मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

दीपक आचार्य का आलेख - दैत्यों का संहार करें तभी नवरात्रि सार्थक

 

आज से नवरात्रि पर्व आरंभ हो रहा है। सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

वर्ष भर में जो भी पर्व-त्योहार और उत्सव आते हैं उन सभी का वैज्ञानिक, सामाजिक और परिवेशीय महत्त्व है। हर अवसर के पीछे वैज्ञानिक आधार है और सम सामयिक नितान्त आवश्यकता भी।

इनका असर साल भर तक बना रहता है। नवरात्रि भी ऎसा ही पर्व है जिसमें जो कुछ किया जाता है उसका साल भर तक असर बना रहता है। लेकिन जो कुछ हो वह पूरी ईमानदारी और पवित्रता के साथ होना जरूरी है और उसमें कहीं भी किसी भी प्रकार का कोई दिखावा नहीं होना चाहिए, तभी इसका प्रभाव बना रह सकता है। इसके बिना कुछ भी दिखना या अनुभव करना संभव है ही नहीं।

जो लोग दिखावे के लिए कुछ करते हैं उसका प्रभाव दिखावों के दिनों तक ही सिमट कर रह जाता है। इनका कोई भी दूरगामी परिणाम सामने नहीं आ पाता। हाँ, इतना जरूर है कि ये तात्कालिक तौर पर कुछ होने का मिथ्या आभास दिला देते हैं।

नवरात्रि इन सभी प्रकार के पर्वों में सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यह सर्वोच्च परम सत्ता के आवाहन और शक्ति संचय से जुड़ा हुआ है। यह अपने आप में वह दुर्लभ अवसर है जिसमें नौ-दस दिन की आराधना और तप-त्याग, उपासना से इंसान वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जो उसे इच्छित होता है।

शक्ति उपासना का प्रभाव वर्णनातीत है। इसे सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर अनुभव ही किया जा सकता है। वर्तमान काल में शक्ति उपासना की सर्वाधिक आवश्यकता सर्वोपरि महसूस की जा रही है क्योंकि हम सभी लोग नाना प्रकार के असुरों और आसुरी वृत्तियों, पैशाचिक भावनाओं भरे नकारात्मक माहौल से घिरे हैं जहाँ तामसिक वृत्तियाँ हावी हैं। मन के कोनों से लेकर मस्तिष्क की दीवारों तक में अंधकार का साया पसरा हुआ है और वैचारिक प्रदूषणों के मारे शांति, संतोष और सुकून पलायन करते जा रहे हैं।

विराटकाय और भयंकर कारनामों में माहिर हर तरह के असुरों से निपटना आसान नहीं है। इसके लिए भगवती पराम्बा की आराधना के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। नवरात्रि का यह पर्व असुरों से मुक्ति और आसुरी वृत्तियों के निवारण का काल है जिसमें शक्ति संचय के माध्यम से हम साल भर के लिए प्रभावकारी ऊर्जा और परमाण्वीय शक्ति का संग्रहण कर लिया करते हैं ताकि निरापद और निर्बाध जीवन जी सकें।

शारदीय नवरात्रि पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक में परिवर्तनों का समय है जिसमें मन-मस्तिष्क, शरीर, स्वभाव, व्यवहार और प्राणी मात्र को प्रभावित कर देने वाले कई कारकों का समावेश एक साथ होता है और इसमें दैवीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके बगैर पार नहीं पाया जा सकता। यही कारण है कि इन दिनों सर्वत्र दैवी पूजा की धूम होती है।

जिन असुरों के संहार के लिए पूर्ववर्ती युगों में देवी ने अवतार लिए और संहार किया, उससे भी भयानक और भीषण असुर वर्तमान युग में हैं। यह अलग बात है कि अब असुरों को चेहरे-मोहरे या कद-काठी, रूप-रंग या और किसी से पहचानना आसान नहीं रहा।

अब असुरों ने भी युगीन माया का प्रभाव दिखाते हुए दोहरा-तिहरा चरित्र और मुखौटा संस्कृति को अपना लिया है जहाँ दिखने में सब कुछ सर्वश्रेष्ठ, अनुकरणीय एवं सर्वमान्य, सम्माननीय और आदरणीय होता है, मगर इसकी हकीकत ठीक इसके उलट होती है। 

अब असुरों को पहचानना दुनिया का सबसे बड़ा मुश्किल काम है। कुछ असुर बाहर के होते हैं, कई सारे असुर हमारे भीतर हुआ करते हैं। सच तो यह है कि हमारे आस-पास असुरों का जबर्दस्त जमावड़ा है। नवरात्रि की पूजा-उपासना, साधना और सब कुछ हो या भगवती की आराधना का कोई सा स्वरूप, सभी की सार्थकता तभी है जबकि हम असुरों के उन्मूलन को अपनी प्राथमिकता बनाएं।

पहले हृदय को शुद्ध करें, मस्तिष्क के शैतान का खात्मा करें, अपनी वृत्तियों में शुचिता लाएं, आस-पास शुद्धता लाएं। असुरों का साथ छोड़ें, उनसे मोहब्बत त्यागें, असुरों के माध्यम से स्वार्थ पूरे करने-कराने, अपने जायज-नाजायज काम करने-कराने के भाव त्यागें और उन सभी लोगों से संबंध त्यागें जो दिखते तो भद्र इंसान हैं लेकिन उनके भीतर नरपिशाच के भाव भरे हुए हैं। 

भीतरी-बाहरी असुरों से मुक्ति पाए या दिलाए बगैर  दैवी साधना का कोई महत्त्व नहीं है। हम कितने ही घण्टों और कितने ही उपचारों के साथ दैवी मैया की भक्ति कर लें, इसका कोई प्रभाव नहीं होगा यदि हम असुरों के साथ रहते हैं, असुरों का साथ देते हैं या फिर असुरों की  जयगान और परिक्रमाओं में रमे रहते हैं।

आजकल खूब सारे असुर हैं जो हर बाड़े-गलियारे और रास्तों में परेड कर रहे हैं।  चोरी-डकैती, बेईमानी, व्यभिचार, बलात्कार, शोषण, बेगारी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, कालाबाजारी, जमाखोरी करने वाले सारे के सारे लोग असुर ही हैं।

वहीं कामचोर, ड्यूटीचोर, कामटालू और भिखारियों की तरह कुछ न कुछ मिल जाने की आस लगाने वाले असुरों का भी मायाजाल चारों तरफ पसरा हुआ है। इन लोगों का साथ छोड़ना और इनका समूल खात्मा करना ही असल में नवरात्रि का मूल संदेश है और जो ऎसा नहीं करता है उस पर देवी मैया कभी खुश नहीं हो सकती।

हम कितने ही अनुष्ठान कर लें, कितने ही घण्टों दैवी मैया के नाम पर कुछ भी क्यों न कर लें, कितने ही टन प्रसाद चढ़ा लें, कितनी ही पैदल यात्राएं कर लें, कितने मन घी होम लें, चाहे कितना दिखावा कर लें, इसका कोई फायदा नहीं है।

आज भी शुंभ-निशुंभ, चण्ड-मुण्ड, महिषासुर, रक्तबीज और तमाम प्रकार के असुर हमारे आस-पास हैं, केवल इनका स्वरूप बदला हुआ है। इन्हें जाने-पहचाने और इनके उन्मूलन के लिए हरसंभव प्रयास करें, यही सच्ची दैवी उपासना है।

असुर विहीन हृदय और क्षेत्र में ही दैवी विराजमान रहती है। इस बार नवरात्रि में अन्दर-बाहर के असुरों का खात्मा करें, तभी दैवी मैया प्रसन्न होंगी। इस बात को ध्यान में रखकर नवरात्रि मनाएं, सुकून पाएं। जब सब तरफ स्वच्छता का संदेश आ-जा रहा है तो हम भी इसमें पीछे क्यों रहें।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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