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उमेश मौर्य की 2 कहानियाँ - बिजनेस तथा वसुधैव कुटु्म्बकम

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बिजनेस

उमेश मौर्य

दर्पण कम्पनी के मालिक अनन्त बड़े ही सज्जन स्वभाव के थे। लोगों की सुख सुविधाओं का उन्हें हमेशा ख्याल रहता था। दीवाली के अवसर पर गिफ्ट और बोनस देना नहीं भूलते थे । महंगाई के चलते, समय-समय पर वेतन में वृद्धि करते रहते थे। उनकी सोच ये थी कि इतनी बड़ी इंडस्ट्री चलाने में छोटे स्तर के कर्मचारियों की आधारभूत भूमिका होती है। अगर ये खुश रहेंगे तो कम्पनी का विकाश अपने आप होता रहेगा। आखिर हम इन्हीं के काम से तो कमाते हैं। उच्चाधिकारी तो उनके प्रबंधन में मानसिक श्रम करते हैं। लेकिन शारीरिक श्रम के बिना मानसिक सोच विचार केवल रेत के महल तैयार करना है। इसलिए वे महंगाई को ध्यान में रखकर कर्मचारियों से हमेशा दयालु बने रहते थे। सारे कर्मचारी भी उनका सम्मान और कम्पनी को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।

ठीक इसके विपरीत उनके इकलौते बेटे का स्वभाव था। जो कि कम्पनी में डायरेक्टर की हैसियत से काम करता था। कम्पनी का आय-व्यय, लेखा-जोखा, कर्मचारियों को रखना, निकालना अभी उसी के तय से होता था। अनन्त जी अभी कम्पनी के किसी काम में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते थे। गॉव के पुराने बंगले में ही वो ज्यादा समय बिताते थे। बेटा ही अभी कम्पनी का सर्वेसर्वा था। लोगों के साथ मिलना, बातें करना, तो पिता के समान सामान्य था। लेकिन वह आधुनिक तरीके से बिजनेस करने में विश्वास रखता था। वह उस परिपोषी पौधे के समान था जो कि किसी पेड़ पर चिपककर अपना जितना से जितना हो सके पोषक तत्व चूस ले और खुद को हरा भरा बनाए रखे। चाहे पेड़ सूख ही जाय। उसकी ये सोच थी कि लोगों के बीच में रहकर उनसे उच्चाधिकारियों की या लोगों के खुद के बारे में इधर-उधर की सारी जानकारी मिलती रहेगी, और उसी आधार पर कर्मचारियों को दण्डित या कमियॉ निकाल कर वेतन में कमी करने के बहाने मिल जायेंगे।

लोगों के साथ में उठना-बैठना, खाना खाना, घूमना फिरना उसके चाल का एक हिस्सा था। भोले भाले लोग जब उतने बड़े मालिक के साथ बात कर लेते तो फूले न समाते। वे सोचते कि ये तो कितना अच्छा आदमी है। और भी उत्साहित होकर काम करते। उन्हें तो ऐसा लगता कि हम दुनिया के सबसे खुशनसीब आदमी है। साधारण लोग जब बड़े, स्वार्थी और चालाक लोगों की थोड़ी सी सहानुभूति पा जाते हैं। तो अपना सब कुछ भूल जाते है। उन्हें उनके पीछे की शक्ल का ज्ञान नहीं होता । अपनी तरह ही सब को समझते है।

समय ऐसे निकलता गया। जब से ये आया था। लोगों को न समय से वेतन, बोनस और ना ही वेतन वृद्धि की बात करने वाला कोई था। जब लोग उससे बोलते तो मार्केट की मंदी या कंपनी के घाटे की बात सुनाने लगता और लोगों को ईमानदारी से काम करने की सलाह देता। लोग सोचते सही बात है, महंगाई तो है ही। हो सकता है कम्पनी का घाटा हुआ हो। लेकिन ऐसा तो पहले कभी न हुआ था। आखिर महंगाई ने लोगों का सब्र तोड़ दिया। बेचारे कब तक बातों से काम चलाते। किराये के घर में रहना। कमरे के मालिक कभी भी रूम का दाम बढ़ा देते। बच्चों की पढ़ाई, दवाई-दरमस का खर्च, सब्जी के दाम दिन-ब-दिन आकाश छू रहे थे। ऐसी कितने दैनिक खर्चो में वेतन का पता ही नहीं चलता था। आर्थिक कड़की से सभी तंग आ गये थे।

एक दिन सब लोगों ने मिलकर हरताल करने की योजना बनाई। काम बन्द सब लोग कम्पनी के मैदान में इकट्ठा हो गये। मुर्दाबाद-मुर्दाबाद, हमारी मॉगें पूरी हो, के नारे लगाने लगे। लगभग 200 आदमियों की बुलंद आवाज ने उसका ध्यान आकर्षित किया। और आफिस से निकल मैदान में सबके सामने आया। लोगों ने उससे उसके पिता से मिलने की मॉग की और समस्या का समाधान मॉगा। उसमें कुछ लोगों के स्वर उच्च थे और क्रान्तिकारियो जैसे। जिसके डर से डायरेक्टर के साथ खड़ा सुरक्षाकर्मी भी भीड़ के साथ हो लिया। क्योंकि वह भी उसी भीड़ का एक हिस्सा था। और ये उनकी भी समस्या थी। डायरेक्टर ने लोगों से सोचने का समय लिया। और वहॉ से चला गया। लोग आपस में काना-फूसी करने लगे, लगता है कुछ होगा। आदमी तो अच्छा है हम लोगों न ऐसा पहले किया होता तो अब तक कुछ न कुछ हल निकल आता। काफी समय के बाद वह न आया। तो लोगों ने फिर नारे बाजी शुरू कर दी।

तभी किसी की नजर उसी भीड़ में शामिल उस डायरेक्टर पर पड़ी जो कि उन्हीं की भाषा बोल रहा था। उन्हीं के नारे लगा रहा था। उसने लोगों को समझाया कि आप लोग सही कह रहे है। आपकी समस्या हमारी समस्या है। हम भी आप की तरह एक आम आदमी है। ये काम हमें पहले कर देना चाहिए था। हमने सोच लिया है कल सुबह आप लोगों को बता दिया जायेगा। आप लोग काम पर जाये। और निश्चिन्त रहे।

लोग फिर खुशी खुशी अपने अपने काम पर लग गये। इस आशा में कि कल की सुबह हम लोगों का पुराना समय वापस आयेगा। हम और हमारा परिवार खुश रह सकेगा। अब जीवन सरलता से कट जायेगा। बड़ी मुश्किल से रात कटी और सुबह फिर लोग उसी मैदान में इकट्ठा हुए। लेकिन सब कुछ सोच के विपरीत था। आज उसका असली रूप सामने था।

कुछ बाहरी और नये सुरक्षाकर्मी के साथ डायरेक्टर, एक पेपर जिनमें लगभग चालीस कर्मचारियों का नाम था। जिन्हें कम्पनी ने हमेशा हमेशा के लिए निकालने का फैसला लिया था। उसमें उनके साथ चल रहे पुराने गार्ड का नाम सबसे ऊपर था। बाकी सारे ऊॅचे स्वर में बोलने वालों और क्रान्तिकारी विचार वालों का। भीड़ घीरे-घीरे शान्त हो गई। आवाजें दब गई। नामांकित कर्मचारी बाहर निकाल दिये गये। बाकी काम पर लग गये। डायरेक्टर मुस्कराया और धीरे से बोला। ये बिजनेस है।

अगले दिन नयी भर्ती का पेपर में इश्तिहार निकला। हजारों लोग गेट पे।

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वसुधैव कुटुम्बकम

उमेश मौर्य

मजहबी लड़ाई में पूरा देश जल रहा था। जिसको देखो वही अपने आपको अच्छा और सर्वोच्च धर्म का पुजारी साबित करना चाह रहा था। मुल्ला मौलवी, पंडित-पुजारी, सभी अपनी-अपनी तीर -कमान ताने हुए थे। जिसका असर समाज पर पूरी तरह व्याप्त हो रहा था। गॉव भी इससे अछूते न रहे। रे धीरे- धीरे माहौल हिंसक हो गया। कोई भी, कही भी, किसी की भी जान ले सकता था। बस मेरा धर्म अच्छा है, इसे किसी तरह मानो नहीं तो जीवन समाप्त समझो। ये दशा यहॉ तक खराब हो गई कि अब महिलाओं, लड़कियों, और बहू बेटियों की लाज भी सुरक्षित न थी। जो बच्चे अभी तक ठीक से बोल भी न सकते थे। उन्हें भी इस धार्मिक कट्टरता में अपने खून की बलि देनी पड़ी।

उस रात शहर की मुख्य सड़क के बगल दूर एक एकान्त घर के पास दो नौजवान युवकों के लहूलुहान शरीर को देखकर लगता था कि वो जिन्दा थे बस। एक दम्पति उन्हें अपने घर ले गये। उन्हें ये समझते देर न लगी कि ये दोनों इसी मजहबी लड़ाई के चलते एक दूसरे के शिकार हुए हैं। जैसे भी उन दोनों ने उनकी जितनी हो सकती थी। तन मन से सेवा की। बिना किसी भेदभाव उन्हें लगा जैसे उन्हें कुछ करने का अवसर मिल गया हो। जैसे मॉ बच्चे को देखकर बिलख पड़ती है। वैसे इन दम्पति का दर्द उनमें एकाकार हो गया था। अब तो उनका एक ही लक्ष्य था कि कैसे भी इन दोनों का जीवन बच जाये और पूर्ण स्वस्थ हो अपने घर सकुशल पूर्वक जा सके।

सुबह से शाम तक आयुर्वेदिक औषधियों की खोज। घर में ही तरह-तरह की दवाओं का निर्माण करना। यहॉ तक उन दोनों के मल-मूत्र तक का ध्यान रखने में भी मन में किसी भी प्रकार के खिन्न भाव का उदय न होता। बिल्कुल शान्त स्वभाव का ये जोड़ा किस धर्म का था किसी को पता न था। दिन भर इनकी सेवा सुश्रुत में ही मग्न जैसे रहते थे।

संध्या काल में वे दोनों पति-पत्नि घर के सामने के बगीचे में अपनी छोटी सी फुलवारी में टहला करते थे। जिसमें गेंदा के पुष्प, गुलाब की महक, रात को रातरानी की खुश्बू से पूरा वातावरण स्वर्गीय होता था। छोटी - छोटी गिलहरियॉ हमेशा वहॉ घूमती रहती थी। सामने अमरूद के पेड़ पर हरे-हरे सुग्गे तोते और बुलबुल अक्सर मीठे फलों का स्वाद लेते रहते थे। घर के ऊपर के कोटर में एक कबूतर का जोड़ा भी रहता था। और उन दोनों में हमेशा प्यार की गुटुर-गूं लगी रहती थी। जिसे लोग अपशकुन मानते हैं। यहॉं बहुत दिनों से बड़ी मस्ती में रहा करते थे। कुत्ते बिल्ली ज्यादा समय भागम-भाग खेलते रहते थे। कभी-कभी तो बिल्ली उन दोनों के बीच आकर छुप जाती।

घर के अन्दर एकदम स्वच्छता का वातावरण दमक रहा था। सारे सामान व्यवस्थित कुछ पढ़ने की कुछ पुरानी किताबें, दरवाजे के प्रवेश के सामने एक बड़े आकार का दर्पण जिसमें दोनों एक साथ आ जाते थे। लगा था। उनके चेहरे पर अपार शान्ति कभी भी व्याकुलता व चिन्ता तो देखने को न मिली। बस एक दूसरे को देखते तो मुस्करा देते। मुस्कान में शालीनता का भण्डार होता। पत्नि के वाणी में एक अजीब सी मिठास जो आत्मा को छू जाती। समर्पित जीवन उनकी आदत थी।

उनके घर को देखकर आश्चर्य हुआ। ऐसे स्वच्छ और नैसर्गिक आनन्द से भरे घर में एक भी इश्वरीय एवं धार्मिक मान्यताओं से जुड़े चिन्ह मौजूद न थे। न कोई फोटो, न ही कोई धार्मिक किताबें, न कोई मूर्ति, न मस्जिद के नमाज अदायगी के कोई रिवाज उनके जीवन में देखने को मिला। न यज्ञ, न रीति-रिवाज, न धर्म अधर्म, पाप-पुष्य। स्वर्ग-नरक, और न भूत, भविष्य, केवल वर्तमान की सुधि और उसे बेहतर बनाने का सहज प्रयत्न। भूत और भविष्य तो वर्तमान के ही दो रूप हैं। एक आगे, तो एक पीछे सहज ही लगा रहता है। वर्तमान ही इनका आधार है। वहॉ कुछ भी ऐसा न था जो व्यक्ति के मस्तिष्क को स्वतंत्र रखने में बाधक हो। केवल था तो प्रकृति और प्रेम, स्वयं और सम्पूर्ण जगत के लिए।

लगभग पन्द्रह-बीस दिनों के बाद दोनों जख्मी युवक चलने फिरने के लायक हो गये। उस दम्पति के आत्मिक खुशी का ठिकाना न रहा। एक दूसरे की ओर निहार कर आपस में धन्यवाद का संकेत दिया और युवकों के पास गये। बिना किसी व्यग्रता के सामान्य भाव में कहा- अब आप दोनों पूर्ण स्वस्थ हो गये हो। अपने-अपने घर को जा सकते हो । न कोई औपचारिकता, न ही कोई विशेष परिचय का आग्रह।

दोनों युवक ठीक होने के बाद एक दूसरे को देखकर फिर से ऑखें तरेरने लगे और आगे अपने आपको अच्छा देखकर खुश भी हुए। जाने से पहले उन दम्पति ने उनसे केवल एक बात कही। हमें किसी भी धर्म से मत जोड़ना। दोनों युवकों की ऑखें भर आयी। एक दूसरे से गले लग गये। घर से बाहर निकले। लेकिन पीछे देखे बिना न रह सके और उनके घर के ऊपर लिखे शब्दों को कभी न भूल पाये। वसुधैव कुटुम्बकम्।

- उमेश मौर्य

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