विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

महावीर उत्तरांचली की 26 चुनिंदा ग़ज़लें

image

26 ग़ज़लें

ग़ज़लकार : महावीर उत्तरांचली

(1.)

ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश की घुट्टी पिलाते हो
बड़े आराम से तुम, चैन की बंसी बजाते हो

है मुश्किल दौर, सूखी रोटियां भी दूर हैं हमसे
मज़े से तुम कभी काजू, कभी किशमिश चबाते हो

नज़र आती नहीं, मुफ़लिस की आँखों में तो खुशहाली
कहाँ तुम रात-दिन, झूठे उन्हें सपने दिखाते हो

अँधेरा करके बैठे हो, हमारी ज़िन्दगानी में
मगर अपनी हथेली पर, नया सूरज उगाते हो

व्यवस्था कष्टकारी क्यों न हो, किरदार ऐसा है
ये जनता जानती है सब, कहाँ तुम सर झुकाते हो

(2.)

जो व्यवस्था भ्रष्ट हो, फ़ौरन बदलनी चाहिए
लोकशाही की नई, सूरत निकलनी चाहिए

मुफलिसों के हाल पर, आंसू बहाना व्यर्थ है
क्रोध की ज्वाला से अब, सत्ता
बदलनी चाहिए

इंकलाबी दौर को, तेज़ाब दो जज़्बात का
आग यह बदलाव की, हर वक्त जलनी चाहिए

रोटियां ईमान की, खाएं सभी अब दोस्तो
दाल भ्रष्टाचार की, हरगिज न गलनी चाहिए

अम्न है नारा हमारा, लाल हैं हम विश्व के
बात यह हर शख़्स के, मुहं से निकलनी चाहिए

(3.)

बाज़ार मैं बैठे मगर बिकना नहीं सीखा
हालात के आगे कभी झुकना नहीं सीखा

 

तन्हाई मैं जब छू गई यादें मिरे दिल को
फिर आंसुओं ने आँख मैं रुकना नहीं सीखा

फिर आईने को बेवफा के रूबरू रक्खा
मैंने वफ़ा की लाश को ढकना नहीं सीखा

जब चल पड़े मंजिल की जानिब ये कदम मेरे
फिर आँधियों के सामने रुकना नहीं सीखा

(4.)

साधना कर यूँ सुरों की, सब कहें क्या सुर मिला
बज उठें सब साज दिल के, आज तू यूँ गुनगुना

हाय! दिलबर चुप न बैठो, राज़े-दिल अब खोल दो
बज़्मे-उल्फ़त में छिड़ा है, गुफ़्तगूं का सिलसिला

उसने हरदम कष्ट पाए, कामना जिसने भी की
व्यर्थ मत जी को जलाओ, सोच सब अच्छा हुआ

इश्क़ की दुनिया निराली, क्या कहूँ मैं दोस्तो
बिन पिए ही मय की प्याली, छा रहा मुझपर नशा

मीरो-ग़ालिब की ज़मीं पर, शेर जो मैंने कहे
कहकशां सजने लगा और लुत्फ़े-महफ़िल आ गया

(5.)

बड़ी तकलीफ देते हैं ये रिश्ते
यही उपहार देते रोज़ अपने 

ज़मीं से आस्मां तक फ़ैल जाएँ
धनक में ख्वाहिशों के रंग बिखरे

नहीं टूटे कभी जो मुश्किलों से
बहुत खुद्दार हमने लोग देखे

ये कड़वा सच है यारों मुफलिसी का
यहाँ हर आँख में हैं टूटे सपने

कहाँ ले जायेगा मुझको ज़माना
बड़ी उलझन है, कोई हल तो निकले

(6.)

तीरो-तलवार से नहीं होता
काम हथियार से नहीं होता

घाव भरता है धीरे-धीरे ही
कुछ भी रफ़्तार से नहीं होता

खेल में भावना है ज़िंदा तो
फ़र्क कुछ हार से नहीं होता

सिर्फ़ नुक्सान होता है यारो
लाभ तकरार से नहीं होता

उसपे कल रोटियां लपेटे सब
कुछ भी अख़बार से नहीं होता

(7.)

यूँ जहाँ तक बने चुप ही मै रहता हूँ
कुछ जो कहना पड़े तो ग़ज़ल कहता हूँ

जो भी कहना हो काग़ज़ पे करके रक़म
फिर क़लम रखके ख़ामोश हो रहता हूँ

दोस्तो! जिन दिनों ज़िंदगी थी ग़ज़ल
ख़ुश था मै उन दिनों, अब नहीं रहता हूँ

ढूंढ़ते हो कहाँ मुझको ऐ दोस्तो
आबशारे-ग़ज़ल बनके मै बहता हूँ

(8.)

चढ़ा हूँ मै गुमनाम उन सीढियों तक
मिरा ज़िक्र होगा कई पीढ़ियों तक

ये बदनाम क़िस्से, मिरी ज़िंदगी को
नया रंग देंगे, कई पीढ़ियों तक

ज़मा शायरी उम्रभर की है पूंजी
ये दौलत ही रह जाएगी पीढ़ियों तक

"महावीर" क्यों मौत का है तुम्हे ग़म
ग़ज़ल बनके जीना है अब पीढ़ियों तक

(9.)

काश! होता मज़ा कहानी में
दिल मिरा बुझ गया जवानी में

फूल खिलते न अब चमेली पर
बात वो है न रातरानी में

उनकी उल्फ़त में ये मिला हमको
ज़ख़्म पाए हैं बस निशानी में

आओ दिखलायें एक अनहोनी
आग लगती है कैसे पानी में

तुम रहे पाक़-साफ़ दिल हरदम
मै रहा सिर्फ बदगुमानी में

(10.)

रेशा-रेशा, पत्ता-बूटा
शाखें चटकीं, दिल-सा टूटा

ग़ैरों से शिकवा क्या करते
गुलशन तो अपनों ने लूटा

ये इश्क़ है इल्ज़ाम अगर तो
दे
इल्ज़ाम मुझे मत झूटा

तुम क्या यार गए दुनिया से
प्यारा-सा इक साथी छूटा

शिकवा क्या ऊपर वाले से
भाग मिरा खुद ही था फूटा

(11.)

जां से बढ़कर है आन भारत की
कुल जमा दास्तान भारत की

सोच ज़िंदा है और ताज़ादम
नौ'जवां है कमान भारत की

देश का ही नमक मिरे भीतर
बोलता हूँ ज़बान भारत की

क़द्र करता है सबकी हिन्दोस्तां
पीढियां हैं महान भारत की

सुर्खरू आज तक है दुनिया में
आन-बान और शान भारत की

(12.)

दिल मिरा जब किसी से मिलता है
तो लगे आप ही से मिलता है

लुत्फ़ वो अब कहीं नहीं मिलता
लुत्फ़ जो शा'इरी से मिलता है

दुश्मनी का भी मान रख लेना
जज़्बा ये दोस्ती से मिलता है

खेल यारो! नसीब का ही है
प्यार भी तो उसी से मिलता है

है "महावीर" जांनिसारी क्या
जज़्बा ये आशिक़ी से मिलता है

(13.)

फ़न क्या है फनकारी क्या
दिल क्या है दिलदारी क्या

जान रही है जनता सब
सर क्या है, सरकारी क्या

झांक ज़रा गुर्बत में तू
ज़र क्या है, ज़रदारी क्या

सोच फकीरों के आगे
दर क्या है, दरबारी क्या

(14.)

तलवारें दोधारी क्या
सुख-दुःख बारी-बारी क्या

क़त्ल ही मेरा ठहरा तो
फांसी, खंजर, आरी क्या

कौन किसी की सुनता है
मेरी और तुम्हारी क्या

चोट कज़ा की पड़नी है
बालक क्या, नर-नारी क्या

पूछ किसी से दीवाने
करमन की गति न्यारी क्या

(15.)

हार किसी को भी स्वीकार नहीं होती
जीत मगर प्यारे हर बार नहीं होती

एक बिना दूजे का, अर्थ नहीं रहता
जीत कहाँ पाते, यदि हार नहीं होती

बैठा रहता मैं भी एक किनारे पर
राह अगर मेरी दुशवार नहीं होती

डर मत लह्रों से, आ पतवार उठा ले
बैठ किनारे, नैया पार नहीं होती

खाकर रूखी-सूखी, चैन से सोते सब
इच्छाएं यदि लाख उधार नहीं होती

(16.)

तसव्वुर का नशा गहरा हुआ है
दिवाना बिन पिए ही झूमता है

गुज़र अब साथ भी मुमकिन कहाँ था 
मैं उसको वो मुझे  पहचानता है

गिरी  बिजली नशेमन पर हमारे
न रोया कोई कैसा हादिसा है

बलन्दी नाचती है सर पे चढ़के
कहाँ वो मेरी जानिब देखता है

जिसे कल ग़ैर समझे थे वही अब
रगे-जां में हमारी आ बसा है

 

(17.)

नज़र में रौशनी है
वफ़ा की ताज़गी है
 
जियूं चाहे मैं जैसे
ये मेरी ज़िंदगी है
 
ग़ज़ल की प्यास हरदम
लहू क्यों मांगती है
 
मिरी आवारगी में
फ़क़त तेरी कमी है
 
इसे दिल में बसा लो
ये मेरी शा'इरी है
 

(18.)

 
सोच का इक दायरा है, उससे मैं कैसे उठूँ
सालती तो हैं बहुत यादें, मगर मैं क्या करूँ
 
ज़िंदगी है तेज़ रौ, बह जायेगा सब कुछ यहाँ
कब तलक मैं आँधियों से, जूझता-लड़ता रहूँ
 
हादिसे इतने हुए हैं दोस्ती के नाम पर
इक तमाचा-सा लगे है, यार जब कहने लगूं
 
जा रहे हो छोड़कर इतना बता दो तुम मुझे
मैं तुम्हारी याद में तड़पूँ या फिर रोता फिरूँ
 
सच हों मेरे स्वप्न सारे, जी, तो चाहे काश मैं
पंछियों से पंख लेकर, आसमाँ छूने लगूं
 

(19.)

 
दिल से उसके जाने कैसा बैर निकला
जिससे अपनापन मिला वो ग़ैर निकला
 
था करम उस पर ख़ुदा का इसलिए ही
डूबता वो शख़्स कैसा तैर निकला
 
मौज-मस्ती में आख़िर खो गया क्यों
जो बशर करने चमन की सैर निकला
 
सभ्यता किस दौर में पहुँची है आख़िर
बंद बोरी से कटा इक पैर निकला
 
वो वफ़ादारी में निकला यूँ  अब्बल
आंसुओं में धुलके सारा  बैर निकला
 

(20.)

 
आपको मैं मना नहीं सकता
चीरकर दिल दिखा नहीं सकता
 
इतना पानी है मेरी आँखों में
बादलों में समा नहीं सकता
 
तू फरिश्ता है दिल से कहता हूँ
कोई तुझसा मैं ला नहीं सकता
 
हर तरफ़ एक शोर मचता है
सामने सबके आ नहीं सकता
 
कितनी ही शौहरत मिले लेकिन
क़र्ज़ माँ का चुका नहीं सकता
 
(21.)
 
राह उनकी देखता है
दिल दिवाना हो गया है
 
छा रही है बदहवासी
दर्द मुझको पी रहा है
 
कुछ रहम तो कीजिये अब
दिल हमारा आपका है
 
आप जबसे हमसफ़र हो
रास्ता कटने लगा है
 
ख़त्म हो जाने कहाँ अब
ज़िंदगी का क्या पता है
 
(22.)
 
नज़र को चीरता जाता है मंज़र
बला का खेल खेले है समन्दर
 
मुझे अब मार डालेगा यकीनन
लगा है हाथ फिर क़ातिल के खंजर
 
है मकसद एक सबका उसको पाना
मिल मस्जिद में या मंदिर में जाकर
 
पलक झपकें तो जीवन बीत जाये
ये मेला चार दिन रहता है अक्सर
 
नवाज़िश है तिरी मुझ पर तभी तो
मिरे मालिक खड़ा हूँ आज तनकर
 
(23.)
 
बीती बातें याद न कर
जी में चुभता है नश्तर
 
हासिल कब तक़रार यहाँ
टूट गए कितने ही घर
 
चाँद-सितारे साथी थे
नींद न आई एक पहर
 
तनहा हूँ मैं बरसों से
मुझ पर भी तो डाल नज़र
 
पीर न अपनी व्यक्त करो
यह उपकार करो मुझ पर
 
(24.)
छूने को आसमान काफ़ी है
पर अभी कुछ उड़ान बाक़ी है
 
कैसे ईमाँ बचाएं हम अपना
सामने खुशबयान साकी है
 
कैसे वो दर्द को ज़बां देगा
क़ैद में बेज़बान पाखी है
 
लक्ष्य पाकर भी क्यों कहे दुनिया
कुछ तिरा इम्तिहान बाक़ी है
 
कहने हैं कुछ नए फ़साने भी
इक नया आसमान बाक़ी है
 
(25.)
लहज़े में क्यों बेरूख़ी है
आपको भी कुछ कमी है
 
पढ़ लिया उनका भी चेहरा
बंद आँखों में नमी है
 
सच ज़रा छूके जो गुज़रा
दिल में अब तक सनसनी है
 
भूल बैठा हादिसों में
ग़म है क्या और क्या ख़ुशी है
 
दर्द काग़ज़ में जो उतरा
तब ये जाना शाइरी है
 
(26.)
 
धूप का लश्कर बढ़ा जाता है
छाँव का मंज़र लुटा जाता है
 
रौशनी में इस कदर पैनापन
आँख में सुइयां चुभा जाता है
 
चहचहाते पंछियों के कलरव में
प्यार का मौसम खिला जाता है
 
फूल-पत्तों पर लिखा कुदरत ने
वो करिश्मा कब पढ़ा जाता है
 
***************************
ग़ज़लकार : महावीर उत्तरांचली

(शा'इर, कवि व कथाकार)

उपसम्पादक, "कथा संसार" (त्रिमासिक, ग़ाज़ियाबाद)

साहित्य सहभागी, "बुलंदप्रभा" (त्रिमासिक, बुलंदशहर)

आपकी ग़ज़लों का एक म्यूजिक एल्बम "फिर वही आवारगी" सोनोटेक म्यूजिक कंपनी से जारी हुआ है जिसे राजेंद्र तलवार और साधना सरगम ने गाया है और सुजीत कुमार ओझा ने संगीतबद्ध किया है

--

संपर्क : बी-4 /79, पर्यटन विहार, वसुंधरा इन्क्लेव, दिल्ली 110096

चलभाष: 9818150516

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget