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प्रमोद यादव की कहानी - असत्य-सत्य

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ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार से दौड़ी जा रही थी..राह के पेड़-पौधे ,पर्वत, नदी-नाले सभी पीछे छूटते जा रहे थे..मेरे मन में भी विचारों की दौड़ मची थी…मस्तिष्क में तरह-तरह के विचार राह के दृश्यों की तरह आ-आकर पीछे छूटते जा रहे थे..तभी विचारों का क्रम टूटा..ट्रेन धीमी गति से चलकर किसी स्टेशन पर रूक गई थी..शोर गुल के वातावरण से मुझे परेशानी होने लगी..मैं चिढ सा गया..तभी मेरे कम्पार्टमेंट में एक युवक दाखिल हुआ जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी..बाल सूखे और उलझे हुए थे..कपड़ों पर भी धूल और मैल का आवरण चढ़ा हुआ था..उसकी आँखों में एक अजीब-सी शून्यता का आभास हो रहा था..मुझे उसका सारा व्यक्तित्व विचित्र सा प्रतीत हुआ..वह खामोशी से आकर मेरे बगल में बैठ गया...मैंने एक सरसरी दृष्टि से उसका निरीक्षण किया और मैंने देखा ..उसके होंठों पर एक हलकी सी रहस्यमयी मुस्कान है जिसका विश्लेषण मैं नहीं कर पाया..मैं उसे देखता रहा..विश्लेषण करने का प्रयास करता रहा – उसके विचित्र व्यक्तित्व का…

मैं उसे देखता ही रहा..अचानक उसकी और मेरी दृष्टि मिल गई...उसने अपना गला साफ़ किया और धीरे से पूछा - ‘ क्या मैं आपका परिचय जानने की धृष्टता कर सकता हूँ ? ‘

‘ जी..मुझे अखिल कहते हैं..राजधानी में रहता हूँ..लेखन मेरा काम है..फिलहाल मैं अपनी नई रचना के विषय में सोच रहा हूँ..’ यह सब मैंने एक ही सांस में कह डाला .

‘ ओह..तो आप लेखक हैं..बड़ी ख़ुशी हुई आपसे मिलकर...’ उसने कहा और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया..मैंने भी अपना हाथ बढ़ाकर उसकी खुरदुरी हथेलियों में दे दिया..

‘ अच्छा अखिल जी ..क्या आप अपनी नई रचना के बारे में कुछ बता सकेंगे ? ‘ उसने पूछा.

‘ मेरी नई रचना....’ कुछ देर चुप रहने के बाद मैं बोला-‘ मेरी नई रचना एक फौजी जवान के जीवन पर आधारित है..’

‘ फौजी जवान...’ वह बुदबुदाया..उसकी शून्य आँखें एकबारगी चमक कर बुझ गई..

‘ जी हाँ ..फौजी जवान..’ मैंने लापरवाही से कहा..’ .. मेरी कहानी का नायक है एक सैनिक.. सैनिक का एक खूबसूरत सा घर है.. उसकी अत्यंत सुन्दर पत्नी है..एक प्यारा सा बच्चा है और सैनिक की ममतामयी माँ है ..सैनिक और उसकी पत्नी एक-दूसरे को बेहद प्यार करते हैं..वे जन्म-जन्मान्तर तक साथ निभाने की प्रतिज्ञा करते हैं..इस प्रकार सुखपूर्वक उनका जीवन चल रहा है..तभी देश पर हमला होता है..सैनिक को उसका कर्तव्य पुकारता है..ममतामयी माँ और प्यारी पत्नी उसे देश सेवा हेतु मुस्कान के साथ बिदा करती हैं..वह सैनिक उनकी कामनाओं और प्यार को भूलकर अपने कर्तव्य को निबाहने में जुट जाता है..देश के लिए रक्त की अंतिम बूंद तक बहा देने वाला वह सैनिक सदैव उनकी स्मृतियों के चित्र अपने मानस में खींचता है..और दुगुने उत्साह से अपने कर्तव्य की ओर उन्मुख होता है..तभी वह एक दिन युद्ध के दौरान लापता हो जाता है और उसके घरवालों को उसकी मृत्यु की सूचना दे दी जाती है..उसकी माँ सुनते ही विछिप्त सी हो जाती है..कभी रोती है..कभी हंसती है..और उसकी पत्नी प्रस्तर प्रतिमा सी जड़ हो जाती है..धीरे-धीरे समय का काफिला बढ़ता जाता है..समय घावों को भरता रहता है..सैनिक की विधवा अपने पति के आदर्शों और....’ मैं थोड़ी देर के लिए रूक जाता हूँ..फिर कहता हूँ- ‘ और उसकी स्मृतियों के सहारे जीवन गुजारने को उद्यत होती है..किन्तु उसकी सास जब भी अपनी बहू को देखती है ..दर्द और पीड़ा से कराह उठती है..और एक दिन अपनी बहू से आग्रह करती है – ‘ बेटी..सारा जीवन उसकी याद में काटने का विचार छोड़ दे..बुरा मत मानना तो कहूँगी अभी तेरी सारी जिंदगी पड़ी है..तू क्यों इसे व्यर्थ बर्बाद कर रही है..फिर से अपनी नई दुनिया बसा ले...’

यह सुनते ही उसकी बहू लगभग चीख पड़ती है..वह स्पष्ट शब्दों में मना कर देती है..उसकी सास निराश सी हो जाती है..किन्तु अपनी बहू का दुःख उसे दर्द की अनुभूतियों से पीड़ित करते रहता है..वह उसे फिर कई बार कहती है..कभी अपनी कसम देती है..तो कभी स्वर्गीय बेटे की आत्मा की शान्ति का नाम ले समझाती है..तो कभी बच्चे के भविष्य को लेकर..पर वह साफ़ कह देती है कि इस घर को छोड़..सास को छोड़ वह कहीं नहीं जायेगी..तब उसकी सास कहती है कि ठीक है..इस घर से जाने नहीं कहूँगी..तुम्हारे और इस बच्चे के सिवा मेरा है कौन ? ईश्वर की कृपा से धन-दौलत इतनी है कि सात पीढ़ी बैठकर खा ले..तुम अब मेरी बेटी बनकर रहो..कोई न कोई तो मिलेगा ही जो घर जमाई बन साथ रहे और हमारे मुन्ने को भी स्वीकार करे..तुम हाँ भर कह दो..मेरी ये आखिरी इच्छा पूरी कर दो..तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ..

अंततः सैनिक की विधवा अपनी सास की इच्छा-पूर्ति हेतु फिर से अपनी मांग में सिंदूर रचाती है..अच्छा पति मिलता है..किन्तु फिर भी वह अपने पहले पति की स्मृतियों को विस्मृत नहीं कर पाती ..मन ही मन उन स्मृतियों को ही पूजती है..अपने दूसरे पति को वह केवल अपना तन ही सौंपती है किन्तु अपनी आत्मा..अपना मन नहीं..

कुछ ही अरसे बाद उसकी सास अचानक एक दिन चल बसती है..वह एकदम अकेली हो जाती है..तभी एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो जाती है..उसके पति की मृत्यु का समाचार गलत सिद्ध होता है..वह शत्रुओं की कैद से स्वतंत्र हो फिर अपने सुन्दर सपनों के संसार में लौटता है..चौंकाने के उद्देश्य से वह अपने आने की सूचना भी नहीं देता..रात्री में चुपचाप घर पहुंचता है..किन्तु वहां उसके स्वप्न टूटकर बिखर जाते हैं..अपनी पत्नी को वह अनजान बाहों में देखता है..’

‘ अजीब बात है...’ अचानक उस युवक के मुंह से निकल पड़ता है..

‘ क्या अजीब बात है ? ‘ मैं आश्चर्य से पूछता हूँ.

‘ जी...कुछ नहीं..मैं कहना चाहता था कि ऐसा अक्सर फिल्मों में होता है..’ उसने संभलकर कहा किन्तु मुझे आभास हुआ कि वह कुछ छिपा रहा है..परन्तु मैंने कुछ पूछा भी नहीं और बोला- ‘ जी हाँ..फिल्मों में ऐसा होता होगा किन्तु इसके बाद मैं कहानी को अत्यंत विचित्र मोड़ देना चाहता हूँ..’

‘ कैसा मोड़ ? ‘ उसने अत्यंत शीघ्रता से पूछा.

‘ ध्यान दीजिये..’ मैंने कहा- ‘ जब वह अपनी पत्नी को पराई बाहों में देखता है तो उसे ख्याल आता है कि निश्चित ही मेरी पत्नी उस व्यक्ति को असीम प्यार करती है तभी तो आज मेरी मृत्यु के पश्चात वह फिर सुहागन हो गई है..मैं यह जीवन अचानक प्रगट होकर क्यों बर्बाद करूं ? ‘

‘ वह त्याग और आदर्श की भावना से भर उठता है. चुपचाप वापस लौट जाने का मन बनाता है..’ मैं थोड़ी देर चुप रहता हूँ फिर कहता हूँ-‘ ये है मेरी कहानी के नायक का आदर्श...’

‘ असंभव... बिलकुल असंभव.. ‘ वह लगभग चीख उठता है..- ‘ फौजी जवान इतना आदर्शवान नहीं बन सकता..अगर मैं उस जवान की जगह होता तो अपनी पत्नी..उसके दूसरे पति और बच्चा..तीनों को गोली मार देता..’ कहते-कहते वह हांफ सा जाता है ..उसकी आँखों में क्रोध, घृणा, ग्लानि आदि के भाव तैर जाते हैं..किन्तु धीरे-धीरे उसकी आँखों में फिर वही शून्यता समा जाती है..फिर वह धीरे से कहता है-‘ क्षमा चाहता हूँ अभद्रता लिए...किन्तु क्या आप इस कहानी के नायक का नाम विजय और नायिका का नाम वनिता रख सकेंगे ? ‘ और वह चुप हो जाता है.

ट्रेन किसी स्टेशन पर आ लगती है..ट्रेन की खिड़की से झांकता हूँ..वही शोरगुल और भीड़ पाता हूँ..अखबार वाला आता है..मैं अखबार खरीदता हूँ..वह मुझसे अखबार लगभग छीन लेता है और मुख्पृष्ठ के किसी समाचार को पढ़ता है ..उसके होठों पर धीरे-धीरे एक रहस्यमयी मुस्कान नाचती है..फिर वह धीरे से अट्टहास करता है..मैं अखबार उसके हाथ से छीनता हूँ..और समाचार पर दृष्टि डालता हूँ..मोटे टाईप के अक्षरों में छपे समाचार को देखकर चौंक जाता हूँ-

“ एक साथ तीन सनसनीखेज हत्याएं - हत्यारा फरार “

‘ कल रात्री सेक्टर तीन में एक साथ तीन हत्याएं हो गई..घटना इस प्रकार बताई जाती है कि सैनिक विजयकुमार की मृत्यु के गलत समाचार के आधार पर उसकी पत्नी श्रीमती वनिता ने दूसरी शादी कर ली थी..किन्तु कल रात्री जब विजयकुमार अकस्मात् युद्ध से सही-सलामत वापस लौटा तो क्रोध में आकर उसने वनिता,अपने बच्चे और वनिता के दूसरे पति की गोली मारकर हत्या कर दी और स्वयं फरार हो गया..’

समाचार पढ़कर मैं उछल पड़ता हूँ..मेरी दृष्टि साथ के युवक की ओर उठती है किन्तु तब तक वह भीड़ में गुम हो चुका होता है .

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प्रमोद यादव

गयानगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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