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दीपक आचार्य का आलेख - नपुंसक और वर्णसंकर हैं जो करते हैं स्त्री विरोध

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शिव और शक्ति से लेकर पुरुष और नारी तक की सारी अवधारणा पिण्ड और ब्रह्माण्ड के समस्त जड़-चेतन तत्वों को प्रभावित करती है। इस मामले में दोनों एक-दूसरे के पूरक भी हैं और पर्याय भी।

दोनों का अन्यतम संबंध है और पारस्परिक संबंधों की प्रगाढ़ता के बिना दोनों का अस्तित्व जड़त्व को प्राप्त हो जाता है।  कोई भी पुरुष या स्त्री एक-दूसरे के बगैर पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाते हैं।  उन सिद्ध-महर्षियों और तपस्वियों तथा साध्वियों की बात अलग है जो अपने भीतर के शिव-शक्ति तत्व को जागृत कर इसके माध्यम से पूर्णता प्राप्त कर लिया करते हैं। पर ऎसे पुरुष या नारी दुर्लभ या नगण्य ही हुआ करते हैं। 

इस रहस्य से भरे हुए परम तत्व को जान लेने के बावजूद जो पुरुष स्ति्रयों की अवहेलना करते हैं, उन्हें किसी न किसी प्रकार प्रताड़ित और दुःखी करते हैं तथा बहुविध पीड़ा पहुंचाते हैं, उनके आत्म सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के काम करते हैं, स्ति्रयों को हीन बताते हुए उनके बारे अपने नुगरे अंधानुचरों, मनहूसों और नालायकों की मण्डली में अश्लील और अनर्गल चर्चाएं करते हैं, वे अपने जीवन में हर मामले में असफल होते हैं।

इसी प्रकार जो स्ति्रयां पुरुषों के प्रति बेवजह खराब भाव रखती हैं, किसी न किसी कारण-अकारण पुरुषों को परेशान करती हैं, अपने घृणित लाभ और ऎषणाओं की पूर्ति के लिए पुरुषों को अपमानित या पीड़ित करती हैं, बिना किसी ठोस कारण के पुरुषों के साथ दुव्र्यवहार करती हैं, उनका जीवन भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

इस प्रकार के पुरुष और स्त्री जानवरों की तरह संसार के भोग-विलास तथा अकूत जमीन-जायदाद प्राप्त कर अपने आपको वैभवशाली होने का दंभ भले रखें, इनके पास जो कुछ होता है वह दूषित कमाई और अलक्ष्मी की श्रेणी में आता है। इस वजह से ये लोग इसका अपने लिए उपयोग नहीं कर पाते, या तो चोरी हो जाता है, नष्ट हो जाता है, अथवा बीमारियों पर खर्च होने लगता है। और इस तरह की संपदा दूसरे लोगों के पाले में चली जाती है।

हर पुरुष के शरीर में देवताओं के साथ देवियां विराजमान रहती हैं। इसी प्रकार हर स्त्री के शरीर में देवियों के साथ देवता विराजमान रहते हैं। इस अवस्था में कोई पुरुष या स्त्री दोनों में से किसी का भी निरादर करे, देवी-देवता दोनों मिलकर उस पर कुपित होने लगते हैं। और ऎसे इंसानों के लिए नरक में भी कोई ठौर-ठिकाना नहीं होता।

स्त्री और पुरुष मनोविज्ञान से लेकर पुरातन परंपराओं और आनुवंशिक गुणधर्म को देखें तो जो लोग असली इंसानी बीज से बने होते हैं वे कभी भी किसी का निरादर नहीं करते। न कटु वचन कहते हैं, न हराम की कमाई में विश्वास रखते हैं, न किसी को दुःखी और परेशान करते हुए बिना किसी कारण तनाव देते हैं और न ही अपने आपको पाक-साफ और प्रतिष्ठित साबित करने के लिए किसी और की बलि चढ़ाने का घृणित कार्य करते हैं।

इन लोगों में सहिष्णुता, प्रेम, सदाशयता, बन्धुत्व, सेवा-परोपकार, संवेदनशीलता और मानवीयता कूट-कूट कर भरी होती है। इस किस्म के लोग अपने जीवन में कोई ऎसा काम नहीं करते जिससे कि औरों को किसी भी प्रकार का कोई दुःख पहुंचे या किसी भी प्रकार से हानि हो।

ये लोग अपने मन-कर्म और वचन से शुद्ध और पवित्र होते हैं तथा इनका सान्निध्य पाने वाले अपने आपमें प्रसन्नता और मस्ती का अनुभव करते हैं। इन लोगों के लिए स्त्री और पुरुष का कोई भेद वजूद नहीं रखता बल्कि मानव मात्र के प्रति संवेदनशील होते हैं और सभी के लिए मददगार होते हैं। कुछ लेने-देने या हड़पने जैसी भावनाएं इनकी कल्पनाओं में भी नहीं होती।

        आज के दौर में बहुत सारे इंसान ऎसे दिखने लगे हैं जिनके लिए पूरा का पूरा जीवन किसी आडम्बर और स्वाँग से कम नहीं हैं जहां छीनाझपटी की संस्कृति हावी है। इसी प्रकार उन लोगों का भी वजूद दिखने लगा है जो कि अपने आपको पुरुष कहते हैं लेकिन पौरुष का अभाव इनके हर कर्म, वचन और व्यवहार में साफ-साफ दिखाई देता है।

        कुछ अपवादों को छोड़कर आमतौर पर महिलाएं अधिक धीर-गंभीर और प्रेम-ममत्व तथा वात्सल्य से भरी होती हैं लेकिन पुरुषों के साथ ऎसा नहीं है। बहुत सारे पुरुष इस किस्म के भी हैं जो स्ति्रयों को दूसरे दर्जे के रूप में देखते हैं और इनके बारे में कहा जाता है कि ये लोग स्ति्रयों के प्रति दुर्भावना या द्वेष रखा करते हैं।

        इस प्रजाति के पुरुषों के जीवन और व्यवहार को देखा जाए तो ये लोग अपनी माता-बहनों, दादी-नानी, पत्नी और रिश्तेदार स्ति्रयों के प्रति भी संवेदनहीन होते हैं और इनके कारण इनके परिवार की स्ति्रयां भी नाखुश रहती हैं।

        प्राच्य संस्कृति, ज्योतिष और परंपराओं को देखें तो यह स्वयंसिद्ध है कि जो लोग वास्तविक पौरुष रखते हैं वे दुनिया के तमाम स्त्री-पुरुषों के प्रति संवेदनशील रहकर प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं। लेकिन जिनमें कुछ न कुछ मिलावट होती है, पौरुष हीन होते हैं अथवा पूर्व जन्म के असुर होते हैं, वे दिखते तो पुरुष शरीरी होते हैं लेकिन इनका कर्म, व्यवहार और स्वभाव सब कुछ न पौरुषी होता है, न स्त्रैण।

        असली पुरुष अपने कुल और क्षेत्र को गौरवान्वित करते हैं और इनका स्वभाव मुग्धकारी, प्रसन्नता देने वाला होता है तथा इनका सान्निध्य पाने को हर कोई लालायित रहता है। ऎसे लोग किसी भी स्त्री का विरोध करने की सोच भी नहीं सकते।

        हम सभी को चाहिए कि अपना आत्म मूल्यांकन करें और जहां कहीं कोई कमी हो उसे पूर्ण करें ताकि ऊपर जाने से पहले हम अपने आपको कम से कम इतना तो सुधार ही लें कि अगला जनम इंसान का प्राप्त हो अथवा मोक्ष का मार्ग।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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