहरा है।

 

शशिकांत सिंह 'शशि'

पिता-स्व. रामाधार सिंह

माता- स्वर्गीया कांति सिंह

ग्राम-मड़पा मोहन

जन्म तिथि- 24.10.1969

पो- देवकुलिया

जिला-पूर्वी चम्पारण, बिहार

सम्प्रतिः-

पी जी टी भूगोल

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर, नांदेड़ 431736

भाषा-ज्ञान- हिन्दी, अंग्रेजी , पंजाबी तथा भोजपुरी भाषा का ज्ञान

महाराष्ट्र

प्रकाशनः-

1. समरथ को नहिं दोष (व्यंग्य संग्रह ,2001)

2. ऊधो! दिन चुनाव के आए (व्यंग्य काव्य 2005)

3. बटन दबाओ पार्थ 2013 व्यंग्य संकलन

4 प्रजातंत्र के प्रेत 2014 व्यंग्य उपन्यास

सम्मान-

हरिशंकर परसाई सम्मान (क्षितिज पत्रिका द्वारा ,2005 )

सिद्धिनाथ तिवारी व्यंग्यश्री सम्मान 2014

सम्पर्कः-

मो- 07387311701 ई मेल. skantsingh28@gmail.com

टिप्पणियाँ

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.