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सीरिया की कहानी - खुदकुशी

सीरिया की कहानी

ज़करिया तमेर

1931 में दमिश्क में जन्म। ज़्यादातर कहानियाँ छोटी, व्यंग्यात्मक रंगत वाली और बिना शीर्षक के एक दो-तीन के सिलसिले में होती हैं। प्रस्तुत कहानी ज़करिया तमेर के मज़मुआ ‘तक्सीर रकाब’ से ली गई और इब्राहीम मुहावी के अंग्रेज़ी तर्जुमे की मदद से हिंदी में उल्था की गई है।

ख़ुदकशी

 

अनुवाद - सुरेश सलिल

 

रोज़ की आदत के मुताबिक़, दोपहर की नींद से जागते ही, आरिफ़ चीख़ा, ‘रईफ़ा..!... कॉफ़ी!!’

उसकी बीवी रईफ़ा तेज़-तेज़ क़दमों चलते बेडरूम में दाख़िल हुई और भाप उठती हुई गर्मागर्म कॉफ़ी का प्याला उसके आगे पेश कर दिया। उसने बताया, जब वह सो रहा था तो उसकी वालिदा का फ़ोन आया था। वालिद को ठंड लग गई है और वो खाँसी-जुकाम से परेशान हैं।

‘उम्मीद है अब तक ठीक हो गये होंगे।’

वो आहिस्ता-आहिस्ता, सुकून के साथ कॉफ़ी के घूँट भरता रहा। फिर यक्-ब-यक्, जैसे कोई भूली बात याद आ गई हो, उसने रईफ़ा से कहा, ‘हाँ, अब बताओ, तुम क्या कहना चाहती हो!

मैंने अक्सर ग़ौर किया है कि जब तुम्हें कुछ कहना होता है, खुल कर नहीं कह पाती।’

रईफ़ा हँसी। कहा, ‘मुझे गाड़ी चलाना सिखा दो! मैं ड्राइव करना चाहती हूँ।’

आरिफ़ का चेहरा ग़ुस्से से सुर्ख़ हो उठा। उसने साफ़ लफ़्ज़ों में इन्कार कर दिया- ‘मैं तुम्हारी यह ख़्वाहिश पूरी नहीं कर सकता। इसमें तुम्हारी अपनी ज़िन्दगी के लिए ख़तरा है।’

रईफ़ा ने इस बाबत उसे तसल्ली देनी चाही, मगर आरिफ़ ने बीच में ही उसे रोक दिया- ‘ख़ारिज करो इस मामले को। इस बाबत आइंदा मैं कुछ भी नहीं सुनना चाहता।’

त्योरी चढ़ाये-चढ़ाये ही उसने कपड़े पहने और नौवी मंज़िल के अपने फ़्लैट से नीचे आया। कार में बैठा और अब्बाजान की ख़ैर-ख़बर लेने निकल पड़ा।

पहुँच कर देखा कि वालिद सोफे़ पर पड़े हैं और वालिदा पुरानी ज़ुराबें रफ़ू कर रही हैं। वह ख़ामोशी के साथ उनके सामने जाकर बैठ गया। वालिदा ने उसकी त्योरी चढ़ी होने की वजह दर्या∂़त करनी चाही, तो उसने रइर्फ़ा वाला वही वाक़या बयान कर दिया।

‘तो इसमें नाराज़गी की क्या बात है, भला?’ वालिदा ने हैरत से भर कर पूछा। ‘तुम्हारे पास कार है और रईफ़ा स्मार्ट लड़की है। जल्दी ही सीख जाएगी।’

आरिफ़ ने हिकारत भरे लहज़े में कहा, ‘यह हक़ीक़त है कि औरतें आधे दिमाग़ की होती हैं। आज वह कार चलायेगी और कल मुझे चलाने लगेगी।’

सरसरी तौर पर उसने घड़ी पर नज़र डाली और वालिद के जगने का इंतज़ार किये बग़ैर चलने को उठ खड़ा हुआ। मान लिया कि बीमार हैं तो ठीक भी हो जाएंगे।

वह कॉफ़ी हाउस पहुँचा। उसके दोस्त वहाँ पहले से मौजूद थे और अपनी अपनी बीवियों की लानत मलामत करने में एक-दूसरे से होड़ ले रहे थे। उसने भी बयान किया कि उसकी बीवी ने क्या फ़र्माइश की और उसने किस तरह उसे बेज़बान कर दिया। सभी उसकी तारीफ़ के पुल बाँधने लगे, कि उसने सही क़दम उठाया, वर्ना ये औरतें तो हर लम्हे मर्दों की मुश्कें कसने पर आमादा रहती हैं। कुछ अरसे बाद आरिफ़ को भूख महसूस होने लगी। अलावा इसके_ वो दोस्तों की रोज़मर्राह गुफ़्तगू से बोर भी हो रहा था। लिहाजा उठ खड़ा हुआ और घर की जानिब लौट पड़ा।

घर पहुँचकर उसने देखा कि रईफ़ाऔरतों की एक फै़शन मैगज़ीन के पन्ने पलट रही है।

आरिफ़ के दिमाग़ का पारा और ऊँचाई पर जा पहुँचा। उसने अपनी बीवी के हाथों से मैगज़ीन झपट कर छीनी और ग़ुस्से से तमतमाये चेहरे के साथ उसकी चिंदियाँ उड़ाने लाग। चिंदी-चिंदी करके मैगज़ीन के सारे वर्के़ फ़र्श पर छितराने के बाद वह चीख़ा- ‘कितनी बार मैंने तुम्हें हिदायत दी है कि ऐसी फ़ोहश चीज़ें घर में नहीं आनी चाहिए! ये रिसाले बेशर्मी से भरे होते हैं और दिमाग़ में ख़ुराफ़ात पैदा करने के सिवा कुछ नहीं देते। मुस्लिम घरों की औरतों और लड़कियों को इनसे तौबा करनी चाहिए।’

रईफ़ा अपने ख़ाविन्द की सारी गुफ़्तगू चुपचाप सुनती रही। एक भी लफ़्ज़ उसके मुँह से नहीं निकला। फिर वह चुपचाप उठी और टीवी ऑन करके उसके सामने बैठ गई।

आरिफ़ का गुस्सा फिर भड़क उठा- ‘याद है जब हमने टीवी ख़रीदा था तो क्या शर्त रखी थी? मैंने साफ़-साफ़ कहा था कि टीवी पर सिर्फ़ ख़बरें देखी जायेंगी, दीनी प्रोग्राम देखे जायेंगे और पाक कुआर्न की आयतें सुनी जाएँगी।... और तुम फ़ारेन फिल्म देख रही हो! महजब में इस तरह की फिल्में और सीरियल देखना ग़लत माना गया है।...’

‘फिर भला वक़्त काटने... दिल बहलाने के लिए मैं क्या करूँ?’ घुटती हुई सी आवाज़ में रईफ़ा ने सवाल किया।

‘घर की सफ़ाई, कपड़े धोना उन पर इस्तरी करना,फ़र्श पर पोंचा लगाना! कितनी सारी चीज़ें तो हैं। सफ़ाई की सफ़ाई और खेल का खेल!... और याद है, मैंने तुम्हें कु़रआन मजीद की आयतें याद करने को कहा था। उससे मन को सुकून मिलता है। बुरे ख़यालात भी मन में नहीं आते। मगर तुमने पहला सूरा-भर याद किया। कितनी सारी किताबें हैं घर में जिनमें पीरो- मुर्शिद की ज़िन्दगी के हालात बयान हैं। मगर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि तुमने कभी भूले से भी कोई किताब आल्मारी से नहीं निकाली।... या ख़ुदा, इस नये ज़माने की औरतों से बचाओ!’ एक ही साँस में आरिफ़ इतना सब बोल गया।

रईफ़ा सिर थाम कर यक्बारगी वालकनी की ओर भागी और नौवीं मंज़िल से छलाँग लगाने की कोशिश की। दौड़ कर आरिफ़ ने उसे रोका और दाएँ गाल पर एक तमाचा रसीद करते हुए कहा, ‘ख़ुदकशी करने वालों पर ख़ुदा लानत भेजता है। ख़ुदकशी करना अच्छी बात नहीं।’

अब रईफ़ा बेडरूम की तरफ़ भागी और बेड पर गिर कर फफक पड़ी। आरिफ़ ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ़ खींचना चाहा, लेकिन रईफ़ा ने झटके से हाथ छुड़ा लिया, मानों उसकी बग़ल में उसका शोहर नहीं, कोई शैतान हो।

आरिफ़ ने फिर उसे उसकी चूक के लिए आगाह किया, ‘ख़ुदा और पैग़म्बर उस औरत से नफ़रत करते हैं, जो अपने ख़ाविन्द की वाजिब ज़रूरतें नहीं पूरी करती। शौहर की दिलजोई करना हर औरत का पहला फ़र्ज़ माना गया है मजहब में।’

रईफ़ा अभी तक पेट के बल लेटी सुबक रही थी। अब उसने अपने आँसू पोंछे और पीठ के बल चित लेटकर अपनी टाँगें और जाँघें पूरी तरह खोल दीं।

यह सब करने के दरमियान उसे बराबर अहसास होता रहा कि वह एक बार फिर ख़ुदकशी की कोशिश कर रही है।

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