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असग़र वजाहत की किताब का लोकार्पण

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नुक्कड़ नाटक पर हुई चर्चा

नई दिल्ली।  'नुक्कड़ नाटक का भविष्य उसके बहुआयामी होने में है।  कथावस्तु की विविधता  सीधा सरोकार ही नुक्कड़ नाटक को लोकप्रिय बनाता है। नुक्कड़ नाटक के विषयों की विविधता के साथ साथ उसके मंथन के सम्बन्ध में भी गंभीर बातचीत होनी आवश्यक है। सुप्रसिद्ध कथाकार-नाटककार प्रो असग़र वजाहत ने हिन्दू कालेज में आयोजित संगोष्ठी 'नुक्कड़ नाटक का अर्थ' में कहा कि सभी स्तरों पर जनता की भागीदारी से ही नुक्कड़ नाटक प्रासंगिक बन सकेंगे। हिन्दू कालेज की हिन्दी नाट्य संस्था 'अभिरंग' द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी का आकर्षण प्रो वजाहत के नुक्कड़ नाटक संग्रह 'सबसे सस्ता गोश्त' का लोकार्पण था। संगोष्ठी की मुख्या वक्ता किरोड़ीमल कालेज की प्राध्यापक डॉ प्रज्ञा ने अपने वक्तव्य में कहा कि जनता के सवालों को लिए जनता के बीच जन्मी ये विधा आठवें दशक में जब सामने आई तो इसने नाटक की दुनिया को एकदम उलट दिया। प्रोसीनियम के फोर्थ वाल के सिद्धांत और पूरे तामझाम, बड़े बजट और सीमित दर्शक वर्ग को समर्पित नाटक के सौंदर्यशास्त्र को नुक्कड़ नाटकों ने बदल डाला। नाटक का एक नया सौंदर्यशास्त्र बनना शुरू हुआ। उन्होंने नाटककार असगर वजाहत के नाटकों की एक बड़ी खासियत बताई कि ये नाटक सत्ता विद्रूपता और उसके पाखंड को उजागर करते हैं। वर्चस्व प्राप्त शक्तियों का पर्दाफाश इनके नाटकों में हुआ है फिर वो चाहे धर्म की ताकतें हो, सामाजिक ताकतें हों, आर्थिक ताकतें हों या राजनीतिक ताकतें । नाटककार ने इस क्रम में शोषकों के चेहरे धुंधले नहीं होने दिए हैं। इससे पहले अभिरंग के युवा दल ने ख्वाजा मोइनुद्दीन किरपा करो महाराज' शीर्षक कव्वाली की संगीतमय प्रस्तुति से सबका मन मोह लिया। 

अभिरंग के परामर्शदाता डॉ पल्लव ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि साहित्य और सभी कलाएँ यदि हमें बेहतर मनुष्य बनने की तरफ ले जाती हैं तो उनका महत्त्व है अन्यथा यह कोरा कलावाद और वाग्विलास ही है। उन्होंने अभिरंग की एक दशक लम्बी रंग यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि असग़र वजाहत जैसे नाटककार के कृतित्त्व पर चर्चा करना नयी पीढ़ी को सच्चे जनपक्षधर साहित्य विरासत से जोड़ना है। आयोजन में असग़र वजाहत ने लोकार्पित पुस्तक के शीर्षक नाटक 'सबसे सस्ता गोश्त' का पाठ किया तथा विद्यार्थियों के अनेक सवालों के उत्तर भी दिए। एक सवाल के जवाबा में उन्होंने कहा कि भारत जैसे महादेश को चलाने के लिए महा उदारता की जरूरत होती है वहीं विकास की प्रचलित अवधारणा के उलट उन्होंने कहा कि मन, बुद्धि और समझ को विकसित करना सबसे बड़ा विकास है नाली,पल और सड़क बनाना ही विकास नहीं होता। 

संयोजन कर रही अभिरंग की रंगकर्मी फरहा ने अतिथियों का परिचय दिया तथा हिन्दी विभाग की अध्यक्षा डॉ विजया सती ने फूलों से स्वागत किया। आयोजन में प्रकाशन संस्थान राजपाल एंड सन्ज़ की निदेशिका मीरा जौहरी ने भी विचार व्यक्त किए। अंत में अभिरंग के छात्र संयोजक आदर्श मिश्रा ने आभार प्रदर्शित किया। आयोजन स्थल पर लगाईं गई पुस्तक प्रदर्शनी का विद्यार्थियों ने अवलोकन किया। 

शशांक द्विवेदी 

अभिरंग, हिन्दू कालेज,  दिल्ली 

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