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सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - माँ बम्लेश्वरी - शक्ति पूजा का तीर्थ

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नवरात्रि पर्व पर विशेष∙∙∙

शक्ति पूजा और तीर्थ के रूप में पहचान बना रहा जिला

0 मां बम्लेश्वरी, शीतला मंदिर एवं मां पाताल भैरवी दिला रही अलग पहचान

राजनांदगांव जिला धार्मिक विश्वास एवं श्रद्धा का प्रतीक बन चुका है। दो हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन नगरी डोंगरगढ़ धर्मनगरी के नाम पर प्रतिष्ठा पाने के साथ एक तीर्थ का रूप ले चुका है। चैत नवरात्र और क्वांर नवरात्र के अवसर पर प्रतिवर्ष बढ़ रही ज्योति कलशों की संख्या मां की कृपा श्रद्धालुओं तक पहुंचा रही है। राजनांदगांव जिले सहित छत्तीसगढ़ प्रदेश और भारत वर्ष ही नहीं विदेशों में निवासरत लोग भी मां के दरबार में मनोकामना ज्योति प्रज्ज्वलित करा रहे है। जिला मुख्यालय से महज 39 किमी की दूरी पर स्थित डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर विराजित मां का दरबार आनंद और खुशी बरसा रहा है। यह स्थान महज धार्मिक महत्व ही नहीं रखता वरन आस्था का केन्द्र भी बन गया है। डोंगरगढ़ नगरी में मां बम्लेश्वरी के दो मंदिर स्थापित है, जिनमें से मुख्य मंदिर की ऊंचाई धरती से लगभग 16 सौ फीट ऊपर है। इसे बड़ी बम्लेश्वरी के नाम से जाना जाता है। मां के गर्भगृह तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 13 सौ सीढ़ी चढ़कर जाना होता है। प्रदेश के तात्कालिक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एवं वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ∙ रमन सिंह के सौजन्य से अब श्रद्धालुओं को रोपवे की सुविधा भी मुहैया कराई जा रही है। मां का दूसरा मंदिर नीचे मैदान में स्थित है जिसे छोटी बम्लेश्वरी मां की संज्ञा दी गई है। चारों ओर वनों से घिरा यह क्षेत्र मां की सवारी शेर के दर्शन भी साक्षात रूप में कराता रहा है। प्रायः नवरात्रि के समय शेर की सक्रिय रूप से उपस्थिति आचार्यों द्वारा बताई जाती रही है। ऐसा माना जाता है कि बम्लेश्वरी ही मां जगदम्बा है जिसमें महेश्वर की शक्ति विद्यमान है।

कामाख्या से डोंगरगढ़ तक की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

वर्तमान में जिसे हम डोंगरगढ़ धर्मनगरी के नाम से जान रहे है, वह कभी कामाख्या नगरी व डुंगराख्य नगर नामक स्थान था। लोक मान्यता यही है कि आज से लगभग 22 सौ वर्ष पूर्व डोंगरगढ़ का प्राचीन नाम कामाख्या नगरी ही था। उक्त नगरी में राजा वीरसेन का शासन था जो कि निःसंतान था। उस समय अपने हृदय में पुत्र प्राप्ति की कामना से राजा वीरसेन ने मध्यप्रदेश के मंडला जिले के अंतर्गत महिषमतीपुरी में शिव जी और भगवती दुर्गा की उपासना की। इतिहास बताता है कि शिव जी और मां भगवती की कृपा से राजा वीरसेन को एक वर्ष के अंदर सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योतिष शास्त्र के जानकार पंडितों ने उक्त बच्चे का नामकरण मदनसेन किया। राजा वीरसेन ने शिव जी और मां जगदम्बे के आशीर्वाद को अपने जीवन में खुशी का कारण मानते हुए भक्ति भाव से प्रेरित होकर कामाख्या नगरी और डुंगराख्य का नाम परिवर्तित कर डोंगरगढ़ कर दिया और उसी पहाड़ी पर मां बम्लेश्वरी का मंदिर बनवाया।

राजा विक्रमादित्य से भी जुड़ी है धर्मनगरी की कहानी

उज्जैन के महान प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कहानी भी धर्मनगरी डोंगरगढ़ से जुड़ी हुई है। राजा कामसेन के राजदरबार की नर्तकी कामकंदला का प्रेम माधवनल से होना भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। राजा कामसेन ने माधवनल से नाराज होकर उसे राज्य से निकल जाने का फरमान जारी कर दिया। माधवनल अपने प्रेम के वशीभूत राज्य न छोड़कर डोंगरगढ़ की पहाड़ी में जा छिपा। वह एक गुफा में रहने लगा। कामकंदला को यह खबर थी और वह अपने प्रेमी से मिलने वहां जाने लगी। यह भी बताया जाता है कि राजा कामसेन का पुत्र मदनादित्य भी कामकंदला पर आसक्त हो गया। इस प्रेम कहानी का अंत करने के लिए मदनादित्य ने कामकंदला को नजरबंद कर लिया साथ ही माधवनल को पकड़ने अपने सिपाही लगा दिए। यह बात जब माधवनल तक पहुंची तो वह पहाड़ी के रास्ते भाग निकला और उज्जैन पहुंच गया। यही उसकी मुलाकात राजा विक्रमादित्य से हुई। घटनाक्रम से अवगत होने के बाद राजा विक्रमादित्य ने माधवनल को साथ लेकर मदनादित्य के विरूद्ध जंग छेड़ दिया। अंततः युद्ध में माधवनल को जीत मिली और मदनादित्य उसके हाथों में मारा गया। इसी युद्ध में वैभवशाली कामाख्या नगरी पूरी तरह से खंडहर हो गई। चारों ओर केवल डोंगर अर्थात पर्वत ही शेष रहे गये। रियासतकालीन किलो अर्थात गढ़ के साथ इसे जोड़ते हुए यहीं से नया नामकरण डोंगरगढ़ अस्तित्व में आया। युद्ध के पश्चात राजा विक्रमादित्य ने कामकंदला और माधवनल के प्रेम की परीक्षा लेने यह मिथ्या सूचना फैला दी कि युद्ध में माधवनल मारा गया है, तो कामकंदला ने भी ताल में कूदकर आत्महत्या कर ली। कामकंदला के न रहने पर माधवनल ने भी प्राण त्याग दिया। प्रेमी प्रेमिका के प्राण त्याग देने से विचलित राजा विक्रमादित्य ने मां बगुलामुखी की घोर आराधना की और देवी के प्रकट होने पर कामकंदला तथा माधवनल के जीवन की कामना करते हुए मां बगुलामुखी से आशीर्वाद मांगा कि आप जागृत रूप में डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर प्रतिष्ठित हो, तभी से मां बगुलामुखी बमलई देवी के रूप में धर्मनगरी में विराजित है।

मां पाताल भैरवी भी बरसा रही कृपा

मां बम्लेश्वरी के आशीर्वाद से पहचान रखने वाले राजनांदगांव जिला मुख्यालय में मां पाताल भैरवी सिद्ध पीठ की स्थापना ने भी जिले को एक नई पहचान दी है। लगभग 18 वर्ष पूर्व मंदिर की स्थापना हेतु भूमिपूजन के साथ ही संस्कारधानी के दानवीरों ने अपने वैभव के साथ मंदिर निर्माण की प्रतिबद्धता को साकार रूप देने का प्रण लिया और आज मां पाताल भैरवी का विशाल मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन चुका है। मंदिर स्थापना की प्रथम पायदान मां पाताल भैरवी की विशालकाय सीमेंट और लौहयुक्त मूर्ति की स्थापना के रूप में चार अप्रैल 1998 को पूरा किया गया। शनैः शनैः भक्तजनों एवं श्रद्धालुओं ने अपनी मंशा को पूर्णता देने का प्रयास करते हुए 15 अक्टूबर 2014 को अगला कदम उठाते हुए क्वांर नवरात्रि पर्व पर सिद्धपीठ के द्वितीय लोक में मां राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी दश महा विद्यापीठ की स्थापना कर पूरा किया। विध्नहर्ता गणेश जी के साथ भैरवनाथ की प्राण प्रतिष्ठा ने मां पाताल भैरवी मंदिर को एक पहचान दिलाई और यह अब एक तीर्थ का रूप लेने लगा है। मां पाताल भैरवी की लगभग 13 फीट ऊंची रोेंगटे खड़े कर देने वाली प्रतिमा भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मंदिर के सबसे ऊपरी हिस्से में 12 ज्योतिर्लिंग के साथ कालों के काल महाकाल भगवान शंकर की वृहद मूर्ति ने इस मंदिर की विशालता को चार चांद लगा दिये। इतना ही नहीं कुछ किमी दूर से विशाल रूप में मंदिर के गुंबज के साथ निर्मित नंदी एवं शिवलिंग वह आकर्षण है, जो श्रद्धालुओं को एकाएक अपनी ओर खींच रहा है। एक वर्ष पूर्व महाशिवरात्रि पर्व पर मां पाताल भैरवी की विराट प्रतिमा के समक्ष लगभग 16 इंच ऊंची पारद शिवलिंग की स्थापना ने यह सिद्ध कर दिया कि मंदिर के पदाधिकारी एवं सदस्यों ने अपनी विचारधारा को अविराम गति से बढ़ाने का संकल्प ले रखा है।

रियाससत कालीन शीतला मंदिर भी ले रहा अलग आकार

राजनांदगांव जिला मुख्यालय का सिद्ध पीठ मां शीतला मंदिर यूं तो रियासत की पहचान है, बताया जाता है कि वैष्णव राजाओं ने इसकी प्राण प्रतिष्ठा की थी। नगर देवी शीतला मां के नाम से स्थानीय शीतला मंदिर अथवा माता देवालय में अपने पुराने निर्माण से अब नवीनता की ओर रूख करना शुरू किया है। सोनारपारा से प्रवेश द्वार के रूप में पुराना रास्ता बड़ा ही आकर्षक रूप ले चुका है। माता की सवारी शेर को बड़े शांत स्वरूप में प्रवेश द्वार में स्थापित कर मां की कृपा का परिचय दिया जा रहा है। अब नवीन मार्ग के रूप में राष्ट्रीय राजमार्ग से एक रास्ता निकालकर सीधे मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुंच मार्ग ने एक और आसानी प्रदान की है। इसी मार्ग पर पं∙ मोतीलाल नेहरू पार्क हरे भरे रूप में शांति और सुकून श्रद्धालुओं को प्रदान कर रहा है, उसे महज मां के भक्त ही बयां कर सकते है। इसी शीतला मंदिर के गर्भगृह की बाहरी दीवार पर अत्यंत प्राचीन मूर्ति स्थापित है। कहते है मां की वह मूर्ति सैकड़ों वर्ष पुरानी है। वैष्णव वंश के राजाओं की समाधि भी मंदिर परिसर में ही मुख्य मंदिर के दाहिनी ओर बनाई गई है। दोनों नवरात्रि पर्व पर आस्था की ज्योत लगातार श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा कर रहा है। मंदिर को विस्तार देते हुए बजरंग बली की नई मंदिर जीर्णोद्धार के द्वारा बनायी गयी है। इसी तरह साई बाबा की मूर्ति भी मुख्य मंदिर के बाहर परिसर में ही स्थापित की गई है। मंदिर का वातावरण दो तालाबों के बीच होने से काफी रमणीय बना हुआ है। बूढ़ा सागर को पुरानी पहचान देने से भी मंदिर की सुंदरता बढ़ी है। आगामाी नवरात्रि पर्व पर जिले के उक्त तीनों धाम श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। डोंगरगढ़ के पहाड़ियों में स्थित मां बम्लेंश्वरी के दर्शन जहां लाखों श्रद्धालु करते है। वहीं मां पाताल भैरवी और शीतला सिद्ध पीठ में भी भक्तजनों की आस्था का दीप प्रज्ज्वलित होता है

                                                                                         (डॉ∙ सूर्यकांत मिश्रा)

                                                                               जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

                                                                                          मो∙ नंबर 94255-59291

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