शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

दीप्ति सक्सेना की कविता - कब सुबह कब शाम हो गई...

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चलते चलते जाने कब शाम हो गयी
घटी सारी घटनाएँ आम हो गयी ,
हम खड़े थे लेकिन अब भी वहीं
जहाँ बैठ कर सोचा था हमने की ,
आज तो यहाँ कुछ खास होगा
वहीँ से बर्बादी की शुरुआत हो गयी ।

सफर ये जिंदगी बढ़ता चला गया
हम कुछ खास कर पाते ,
उससे पहले गलियां जाम हो गयी
पढाई से नौकरी ,
नौकरी से शादी
सपनों की तो जैसे भरमार हो गयी ,
लेकिन टूट गया वो हर एक सपना
जो मुझसे जुड़ा था ,
जब लड़के की सोच के आगे
मेरी हार हो गयी ,


लिख दी मैंने अपनी ही किस्मत
इस नरक के नाम ,
और आज एक बार फिर
इस खोखले समाज की जीत ,
और लड़की के सच्चाई की
हार हो गयी ,
जीत गया वो हर इंसा
जो इस रूढ़िवादिता से जुड़ा था ,
और खिलती वो कली -

बस मुरझाकर रह गयी

 

दीप्ति सक्सेना
सीकर रोड, जयपुर
राज ।

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