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कामिनी कामायनी की 3 लघुकथाएँ

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।।शिष्टाचार।।

वे दोनों पति पत्नी पहली बार उस विशाल मंदिर वाले छोटे से शहर में गए थे ।अचानक अपने बचपन के मित्र को सामने देख वर्मा साहब बहुत खुश हुए। मित्र ने बहुत आग्रह से प्रेम विहृवल होकर उन्हें अपने घर लिवा लाया ।

मित्र का छोटा सा फ्लैट . मिसेज वर्मा को इतना ऊबाऊ लग रहा था़.."कैसे रहते हैं इस दड़बे में लोग’ वह सोचती जा रही थी और उसके माथे से पसीने बहते जा रहे थे ।हालांकि मकान इतना छोटा भी नहीं था ।मध्य आय वर्ग का तीन कमरों वाला मकान था। उन्होंने अच्छी तरह सुसज्जित करके भी उसे रखा था ।मगर अपनी औकात से नीचे वाले लोग ‘कुछ लोगों’ को दबडे में ही रहते नजर आते हैं ।

मित्र की पत्नी और दोनों बच्चे उनकी तीमारदारी में यॅू लग गए थे जैसे भक्त के घर भगवान... जैसे उद्वव का मथुरा आना ।उनका प्यार. उनकी भावनाएं छलकते हुए जाम की तरह दिखाई पडती थी ।

मित्र अपनी पत्नी एवं बच्चों से कह रहे थे "ये मेरे बचपन के साथी..हमलोग मिडिल स्कूल से कॉलेज तक साथ ही पढे थे ।बाद में ये बडे ऑफीसर बनकर मुंबई चले गए... ।’श्रीमती वर्मा को उनका यह बार बार दोस्त कहना फूटी ऑख नहीं भा रहा था ।वह चुपचाप बैठी रही थी बुत बनकर। विदा होते समय बच्चों ने उनके पॉव छुएतो "अरे यह क्या.।’कह कर थोडा पीछे हट गई थीं।

कुछ ही दूर जाने पर उनका सीनियर सहकर्मी सोनी मिल गया .उसका भी घर उसी शहर में था ।वे उसके घर बिन बुलाए चले गए थे ।विशाल कोठ़ी पोर्टिेको में बी एम डबल़ू . ड्राइंग रूम भव्य.झाडफानूस़. ईरानी कारपेट़..। मिसेज सोनी सामने आई तो जरूर मगर खातिरदारी नौकरों के उपर छोडकर किसी अर्जेंट पाटी में चली गईं । उनके दोनों बच्चे जो संभवतया बाहर जा रहे थे खेलने "हाय" करते हुए जाने लगे तो मिसेज वर्मा ने उनकी बलैया लेते हुए कहा था ‘कितने शिष्ट हैं ये बच्चे ।"

 

।। मॉ।।

"क्या हुआ...लडका या लडकी..."

"लडका़.. या .लडकी..मुझे क्या पता"

"वाह़..तुम्हें ही नहीं पता.. फिर जन्म किसको दिया ।’’

"जन्म़... जन्म तो मैंने एक संतान को दिया़...दुनिया की निगाह में वह लडका या लडकी हो सकता है मेरे लिए तो मेरे कलेजे का टुकडा मात्र ह़ै..मेरा संतान..नौ महीने में एक बार भी नहीं सोचा कि क्या लिंग होगा..हॉ यह सोच सोच के रोमांचित जरूर होती रही कि "मॉ’ कहने वाला आ रहा है।"

 

।। खानदानी।।

कुदरत ने उसे स्वस्थ.मजबूत.मोटा ताजा शरीर प्रदान किया था ।चमकती काली काली ऑखें. सुनहरे.मुलायम बाल।

उम्र के इस आखिरी पडाव में अपने भव्य डा्रईंग रूम में आराम से. आधुनिक सुख सुविधाओं से लैस़ रौलिंग चेयर पर झूलते हुए साठ इंच के एल0सी0डी0 पर डिसकवरी चैनल देखते देखते डॉगेश्वर बाबू अपने ही बाल चरित में खो गए थ़े......

चारों तरफ कुहासा़...किसी महल्ले के धोबी के कपडे प्रेस करने के टेबल के नीचे माता ने कई बच्चों के साथ उसे भी जनम दिया था.. मगर कुछ ही हफ्तों में धोबी गॉव से आ गया और उसने उसकी मॉ को बच्चों समेत वहॉ से खदेड दिया था़..बेचारी कहॉ गई पता नह़ीं.. अन्य भाई बहनों का क्या हुआ़..क्या पता़...उसे होश आया तो वह एक कोठी में.. मुलायम गद्दे वाली बास्केट में लेटा हुआ था..ऊऊऊऊऊऊकर रोया तो एक सात आठ साल की अपूर्व सुंदरी कन्या फीडिंग बोटल में दूध रखकर पिलाने लगी थी ।

फिर तो कहना ही क्या..बाल्यकाल. राजदरबार में...उसकी तंदुरूस्त़ी..और भी निखरने लगी ...कोठी में आनेवाले लोग भी कहते "कहॉ से लाया़..प्योर अलशेशियन ब्रीड है ।" अपनी तारीफ सुन सुन कर वह फूले न समाता . जब कभी नौकर चाकर.. मालिक या बेबी सिकडी में बॉधकर हाथों में हंटर लिए उसे बाहर गली या पार्क में घुमाने ले जात़े..वह मानो शेर हो जाता लगता पूरी दुनिया उसके पॉवों के नीचे है ।

ऐसे ही बीतते तो जीन्दगी कितनी हसीन हो जाती ..मगर नह़ीं.. जैसे ही उसने जवानी में कदम रखे उसके तेवर बदलने लगे ..बिना वजह भौंकना.. गली में आते जाते स्वजातीय मादाओं को देखकर मचल पडना.. बेकाबू हो जाना़..सिकडी तोड कर भागने के लिए व्यग्र.. और तो और एक दिन जब बेबी उसे बडे प्यार से बिस्कुट खिला रही थी उसने ताव में आकर ऐसा झपट्टा मारा कि बेबी के हाथ खून से रंग कर सिर्फ लाल मांस का लोथडा दिखाई देने लगा था ।

बस इतनी सी बात पर मालिक ने तीन साल तक के पालन पोषण के वावजूद हंटर से मार मार कर गाडी में बैठा कर शहर के दूसरे छोर पर छुडवा दिया था ।

कुछ ही दिनों में उसके तेवर अनेक गैसों के रूप में वायुमंडल में विलिन हो गये। शरीर की ऊर्जा जाती रही...आभिजात्य के घमंड का घडा चूर चूर होकर जमीन पर बिखर गया... ।

मगर नसीब. नसीब होता है ।उसका कद रंगरूप व्यवहार बोलचाल उसे उस इलाके के कुत्तों का नेता बना दिया था.. एम0सी0डी0 वालों के अत्याचार से परेशान परेशान कुत्तों के लिए तो वह मसीहा बन गया था ।वहीं उसका नाम डॉगी से डॉगेश्वरजी हो गया था ।

भैंरो बाबा की कृपा बकायदा इलेक्शन करवा कर वह अपने कौम का सर्वमान्य नेता हो गया. उसे अंग्रजी में भी भौंकना आता था इसलिए बडे बडे नेता पदाधिकारी .विदेशी डेलिगेट उससे मेल जोल बढाने लगे थे ।

इसी बीच उसने अपने रहने के लिए एक खूब़सूरत आशियाना भी बना लिया था ।ऐसे बाहुबल़ी. बुद्विमान और धनवान योग्य वर के लिए बडे बडे संपन्न परिवारों के रिश्ते आए थे ।उसने एक खूबसूरत स्वस्थ और अच्छे नस्ल की मादा से विधिवत विवाह कर गृहस्थी बसा लिया ।

कुछ ही महीने में घर बच्चों की किलकारी से भर गया था... इतने सारे पहरेदार. सेवक़..सब उनकी सेवा आवभगत में लगे रहते थे ।

एक बार डॉगेश्वरजी कहीं विदेश यात्र्रा पर गए ।देखा...वहॉ अपने खानदान के बुजुर्गो का आदम कद विशाल फोटो लगाने का रिवाज है. जिससे लगाने वाले की प्रतिष्ठा और भी बढ जाती है ।

बस..फिर क्या था़..महत्त्वाकांक्षा की आग में जलते हुए वे इस कदर मचल गए कि न दिन में चैन न रात में नींद़..बस एक ही हसरत़.. महीनों के मशक्कत के बाद..उन्होंने अपने पिताजी और आदरणीय दादाजी के दो आदमकद तस्वीरें शीशे में जडवाकर ड्राइंगरूम और बाहर की दीवार पर टॅगवा दिया ।फिर क्या था़.. पूरे इलाके के ही नहीं न जाने कहॉ कहॉ से झुण्ड के झुण्ड प्राणी आकर उन तस्वीरों को देखते और ्उनके खानदान पर मंत्रमुग्ध होते ।

डॉगेश्वरजीका व्यवहार अब तानाशाही मनुष्यों जैसा होने लगा था .. फिर वही घमंड़....वही हिकारत भरी दृष्टि से छोटे छोटों को देखना..गुस्साना..गुर्राना़..भौंकना..पंजे मारना़..मगर खानदानी रईस..खुद इतने बडे नेता..कौन क्या बिगाड लेता. ।अब उम्र भी हो गई थी फिर भी . रोब में कोई खलल नह़ीं..राजनीति ने उसे बुरी तरह भ्रष्ट कर दिया था़..अब वे कई नाजायज बच्चों के पिता थे..बच्चों की माताए उस महलनुमा घर में रानी की सेविका बन कर रह रही थी ।

रॉकिंग चेयर पर झूलते झूलते डागेश्वर जी मदमस्त होकर अतीत में विचरन कर रहे थे . कि घर के बाहर तीव्र शोर पर उनका ध्यान गया़.. जोर जोर से भौंकने. गुर्राने..रोने भागने.. झपटने चिल्लाने की आवाज पर वे चकित़. ‘क्या प्रलय हो गया.।’वे बाहर निकले....सारे पहरेदार विपरीत दिशाओं में भाग रहे थे .. कुछ लहूलुहान जमीन पर गिरे पडे थ़े..एकदम भयानक दृश्य़.... अचानक उनकी दृष्टि...दो मजबूत बाघों पर पड़ी. उनकी ऑखों से ज्वाला निकल रही थ़ीं. ।अगल. बगल.. दूर दूर तक कोई नहीं .. सामने चंद कदमों की दूरी पर दो खॅूखाऱ.. बाघ...।कुछ मिनट अवाक. . एक दूसरे को घूरते रहे बस ।अचानक एक बाघ ने एक कदम आगे बढाकर कहा "ये आदम कद फोटो किसके हैं"... ‘मेरे बाप दादा्ऽऽ्््ऽ् का़’ ...थरथराते हुए उसके कंठ से बस इतना सा निकला ही था कि बाघ झपटा "चुप कुत्ते.अपनी औकात भूल कर तुमने हमारे पुरूखों के तस्वीर लगा लिए ह़ैं.. ठहर..तुझे अभी मजा चखाता हॅू।" इतना कहकर दोनों उसपर एकसाथ झपट पडे और कुछ ही पल में डागेश्वर जी वहॉ नीचे दो भागों में विभक्त गिरे पडे थे ।

कामिनी कामायनी । ।

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