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दीपक आचार्य का आलेख - संकल्प दृढ़ रखें तभी साधना सफल

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जीवन का प्रत्येक कर्म साधना है जिसमें परिश्रम से सफलता पायी जा सकती है। यह परिश्रम हम स्वयं को ही अपने व्यक्तिगत स्तर पर करना होता है। कोई दूसरा हमें अपनी साधना में सहयोग कर सकता है, इसका प्रत्यक्ष सहभागी नहीं हो सकता  

इस दृष्टि से मानसिक, शारीरिक और परिवेशीय हर प्रकार का कर्म जीवन साधना का ही हिस्सा है। यह रही लोक व्यवहार की बात, जिसका हर पक्ष सांसारिक होता है और इसमें कर्म संपादन से लेकर सफलता पाने तक के सभी रास्ते लोक से जुड़े हुए हैं यानि की सभी प्रकार के कर्मों का वास्ता संसार से पड़ता है।

इसलिए इसमें विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग मानसिकता वाले लोगों से काम पड़ता है। इनमें प्रमुख रूप से तीन प्रकार के लोग होते हैं। सात्विक, राजसी और तामसिक। आजकल इनमें दूसरी किस्में और जुड़ गई हैं। कुछ लोग तीनों ही वृत्तियों के मिश्रण होते हैं। इनके बारे में कभी पता नहीं चलता कि इनकी तासीर क्या है।

कुछ लोग आधे या पूरे पागलों की तरह होते हैं, इनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि कौनसी बात इन्हें कब अच्छी या बुरी लग जाए।  इसी प्रकार एकतरफा भ्रमों का आवरण ओढ़ कर अपनी-अपनी शंकाओं और अपने पागलपन में जीने वालों की भी सब तरफ जबर्दस्त भरमार है।

यह तो रही सांसारिक लोकाचार की बात। इससे थोड़ा सा ऊपर उठकर सोचें और दैवीय साधनाओं की बात करें तो वहाँ सांसारिकों से कहीं अधिक अदृश्य और आकाशी बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

जो इंसान प्रकृति से जितना अधिक संघर्ष करता है, ईश्वर की ओर उन्मुख होने की कोशिश करता है, अपने भाग्य को पछाड़ कर कर्म, त्याग या तपस्या के बल पर कुछ पाने का प्रयास करता है, मनुष्येतर किसी भी योनि के ऊपरी लोेकों से संपर्क करने या देवी-देवताओं की कृपा पाने की दिशा में कदम बढ़ाता है, उसे नाना प्रकार की समस्याओं, बाधाओं और विषम-विपरीत परिस्थितियों से सामना करना ही पड़ता है।

हर आशातीत सफलता और सिद्धि बाधाओं की छाती पर विजय के बाद ही प्राप्त होती है। ईश्वर को पाने या उसकी कृपा से रूबरू होने के रास्तों में सेवा-परोपकार या जप-तप साधना मुख्य हैं।

जो लोग साधना करते हैं उन्हें धीरे-धीरे दिव्यता का अहसास होने के साथ ही अपने आप के दूसरों से एकदम अलग होने तथा ईश्वरीय विभूतियों का अनुभव होना आरंभ हो जाता है। 

लेकिन यह उन्हीं को होता है जिनकी साधना संसार के दिखावे से दूर है, जिनका लक्ष्य इंसानों को दिखाना, आडम्बर करना और अपने आपको साधक कहलवा देना नहीं होना चाहिए।

सच्ची साधना करने वाले लोग अपनी साधना को संसार से छिपा कर करते हैं, ये सारे पाखण्डों से दूर रहकर पूरी निष्ठा के साथ अपने इष्ट देव या देवी की साधना में रमे रहते हैं।

तकरीबन सभी प्रकार के साधकों का यह कटु अनुभव रहा है कि ईश्वरीय मार्ग को पकड़ लेने और साधना आरंभ करने के बाद आत्मीय शांति और सुकून का अनुभव तो होता है लेकिन इसके साथ ही अनपेक्षित अवरोध भी आते रहते हैं।

यह अवरोध उन लोगों को ज्यादा आते हैं जो संसार और ईश्वर दोनों को राजी रखना चाहते हैं और अपनी साधना में संसार को अथवा संसार में रमण करते हुए साधना का मिश्रण कर देने के आदी होते हैं।

निष्काम और निरपेक्ष साधकों के लिए अपने जीवन में आने वाली हर घटना-दुर्घटना, अच्छा-बुरा, चाहा-अनचाहा भगवान का प्रसाद ही होता है और इसलिए वे इन आकस्मिक बाधाओं और सभी प्रकार की परेशानियों से मुक्त रहते हैं। ऎसे साधक ईश्वरीय साक्षात्कार शीघ्र पा लेते हैं।

लेकिन हम सभी के लिए यह उच्चावस्था पाना सामान्य नहीं है इसलिए अपने सामने आने वाले हर प्रकार के संकट बड़े और भारी लगते हैं तथा कई बार साधना करते हुए अश्रद्धा के भाव भी जगते हैं। अक्सर साधकों के सामने ऎसे-ऎसे अजीबोगरीब संकट आ जाते हैं जिनकी कल्पना कोई नहीं कर सकता।

और ये सब संकट अनायास और आकस्मिक रूप से आ धमकते हैं। ऎसा इसलिए होता है कि प्रकृति और नियति हमें अपने भाग्य से बांधे रखना चाहती है, ईश्वर हमारे संकल्पों की दृढ़ता और सिद्धि के लिए उपयुक्त भावभूमि की तलाश करना चाहता है अथवा साधक को दृढ़ निश्चयी और अनन्य भाव से परिपूर्ण बनाना चाहता है।

साधना के मार्ग को अपनाने के बाद संकटों और  समस्याओं से दो-चार होना ही पड़ेगा क्योंकि इन्हीं के माध्यम से हमारे पूर्वजन्मों के नकारात्मक भावों और पापों का निवारण होना होता है तभी हमें उस स्तर की शुचिता प्राप्त हो पाती है जिससे कि हमारा हृदय ईश्वरीय शक्तियों के लिए बेहतर मंच बन सके। परम शुचिता आने तक यह सब ऎसे ही होता रहता है।

आमतौर पर देखा यह जाता है कि साधकों के लिए साधनाकाल में हमेशा अपनी साधना की नियमितता और निरन्तरता को खण्डित करने के लिए या तो प्रलोभन सामने आएंगे अथवा ऎसी बाधाएं जो अपरिहार्य हैं। क्योंकि साधना करने वाले को शीघ्र से शीघ्र फल या वरदान प्रदान करने के इच्छुक देवी या देवता उसके मार्ग की समस्त नकारात्मकता और पूर्वजन्मकृत प्रारब्ध को नष्ट करने के लिए सारी विपदाएं और मानसिक तनाव पहले ही ला देते हैं ताकि साधक इनके होकर गुजरे और जितना जल्दी हो उसके ये कर्म क्षय हो जाएं।

साधना में विखण्डन या बाधाओं की स्थिति दो ही प्रकार से आ सकती है। एक तो ईश्वरीय शक्तियां अपने संकल्प, तीव्रता और श्रद्धा की थाह पाना चाहती हैं और दूसरा जीवात्मा के संचित पाप कर्मों को जितना जल्द हो सके, उसके खाते से समाप्त करवा देना चाहती हैं। क्योंकि ये दोनों ही बाधाएं हैं जो साधना में सिद्धि या सफलता के लिए बीच में आती ही आती हैं।

बाधाओं की प्राप्ति इस बात का भी साफ संकेत है कि हमारी साधना सफलता की ओर बढ़ रही है तथा अब सिद्धि प्राप्त होने का समय आने ही वाला है। बाधाएं सिद्धि पाने का पूर्वाभाव ही होती हैं।

सभी प्रकार के साधकों का अनुभव है कि सिद्धि या संकल्प में सफलता पाने का समय करीब आने पर विभिन्न प्रकार की आसक्तियां, प्रलोभन, संसाधन, मुद्रा या अन्य प्रकार के लुभावने अवसर या मोहित करने वाले लोग हमें घेरने लगते हैं अथवा कई सारे ऎसे आकस्मिक अवरोध आने लगते हैं कि हम अपनी साधना को पूरा करने में दिक्कत महसूस करने लगते हैं।

ऎसा समय इस बात का स्पष्ट संकेत होता है कि सिद्धि का समय अत्यन्त निकट है।  इस अवस्था के समय बहुत सारे साधक प्रलोभनों, आसक्ति और दबावों में आ जाते हैं, जिससे उनकी सिद्धि का समय आगे से आगे खिसकता जाता है और निराशा हाथ लगती है।

इस स्थिति में साधक को चाहिए कि वह किसी भी मोह में न पड़े, बाधाओं को चुनौती के रूप में लेकर अपने साधन कर्म की नियमितता और निरन्तरता को जारी रखे। ऎसा होने पर कुछ ही समय पश्चात सिद्धि अपने सामने साकार हो जाती है। इसलिए अपने संकल्प की दृढ़ता को हर हाल में बनाए रखें।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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