रविवार, 25 अक्तूबर 2015

तारा सिंह की कहानी - काला आंचल

काला आँचल

डॉ. श्रीमती तारा सिंह

         अमर, मौलसिरी के वृक्ष पर बैठी हुई एक श्यामा की ओर देखकर, अपने दोस्त रघुवीर से कहा---- दोस्त ! इस नन्ही चिड़िया को देखकर तुझे ऐसा नहीं लगता, कि यह किसी की माँ होगी ?
रघुवीर ,वृक्ष की ओर ताकते हुए कहा---- इसमें क्या शक है; देखो, कैसे अपने मुँह में दाना चुगकर घोसले में सोये बच्चे को चीख-चीखकर जगा रही है ।
अमर ने संकुचित होकर कहा--- क्या, सभी माएँ ऐसी होती हैं ?
रघुवीर अधीर होकर कहा--- इसमें क्या शक है, अरे ! माँ ही नहीं बल्कि माँ शब्द भी पूज्य है, वर्णेय है, आराधना के योग्य है; गंगा-जल की तरह निर्मल और तुलसीदल की तरह पवित्र है । मगर आज तुम इस कदर की उटपटांग बातें क्यों कर रहे हो ? क्या तुमने किसी माँ की निर्दयता देखी है ? अगर ऐसा है तो वह माँ नहीं, पालने वाली कोई धाई होगी । जो माँ नि:स्वार्थ नौ महीने तक बच्चे को अपने पेट में पालती है, अपने खून से सींचती है, ऐसे उच्च आत्माओं के ऊपर शक कर कहीं तुम अपनी आत्मा का कत्ल तो नहीं कर रहे । 
अमर, दीर्घ नि:श्वास लेकर खड़ा हो गया और संभलते ही उसके मुँह से जलती हुई चिनगारी की तरह शब्द निकल पड़े, कहा---- अरे ! मैं भी जीवन भर माँ शब्द के चरणों पर तुम्हारी ही तरह अपनी अभिलाषाओं और कामनाओं को अर्पित करता आ रहा हूँ, लेकिन उस दिन के बाद से माँ शब्द मुझे अग्नि-गोला सा जलाने लगता है । 
रघुवीर मुस्कुराता हुआ, मगर संयमित शब्दों में कहा---- ऐसी ओछी बातें करते तुम्हारी जुबान नहीं कटती । एक काम करो, आज तुम घर जाओ, तुमको आराम की जरूरत है; हमलोग कल फ़िर यहीं मिलेंगे ,उसके बाद फ़िर इस पर विस्तार में बातें करेंगे ।


रघुवीर की बातें सुनकर अमर , एक क्षण अवाक रहकर आहत-कंठ से बोला --- अच्छा तो तुम यह कहना चाहते हो, कि मैं अपना मानसिक संतुलन खो चुका हूँ ।
रघुवीर को जैसे साँप डँस लिया हो; उसने दोनों हाथों से सर पीटते हुए कहा---- दोस्त ! क्या हो गया, जो न ही तुमको माँ से प्यार है, न ही दोस्त से ।
अमर, रघुवीर की बातों का समर्थन करते हुए बोला--- लेकिन ऐसा क्यों हुआ, यह नहीं जानना चाहोगे ?
रघुवीर ,अपराधी भाव से उत्तर देते हुए कहा--- अच्छा तो बताओ । इस तरह कुछ देर तक दोनों दोस्तों ने अपने-अपने तर्क में बहुमूल्य शब्दों की नदी बहा दी । व्यंग्य , बक्रोक्ति, अन्योक्ति और उपमा आदि अलंकारों में बातें करने के बाद जब किसी तरह शांति स्थापित हुई ,तब ’कठोर करुणा की जय हो”कहता हुआ, अमर बोला----यह एक वैभवशालिनी माँ की कथा है । इसके पहले कि मैं फ़िर से कुछ उटपटांग बातें करूँ, पहले तुमसे माफ़ी माँग ले रहा हूँ । कारण मैं जानता हूँ, मैं ही क्यों ,सारी दुनिया जानती है----माँ वो मौलसिरी की छाँव होती है, जहाँ सुख और सुगंध ,दोनों का अनुभव होता है । फ़िर भी मेरे कुछ कटु शब्द तुमको पीड़ा पहुँचायेंगे , तब बुरा मत मानना । मैं तो उस बुरी घटना को तुम्हें बताकर , अपने पाप का प्रायश्चित करना चाहता हूँ , जो मैंने अपनी आँखों से देखा है । ममता की मूरत, एक माँ पवित्रता का अभिशाप बनकर कैसे वीभत्स मातृत्व का प्रदर्शन कर रही थी ?

रघुवीर, अमर को क्षुब्ध नजरों से देखते हुए कहा----  तुम जो कहना चाह रहे हो, जल्दी कहो ; मुझमें और सबूर नहीं है ।
अमर आर्द्र स्वर में कहा---- हाँ तो सुनो, कल की बात है । मैं एक मौल में गया हुआ था । कुछ खरीदना तो था नहीं, सो मैं निरुद्देश्य भटक रहा था । तभी मेरे कानों में एक छोटे बच्चे की हृदय भेदी चीख सुनाई पड़ी । मैंने मुड़कर देखा, तो एक 25-30 साल की आधुनिक माँ , चार से छ: महीने की बच्ची को चुप कराने के लिए , उसे अपनी छाती से चिपकाये,उसके गाल को बार-बार चूम रही थी । आश्चर्य तो मुझे तब होता था, जब-जब वो माँ अपने बच्चे के गाल को चूमती थी, तब-तब बच्चा चीख उठता था । इस तरह चुम्बन और चीख, करीब आधे घंटे तक चलता रहा । बाद बच्चे की चीख बंद हो गई और माँ चीखना शुरू कर दी । उसकी चीख सुनकर लोगों की भीड़ जमा हो गई; मैं भी गया । सबों ने पूछा----मेम ! क्या हुआ, आप चीख क्यों रही हैं ?

उस औरत ने बच्ची की ओर इशारा करते हुए कहा--- मेरी बच्ची अभी-अभी रो रही थी, अचानक इसने आँखें बंद कर लिया और निढ़ाल होकर गोद में गिर गई । इसे क्या हो गया,आपलोग मेरी कुछ मदद कीजिये । मेरे पति दुबई में रहते हैं और मैं यहाँ अकेली रहती हूँ । 
रघुवीर ने पूछा--- फ़िर क्या हुआ ?
अमर, छलछलाते नेत्रों से बताया --- हमलोग उसे पास के हॉस्पीटल ले गये , जहाँ कुछ देर बाद बच्ची को डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया । 
रघुवीर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही । वह आवाज ऊँची कर पूछा---- क्या हुआ था बच्ची को ? डॉक्टर ने क्या बताया ?
अजय विदीर्ण नजरों से रघुवीर की ओर देखते हुए बोला------ डॉक्टर ने बताया,’ बच्ची के गालों पर लाल –काले धब्बे किसी यातना की विस्तृत कहानी का स्वतंत्र साक्षी हैं जो बताते हैं, इस मासूम के गालों पर बार-बार दाँत चुभाया गया है, जिसकी पीड़ा से बच्ची मर गई “ ।
रघुवीर दुखी होकर कहा--- तुम कहना क्या चाहते हो, उसकी माँ चुम्बन नहीं, बल्कि दाँत काट रही थी ?
अमर, घृणा से बोझिल होते हुए कहा --- हाँ, तुमने ठीक समझा ।
अमर का उत्तर सुनकर ,रघुवीर का हृदय भाव उग्र हो गया । उसने आँखें नम कर कहा --- ऐसी औरतों को माँ नहीं बनना चाहिये । तुमने ठीक कहा, सभी माएँ अगर माँ होतीं , तब फ़िर भगवान श्रीकृष्ण पुतना का स्तन-पान करते समय उसकी हत्या क्यों करते ? 

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