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उमेश मौर्य की 2 लघुकथाएँ

नौकरी

अक्षर दो साल बाद अपने घर लौटा। बच्चे बडे़ हो गये थे। घर में खुशी का माहौल फैला था। पिता जी आ रहे थे। इंतजार हो रहा था।

तभी एक टैक्सी द्वार पर आकर रुकी। सबकी ऑखें अक्षर पर गड़ गई। सुषमा को आज जैसे ऑखें मिल गई हो। अक्षर में कहीं खो गई। बच्चे चिल्ला पड़े पिता जी आ गये, पिता जी आ गये। और लिपट कर बातें शुरू भी हो गई।

आप इतने दिनों के लिए क्यों चले जाते हो ? बच्चों ने बातें शुरू कर दी

आप जब चले जाते हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मॉ भी अकेले में बहुत रोती है। पिता जी अब मत जाना।

लेकिन तुम फिर बड़े कैसे होगे। तुम्हें पढ़ना है। बड़ा बनना है न। बोलो...

अगर आप मेरी पढाई के लिए जाते हो तो मैं नही पढूंगा। अब आप मेरे पास ही रहना।

ठीक है मेरा राजा बेटा, अब नहीं जाऊॅगा, अच्छा जाओ खेलो देखो तुम्हारी मॉ को कितना गुस्सा आ रहा है।

कितने दिन की छुट्टी मिली - सुषमा बिदकते हुए बोली

25 दिन की

दो साल में 25 दिन की - सुषमा आवाक सी होकर बोली

10 साल हो गये शादी के हम कितने दिन साथ रहे। केवल दूसरों के लिए पूरी जिन्दगी दे दो। अपनी भी कोई जिन्दगी है क्या। छोड़ दो नौकरी। हम साथ साथ रहेंगे।

लेकिन सुषमा ! अपिॅत का क्या होगा ?

हम यहीं छोटा मोटा काम करेंगे लेकिन साथ रहेंगे बस। अब अकेले नहीं रहा जाता। तुम्हें पता है तुम्हारे बिना जीने की इच्छा नहीं होती। पैसा ही सब कुछ नहीं है।

नहीं सुषमा ऐसे नहीं बोलते, कुछ दिन और काम कर लूं फिर तो तेरी ही नौकरी करूंगा। बोलो वेतन क्या दोगी।

तुम्हारी जो मर्जी ले लेना, अब मस्का मत मारो। हॉथ पैर धुल कर आराम कर लो। थक गये होगे। खाना लगाऊं क्या ?

इक छोटी सी जिन्दगी, हॉथों से फिसल जाये,

रोके भी कोई कैसे ये वक्त की हवाऐं,

मंझधार में ये नैया, बहती ही जा रही है

कोई न जान पाये किस भॅंवर में समाये।

जानती हो मेरी भी अब शहर जाने की इच्छा नहीं होती। बहुत दिन अकेले गुजार लिया लेकिन अब नहीं बीतता है। एक तो उमर भी घटती जा रही है दूसरे ये अकेलापन। चेहरे पर तो नहीं लेकिन दिन में अपनी जगह बना रहा है। लेकिन करें भी तो क्या करें।

तुम मेरा कहा मानो तो घर की खेती का काम करने लगो जो भी होगा उसी में गुजर बसर हो जायेगा।

अपना तो कैसे भी चल जायेगा लेकिन अर्पित के भविष्य का क्या होगा।

‘‘क्यों ? गॉव के प्राईमरी स्कूल में डलवा देंगे और क्या‘‘ सुषमा बोली

‘‘तुम्हें नहीं पता सुषमा दुनिया कितनी तेजी से भाग रही है। हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे इस दौड़ पीछे रह जायें । कहॉं जाकर रूकेगी कुछ नहीं पता।‘‘ अक्षर बोला

‘‘लेकिन दुनिया के साथ चलने के लिए हम तो भूल ही जा रहे है। कि जीना क्या है। क्या हम अपनी दुनियॉ में नहीं जी सकते। जिसमें हम अपने तरीके से जी पायें।‘‘ सुषमा बोली

एक लम्बी सॉंस भरते हुए अक्षर बोला ‘‘सुषमा ऐसा लगता तो है लेकिन हो नहीं पाता। दुनिया गोल है इसका कोई ओर छोर पता नहीं। वैसे ही ये नौकरी। जरुरत-पैसा-काम अनबुझी पहेली।‘‘

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ईमानदारी की परीक्षा

 

नोहर बहुत ही नेक लड़का था। मॉ बाप के द्वारा अच्छे संस्कार मिले थे। ईमानदारी के रास्ते का फकीर था। कभी भी कोई चोरी या गलत काम नहीं करता था। लेकिन अपनी और परिवार की तंगी हालत देखता तो सोचा करता इस नेकी में आखिर क्या रखा है। जो लोग बेईमानी कर रहे हैं वे दिन दूनी रात चौगुनी फल फूल रहे हैं। उसके मन में हमेशा देवासुर संग्राम चलता रहता। कभी कभी छोटे मोटे अवसर हाथ आते तो उसके आदर्श सामने आ जाते और वह अपने आपको सम्भाल लेता।

वह शहर के एक बड़े सेठ के यहॉ नौकरी करता था। जिन्हें उस पर पूरा विश्वास था। जिसे तोड़ना उसके लिए कठिन काम था। एक दिन संयोग से सेठ जी परिवार सहित एक सप्ताह के लिए कहीं पर्यटन पर निकले। यात्रा की खुशी में घर के स्वर्णाभूषणों की आलमारी खुली रह गयी। पूरे घर की जिम्मेदारी नोहर की थी। नोहर घर का अकेला नौकर घर की साफ सफाई करता। एक दिन अचानक उसकी निगाह उस आलमारी पे पड़ी। जिसमें कितने सारे सोने चॉदी के जेवरात भरे थे। उसकी ऑखें खुली की खुली रह गई। अब उसकी कल्पनाएं अंकुरित होने लगी। उसका मन भूखे बैल की तरह हरी घास पे झपट्टा मारने लगा। एक तरफ थी उसके घर की अभावों की जिन्दगी। दूसरी तरफ केवल एक बार की चोरी। फिर किसे पता कौन कहॉं जाता है। इतने सारे धन से तो देश के किसी कोने में अच्छा सा घर बार तैयार हो जायेगा और जिन्दगी भी बड़े आराम से निकल जायेगी। फिर उसके आगे की जिन्दगी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निकालेंगे।

लोग तो पल-पल चोरी और लूट पाट करते रहते है। क्या होता है उनका पुलिस पकड़ के ले जाती है अपना हिस्सा लेकर उन्हें छोड़ देती है। दोनों खुश बड़े आराम से गाड़ी मोटर पे घूमते रहते है। लेकिन अपना केश तो इसके विपरीत है। पुलिस को पता भी न चलेगा। और सेठ जी को शक भी न होगा। पूरा सोना नहीं लेंगे उसमें से कुछ भी निकाल लेंगे तो अपना काम हो जायेगा। उनका पूरा का पूरा खजाना थोड़ी लिए जा रहा हॅू। करोड़ों के सोने से सेठानी जी लदी रहती हैं। घर पे कुबेर की कृपा दृष्टि बरस रही है। ये तो मेरे लिए समुद्र से एक चुल्लू पानी निकालने जैसा हुआ।

ऐसा अवसर रोज-रोज थोड़े आते है। लेकिन फिर एक मन सोचता सेठ जी हमारे ऊपर इतना विश्वास करते है। उनका क्या होगा। इतनी सम्पत्ति मेरे भरोसे छोड़ कर जाना। क्या कम है। नही-नही ऐसा काम नहीं करूंगा। क्या होगा मेरे मॉ बाप के विचारों का, लेकिन ये सब मॉ बाप और परिवार के लिए ही तो कर रहा हूं। उसके दिमाग में तूफान चल रहा था। अच्छाई और बुराई का, बुराई का पलड़ा वर्तमान स्थित के अनुसार भारी पड़ा और नोहर सोने के कुछ जेवरात अपने घर उठा लाया। रात को ऑखों से नींद कोसों दूर थी। कभी बड़े बड़े सपनों की बातें सोचता कभी अपनी गलतियों पे कुढ़ता। लाख कोशिश की लेकिन नींद की एक झपकी भी न आयी।

सुबह वह सोचने लगा जिस धन को एक रात अपने पास रखकर वह चैन से न सो सका। उस धन से बनाए घर में वह जीवन कैसे व्यतीत करेगा। ये तो घुट-घुट के मरने जैसा होगा। हमारी ऑखों से नींद इतनी दूर तो कभी न गई थी। अब तक चोरी करने के लिए मन बहका रहा था। अब चोरी करने पर आत्मा धिक्कार रही है। कि व्यर्थ है तेरा जीवन। जो आदर्श तूने बचपन से लेकर अब तक सम्भाल के रखा उसको कलंकित कर दिया। तू अपनी परीक्षा में फेल हो गया।

यूं तो सभी छोटी-छोटी ईमानदारी दिखाते हैं। लेकिन ईमानदारी वो है कि जो अपने आपको बड़े से बड़े खजाने व प्रलोभन में भी विचलित न होने दे। तू हार गया नोहर। तेरे सारे जीवन की सफलता पर पानी फिर गया। तेरी आत्मा कभी न उठ पायेगी। तुझमें और सामान्य आदमी में कोई अन्तर नहीं। इसी गुण के कारण कितने लोग तुम्हें एक अलग दृष्टि से देखते थे। और तुम... ।

आज उसके आत्मा की आवाज गूंज रही थी। नोहर समझ गया इस वैचारिक क्रान्ति में उसे जीतना होगा। अगली सुबह ही वह सारा सोना ले जाकर यथास्थान रख दिया। और उसने सन्तोष की सॉस ली। उस रात उसे गहरी नींद आयी। क्योंकि वह अपनी ईमानदारी की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया था। जिसके परीक्षक उसकी स्वयं की आत्मा थी। दो दिन चली इस लड़ाई को केवल नोहर ही जानता था। कि उसके आदर्श और विचारों ने कैसे उसकी रक्षा की।

-उमेश मौर्य

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