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दीपक आचार्य का आलेख - सार्थक करें नवरात्रि

 

शक्ति उपासना की दृष्टि से नवरात्रि काल सर्वाधिक उपयुक्त समय है जिसमें थोड़ी सी देवी पूजा करने मात्र से अधिकाधिक फल प्राप्त होता है।

नवरात्रि में साधना के दो आयाम देखने को मिलते हैं - वैयक्तिक और सामूहिक।

वैयक्तिक साधना में एकान्त और एकाग्रता की आवश्यकता है जबकि सामूहिक साधना में आराधना का मिश्रित और सामुदायिक स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। दोनों के माध्यम से दैवी कृपा की प्राप्ति हो सकती है।

नवरात्रि में साधना का एक तीसरा स्वरूप और देखने को मिलता है जिसका नाम है दिखावा साधना।

इसमें दैवी पूजा और उपासना तथा नवरात्रि के नाम पर दिखावे के सारे इंतजाम होते हैं जहां दैवी या उसकी उपासना केवल माध्यम है।

यथार्थ में नवरात्रि के माध्यम से बहुत से लोग अपने आपको दैवी भक्त कहने-कहलाने  और नवरात्रि के मनोरंजनात्मक पक्ष को प्रधानता देने के लिए सारे जतन करते हैं।

इस किस्म के भक्तों का स्वभाव, चरित्र और लोक व्यवहार भिन्न-भिन्न हो सकता है।

साधना का आरंभिक चरण है शुचिता अर्थात सभी प्रकार की पवित्रता।

बिना शुद्धि के सिद्धि या दैवी कृपा पाने की कल्पना भी नहीं की जानी चाहिए।

चित्त में मलीनता, दिमाग में खुराफात और बीमारी की अवस्था को लेकर की जाने वाली किसी भी प्रकार की साधना का कोई फल प्राप्त नहीं होता।

इस अवस्था में जो भी साधना की जाती है उससे अर्जित शक्ति व ऊर्जा मन-मस्तिष्क और शरीर की मलीनताओं को दूर करने में खर्च हो जाती है इसलिए इस प्रकार की साधना में अपने संकल्प पूरे होना संभव ही नहीं है।

जो लोग मलीन, दुष्ट और आसुरी भावों वाले हैं उन लोगों की साधना का कोई अर्थ नहीं है।

ऎसे लोग जो कुछ भी करते हैं वह इन लोगों को शुद्ध करने की दिशा में खर्च होता रहता है। 

सोच-विचार और कर्मों में अशुद्धि, किसी के प्रति क्रोध, प्रतिशोध, नकारात्मक व राक्षसी भावों के रहते हुए साधना कभी सफल नहीं हो सकती।

यही कारण है कि इन लोगों की साधना केवल पाखण्ड और आडम्बर तक सीमित रह जाती है और ये लोग जीवन में असफल ही रहते हैं।

रुपया-पैसा और वैभव प्राप्त कर लेना, भ्रष्टाचार और हराम की कमाई से सम्पन्नता का चरम पा लेना अपने अहंकार को परितृप्त जरूर कर सकता है लेकिन यह आत्मशांति या जीवन की सफलता नहीं दे सकता।

नवरात्रि को जो लोग अपने जीवन के लिए उपलब्धिमूलक बनाना चाहते हैं उनके लिए यह जरूरी है कि पहले वे पुराने पापों और मलीनताओं के निवारण के लिए प्रयास करें।

इसके लिए गौमूत्र से बड़ा शुद्धिदायी उपाय और कुछ नहीं है। इसी से खान-पान और दुष्ट संसर्गजन्य दोष व पाप समाप्त हो सकते हैं। 

नवरात्रि में रोजाना गौमूत्र का पान करें, इसके एकाध घण्टे बाद तुलसी दल डालकर गंगाजल का सेवन किया जाना चाहिए। ऎसा करने से श्ुाद्धि की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है।

इसके साथ ही यह दृढ़ संकल्प भी लिया जाना जरूरी है कि पुरुषार्थ और परिश्रम से प्राप्त कमायी को ही अपने शरीर और घर-परिवार के लिए काम में लिया जाए, तभी शुद्धिकरण की प्रक्रिया भी चलती रहेगी और नवीन दोष या पापों का बोझ बढ़ना भी थम ही जाएगा।

ऎसा होने पर ही शुद्धिकरण की प्रक्रिया दृढ़ होकर धीरे-धीरे तन-मन-मस्तिष्क और कर्म सभी कुछ पावन हो सकते हैं और इसी शुचिता के माध्यम से शरीर साधना का उपयुक्त मंच बनकर उभर सकता है। इसके बिना साधना का कोई अर्थ नहीं है।

पवित्रता के साथ की जाने वाली साधना से दैवीय ऊर्जाओं का प्रवाह एवं संग्रहण तेज हो जाता है और वह साधक के चेहरे, मन और वाणी से परिलक्षित होने लगता है।

यह अपने आप में साधना का आरंभिक चरण है जहां से आगे बढ़ने पर सिद्धि और साक्षात्कार कुछ भी संभव हो पाता है।

नवरात्रि में नौ दिनों तक व्रत-उपवास और स्तुति या मंत्र गान आदि तमाम तभी सार्थक हैं जबकि वह मन से हों, दिखाने के लिए न हों, साधना काल में हम हों और सामने दैवी मैया के विराजमान होने का भाव हो, कोई तीसरा न बीच में आए, न पास रहे और न ही ध्यान में आए।

ऎसा होने पर ही हमारा यह कर्म वास्तविक साधना में गिना जा सकता है, अन्यथा हम जो कुछ कर रहे हैं वह ढोंग और नवरात्रि के नाम पर धींगामस्ती के सिवा कुछ नहीं है। यही स्थिति सामूहिक साधना में है, जहां हम जो कुछ करते हैं उसकी साक्षी और लक्ष्य दैवी मैया ही हों, जमाना नहीं। नवरात्रि के महत्व को समझने और इसका भरपूर उपयोग करने की आवश्यकता है।

साधना में संख्या या अधिकाधिक समय का कोई मूल्य नहीं है बल्कि कितने समय हम एकाग्रता और दैवी के प्रति अन्यतम समर्पण रख पाते हैं, यही प्रधान है।

जो कुछ भी साधना करें, प्रसन्नता से करें, जितनी देर आसानी से हो सके, उतनी ही करें तथा यह ध्यान रखें कि उस समय तल्लीनता में कहीं कोई कमी नहीं आए।

मन न लगे तो कुछ देर प्रयास करें, संकल्प को दृढ़ बनाएं, अपने आप एकाग्रता जागृत हो जाएगी।  इसके बावजूद चित्त न लगे तो थोड़ी देर बाद साधना करें।

यह जरूरी नहीं कि कोई बड़ा या लम्बा चलने वाला पाठ या स्तोत्र या किसी मंत्र की बहुत सारी मालाएं करें। जितना बन सके उतना करें।

इसके लिए सबसे अच्छा मार्ग यही है कि मैया का कोई छोटा सा मंत्र लेकर इसका यथासमय अधिकाधिक जप करने का अभ्यास डालें।

दैवी मैया के बहुत सारे मंत्रों और स्तोत्रों को करने की बजाय एक ही मंत्र या स्तोत्र का अधिक से अधिक संख्या में जप करने का अभ्यास डालने से वह मंत्र या स्तोत्र जल्दी जागृत एवं सिद्ध हो जाता है तथा इसका फल शीघ्र मिलने लगता है।

बहुत सारी साधनाएं एक साथ करने की बजाय सिद्धि प्राप्ति के लिए सर्वाधिक जरूरत यह है कि एक को ही अपनाएं और अधिकाधिक संख्या में करते हुए इसकी शक्तियों को बढ़ाएं।

किसी भी एक मंत्र या स्तोत्र की सिद्धि हो जाने के बाद दूसरे सारे मंत्र स्तोत्र मामूली संख्या में कर लिए जाने पर अपने आप सिद्ध हो जाते हैं, इनके लिए ज्यादा मेहनत करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।

इस रहस्य को जो जान लेता है वह साधक अपने आप कई सिद्धियों को प्राप्त कर ही लेता है। इस बार की नवरात्रि को व्यर्थ न जाने दें, दैवी मैया की आराधना में यथासमय और यथाशक्ति कुछ करें और लाभ पाएं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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