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सूर्यकांत मिश्र का आलेख - सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है प्रज्ज्वलित दीप

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दीपावली पर्व पर विशेष
जलता हुआ दीपक लिख जाता है संस्कारों की कहानी


दीप शब्द की परिकल्पना ही हमारे जीवन में प्रकाश का अहसास कराने वाली होती है। सदियों से हम दीपों का पर्व दीपावली मनाते आ रहे है। यह हिंदुओं का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इसे महज उत्सवी आयोजन न मानते हुए हमें संकल्पों से जोड़कर देखना चाहिए। जब दीप का नाम ही अंधेरे को परास्त कर उजाले का साम्राज्य स्थापित करना है तो फिर हमारे मानवीय समाज में कुरीतियों और भ्रष्ट्राचार का अंधेरा कायम क्यों है? क्यों हमारी पुष्पित और पल्लवित होने वाली बेटियां कोख में मारी जा रही है? क्यों घर की लक्ष्मी मानी जाने वाली बहु घर से बाहर की जा रही है? क्यों हमारे नौनिहालों के मुंह से निवाला छिनकर मध्याह्न भोजन जैसी योजना को कलंकित किया जा रहा है? सरकार द्वारा जनहित के लिए लाई जा रही योजनाएं क्यों फलीभुत नहीं हो रही है? हमारे देश का अन्नदाता कृषक क्यों असमय अपना जीवन समाप्त कर रहा है? इन सारी विडंबनाओं का उत्तर आखिर क्या है? आओ हम इस दीवाली संकल्प करें कि समाज में व्याप्त उक्त समस्याओं को ईमानदारी रूपी दीप से रोशन कर स्याह रात का अंत करेंगे।


भारतीय संस्कृति में दीपक की महिमा आपार बतायी गयी है। ऋगवेद में दीपक को सूर्य से उत्पन्न बताया गया है। भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ अवसर पर दीप का प्रज्ज्वलन साक्षी के रूप में माना जाता है। पश्चिमी सभ्यता की तरह जन्मदिन पर मोमबत्ती को बुझाना हमारी संस्कृति नहीं बल्कि दीप जलाकर उज्ज्वल भविष्य की कामना करना हमारी सभ्यता में शामिल है। धर्म ग्रंथों में भगवान के मंदिरों तथा पवित्र स्थानों पर दीपदान का महत्व प्रतिपादित किया गया है। घी का दीपक जलाने से नेत्र रोग पास नहीं फटकते, महुए के तेल का दीपक जलाने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है, तिल के तेल का दीपक सूर्य लोक की प्राप्ति कराता है तथा सरसों तेल का दीपक जलाने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। शास्त्रों में वृक्षों के तले नदियों अथवा पवित्र जलाशयों तथा पत्ते पर रखकर दीप प्रज्ज्वलन कर पानी में तैराने की परंपरा भी बतायी गयी है। दीप पर्व पर जलाया गया एक छोटा सा दीप चिंतन का एक नया आयाम प्रस्तुत करता है कि अमावस्या की घोर अंधेरी रात में छोटे छोटे दीपक जिस प्रकार जलते हुए अंधेरे को नष्ट कर प्रकाश का संचार करते है, ठीक उसी तरह सतत् जागरूक और प्रत्यनशील रहते हुए दैत्य प्रवृत्तियों के अंधकार को मिटाया जा सकता है।


हम दीपावली का पर्व 5 मुख्य पर्वों की कड़ी के रूप में मनाते है। धनतेरस से शुरू होने वाला पर्व नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजा, गोवर्धन पूजा और भाई दूज के साथ संपन्न होता है। पुरातन काल से धनतेरस का अर्थ धन संपत्ति की खरीदी और भगवान धनवंतरी  की पूजा के रूप में सामने लाया जाता रहा है। क्यों न हम एक ऐसा दीप धनतेरस पर जलाये जो हमारी बेटियों को धन के रूप में संयोजित करने का प्रण लेते हुए भ्रुण हत्या जैसे सामाजिक कलंक हो धो डाले। वास्तव में बेटियां ही वह धन होती है जो समाज को आगे बढ़ाती है। क्या हम इस बात से इंकार कर सकते है कि एक नारी ही इस संसार की सृजनकर्ता है। जब हम उसे ही नहीं बचा पाएंगें तो अपना वंश कैसे आगे बढ़ा पाएंगें? इस कटु सत्य को जानते हुए भी यदि में भ्रुण हत्या जैसे महापाप को समाप्त करने संकल्पित नहीं होंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब लक्ष्मी स्वरूपा अपनी बेटियों के लिए तरसते देखे जाएंगे। साथ ही लक्ष्मी पूजा पर्व का वास्तविक महत्व भी हम अपनी पीढ़ी को समझा नहीं पाएंगें।

पर्व का दूसरा दिन नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन वास्तव में यम को दीपदान  के लिए होता है। शाम के समय दीप जलाकर घर के बाहर ऐसे स्थान पर रखा जाता है, जहां कूड़ा-करकट फेंका जाता हो। उक्त स्थान को साफ करके गोरब आदि से लीपने की परंपरा भी दिखाई पड़ती है। उक्त दीपक जलाकर मृत्यु के देवता यम को समर्पित कर प्रार्थना की जाती है कि हमारे घर के अंदर प्रकाश का संचरण होता रहे और सभी लोग स्वस्थ्य रहे। आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी की पूजा भी की जाती है। हम क्यों न ऐसा एक दीप जलाए जो हमारे आसपास से सारी गंदगी को भष्म कर एक स्वच्छ और स्वस्थ भारत की तस्वीर हमें दिखाए। हम और हमारे देशवासी उसी अवस्था में स्वस्थ रह सकते है जब स्वच्छता हमारे संस्कारों में शामिल हो। स्वच्छता और स्वस्थता का संबंध ही समाज के निचले वर्ग में व्याप्त बीमारी के रूप में हमारे सामने आता है। क्या कारण है कि हमारे समाज में ही ऐसा भी वर्ग हमें अपनी ओर निहारता दिखता है जो दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहा होता है। परिणाम स्वरूप कुपोषण नामक असामाजिक दृश्य भी हमारे समक्ष आता है। क्या हम सब मिल जुलकर एक ऐसा दीप प्रज्ज्वलित नहीं कर सकते जो गरीबों की थाली में भी स्वास्थ्यवर्धक भोजन परोस सके। इस दीपावली का संदेश ही मनुष्य को इस रूप में मानना होगा, ताकि देश में गरीबी, भुख और कुपोषण से लोग दम न तोड़े।


दीपावली एक ओर जहां दीपों की रोशनी का पर्व है, वहीं दूसरी ओर लोक कलाकारों और विभिन्न विधाओं में पारंगत कला के पारखियों का बड़ा उत्सव भी है। कहीं न कहीं उनकी कला या प्रस्तुति हमारी वर्तमान पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ती दिखाई पड़ती है। इन्हीं कलाकारों की कला हमारे धार्मिक ग्रंथों में आये प्रसंगों को बखूबी जीवंत कर धर्म शास्त्रों का ज्ञान प्रदान करती है। रामलीला के मंचन द्वारा हमारे नौनिहाल भगवान राम के जन्म से लेकर तिलकोत्सव और धर्म के विरूद्ध आचरण करने वाले रावण के जीवन का अंत बड़ी आसानी से समझ सकते है। इसी तरह महाभारत पर आधारित कृष्ण लीला का मंचन कंस वध और गोप-गोपिकाओं की रासलीला का दर्शन भी करा जाता है। आज की बदली हुई परिस्थितियों में हम अपने लोक कलाकारों की ऐसी ही विधाओं से वंचित हो रहे है

रामलीला मंडलियों ने दम तोड़ दिया है। मंचन करने वाले पात्रों को भोजन नसीब नहीं हो रहा है। पुरातन समय में नवरात्रि से लेकर दशहरा तक रामलीला का मंचन लोगों को धर्म और संस्कृति से बांधे रखता था। अब न तो धर्म की रक्षा हो पा रही है, और न ही संस्कृति की रक्षण। रामलीला के मंचन में यह स्पष्ट रूप से समाज के सामने लाया जाता था कि वास्तव में भगवान राम को मर्यादा पुरूषोत्तम क्यों कहा जाता है। हमारे जीवन में मर्यादा और संस्कृति की क्या अहमियत है? पाप, पुण्य, सच और झुठ के बीच जीवन का उजला पक्ष स्याह रात को कैसे परास्त कर जाता है? इन सारी विपरीत धाराओं का मार्ग रामलीला के द्वारा खोजा जा सकता है। हमें अपने संस्कारों को जीवित रखने के लिए ऐसे ही एक दीप को जलाना होगा, जो हमारे लोक पर्वों को प्रकाशित कर सके, और आम लोगों में धर्म और संस्कृति के प्रति जागरण का संचार कर सके।

                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291

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