शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

प्रदीप कुमार साह की लघुकथा - लक्ष्य

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कुछ दिन पहले मैं अपने चचेरे भाई से मिलने उनके घर गया था. भाभीजी यथासाध्य आवभगत कर मेरा कुशल-क्षेम पूछा फिर गृहकार्य निपटाने में व्यस्त हो गई. उनका छोटे- छोटे बच्चों से भरा-पुरा परिवार था. पूरा परिवार सभी तरह से सुखी और खुश था, सिवाय इस बात के कि उनके बच्चों में अच्छी बातें सीखने की ललक थोड़ा मंदा था. इस बात के लिए भाभीजी मेरे सामने भी बच्चों को डॉट-फटकार लगाई.

यह सब देखकर मुझे भी थोड़ा चिंता हुआ,किंतु सबकुछ समझे बिना किसी से कुछ कहना उचित न समझा. शाम में भाई साहब घर आए. उनसे बातचीत होने लगी. बातचीत के दरम्यान वे बीच- बीच में बच्चों की लापरवाही पर उस पर चिल्लाए भी.किंतु बच्चों पर ज्यादा असर नहीं हुआ. फिर हमलोग खाना खाकर सो गये.

मैं वहां पूरे एक दिन ठहरा. उपरोक्त घटना मानो उस परिवार के दिनचर्या का एक हिस्सा था. मैंने बच्चों को लाड़-प्यार किया और उसे समझने की कोशिश की. बच्चे जल्दी से घुलने-मिलने वालों में से नहीं थे.एक दब्बू था तो दूसरा मुँहफट. किंतु दोनों में एक बात में समानता थी. वह कि उनके मन में क्रोध,घृणा,प्रतिशोध और द्वेष की भावना प्रबल थी.

निःसंदेह मन में ऐसी भावना रहने पर संयम और आत्मनिरीक्षण कहां रह सकता है? इसके बिना जीवन में अपेक्षित सुधार भी कैसे आ सकता है? क्रोधादि तो विचार और इच्छा शक्तिओं को नष्ट कर ही देता है, फिर इस सबके बिना लक्ष्य -निर्धारण कैसा हो सकता है? मैं चिंतन करने लगा.

कहते हैं कि लाड़-प्यार से बच्चों का चरित्र बिगड़ जाता है. पर भारतीय इतिहास तो कुछ और भी कहता है. बालक शिवाजी को माता जिजाबाई द्वारा बार-बार समझाया गया और इस योग्य बनाया गया कि वे छत्रपति का अलंकार धारण-योग्य बन गये. बालक चंद्रगुप्त को 'मुरा का बेटा-मौर्य' नाम देकर महान् गुरु चाणक्य ने महान् सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का आधारशिला प्रदान किये. वे सब अलंकार के शब्द लक्ष्य का प्रतिनिधित्व किया. इस तरह गुरु द्वारा लक्ष्य का निर्धारण किया गया. उस अलंकार के अनुरुप उनके भावनाओं का विकास हुआ. नेपोलियन बोनापार्ट अपनी ऊर्जा शक्ति स्वयं विकसित की. उन बालकों के अभिभावक, गुरु अथवा स्वयं अपने आकांक्षा के अनुरुप ही लक्ष्य प्रदान किये,जैसा सभी अभिभावक करते हैं. संभवतः उन्होंने भी अत्यधिक लाड़-प्यार न किया हो, किंतु उन्होंने सम्यक उपाय जरुर किये. संभवतः बच्चों की निंदा वे करते हों,किंतु निंदा करने की उनकी नियति थी इतिहास में इस बात का कोई जिक्र नहीं है.

अंग्रेजी का एक पुरानी कहावत है, जिसका आशय है कि छड़ी का टूटना और बच्चों का सुधरना. यानि बच्चों की पिटाई इस कदर करने की सलाह दी गई है कि वह इतना भयभीत हो जाये कि हर कही बात मानने लगे. जहां भय हो वहां घृणा और द्वेष न हो अथवा प्रेम हो ,यह किस तरह संभव है? वह घृणा और द्वेष क्रमशः क्रोध और प्रतिशोध का बीज नहीं है क्या! फिर एक कार्य जो उत्साहपुर्वक किया जाता है और वही भयभीत होकर अथवा अति-उत्साह से किया जाए तो प्रतिफल एक-सा हो सकता है? कदाचित ऐसा संभव नहीं है.

यह परम सत्य है कि मनुष्य लक्ष्य-विहीन रह कर जीवन पथ में प्रगति की ओर अग्रसर नहीं हो सकता. यह सच है कि बालपन में लक्ष्य निर्धारित हो जाने से आशानुकुल प्रगति हो सकता है. यह भी कि अबोध बच्चे हेतु लक्ष्य का निर्धारण उसके अभिभावक को करना ही होता है,जो उनका दायित्व है. किंतु यह भी एक सत्य है कि सम्यक उपाय रहित लक्ष्य निर्धारण चिर समय तक ठहर नहीं सकता. उपाय ऐसे किये जाए कि बच्चों में इच्छा और विचार शक्तियां बनी रहे. तभी वह लक्ष्य प्राप्य होगा. अर्थात बच्चों के प्रति अभिभावक का स्पष्ट लक्ष्य हो कि वह सम्यक उपाय से बच्चों को उनके लक्ष्य से अवगत कराएं एवं प्रेरित करें.

मैंने भाभीजी को अपने विचार से अवगत कराया . तर्क-वितर्क के पश्चात् उन्होंने मेरे विचार से सहमति जताई और उक्त विचार को अपनाने का आश्वासन दिया. फिर मैं उनसे अनुमति लेकर अपने घर चला आया.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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