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प्रदीप कुमार साह की लघुकथा - प्रतिमा

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एक समय किसी गांव में प्रतिमा निर्माण में सिद्धहस्त एक निर्धन मूर्तिकार रहता था. उसके कलात्मक प्रतिमा की चर्चाएं दूर-दूर तक थी. एक दिन साधु से दिखने वाले कुछ लोग आकर उससे कुछ विचित्र प्रतिमाएं बनाने का आग्रह करने लगे. यद्यपि वे काफी विद्वान् थे और अध्यात्मविद जान पड़ते थे, उनकी मंशा जगत् कल्याण की जान पड़ती थी, किंतु वे काफी निर्धन थे. वैसी स्थिति में मूर्तिकार सोचने लगा कि वैसी विचित्र प्रतिमाएं बनवाकर वे वापस प्रतिमा खरीदने ही न आए तो वह उन विचित्र प्रतिमाओं का क्या करेगा ? वैसी प्रतिमाएं कौन खरीदेगा? यह सोचकर वह बात टालना चाहता था. किंतु उन लोगों के बारंबार आग्रह करने पर अंततः वह प्रतिमा निर्माण हेतु तैयार हो गया.

उसने कहे अनुसार प्रतिमाओं का निर्माण किया. वे प्रतिमाएं अत्यंत विचित्र थे. एक सिंह पर सवार शस्त्र-सुसज्जित दस भुजाओं और त्रिनेत्रवाली कोमल स्त्री किसी दुर्दांत पुरुष पर शस्त्राघात कर रही थी तो दूसरा जटाधारी-ध्यानस्थ-त्रिनेत्रधारी दिगम्बर था जिसने अपने शीश पर चंद्रमा, गले में सर्प और रुद्र मालाएं तथा बिच्छुओं का कुंडल व त्रिशूल धारण कर रखा था. साथ में सामने वृषभ और सिंह बैठा था. तीसरा और भी विचित्र था. चतुर्भुज शस्त्र-सुसज्जित गजमुख बालक मूषक की सवारी कर रहा था. इसी तरह अन्य प्रतिमाएं भी विचित्र थी. खैर नियत समय पर आकर उचित पारिश्रमिक देकर वे लोग अपना निर्दिष्ट प्रतिमा ले गये.

थोड़े दिन बाद जब किसी काम से मूर्तिकार का शहर जाना हुआ तो उसने आश्चर्यजनक चीजें देखी. रास्ते में अलग-अलग गॉवों में वे साधु उसके द्वारा निर्मित उन विचित्र प्रतिमाओं के विभिन्न अंग-प्रत्यंग का प्रतिपादन किसी जीव एवं उनके भिन्न गुणों से करते हुए जीवन में समरसता एवं प्रेम की आवश्यकता पर उपदेश कर रहे थे. वे सभी जीव के गुणों से प्रेरणा लेने का आग्रह कर रहे थे जिससे मानव जीवन गुणों का खान और कल्याण-मय बन सके. उनके नि:स्वार्थ उपदेश सुनने में लोगों का खासा उत्साह था. मुर्तिकार को आश्चर्य हुआ और खुशी भी कि चलो समाज में वैचारिक समरसता और कल्याण तो स्थापित होगा.

कुछ दिन बाद कुछ सभ्य लोग आकर मूर्तिकार से वैसी ही प्रतिमाओं के निर्माण का आग्रह किया जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया. जब प्रतिमाओं का निर्माण हुआ तो वे लोग आकर मूर्तिकार का उचित पारिश्रमिक देकर प्रतिमाएं ले गये. थोड़े दिनों बाद जब मूर्तिकार का दुबारा शहर जाना हुआ तो उसने देखा कि उसके द्वारा निर्मित प्रतिमाओं का देवी-देवताओं के रुप में पूजन किया जा रहा है. प्रतिमाओं को चढावा और भोग लगाया जा रहा है. वे सभ्य लोग मजे से चढावे के धन समेट रहे हैं. उससे रहा नहीं गया. जब उसने इस संबंध में एक सभ्य व्यक्ति से बात की तो उसने कहा कि अपने काम से मतलब रखो. तुम्हारा प्रतिमा लोगों को पसंद आता है तो तुम्हें पारिश्रमिक मिलता है. लोगों को मेरे द्वारा प्रतिमा पूजन का विश्वास होता है तो मुझे दक्षिणा में धन देते हैं. उनकी बातें सुनकर मूर्तिकार को दुःख हुआ किंतु मन में यह कहकर सांत्वना दिया कि समाज में थोड़ा सुधार अनवरत तो चलता रहेगा. कुछ दिनों बाद मूर्तिकार से वैसी प्रतिमाओं के निर्माण की काफी मांग होने लगा. फिर मूर्तिकार वैसे विचित्र प्रतिमाओं के निर्माण में व्यस्त रहने लगा. समाज में प्रतिमा पूजन देव पूजन का स्थान ले चुका था.

जब मूर्तिकार का तीसरी बार शहर जाना हुआ तो उसने रास्ते में कुछ प्रतिमा उपेक्षित रखा देखा. थोड़ा और आगे जाने पर देखा कि एक व्यक्ति प्रतिमा से भला-बुरा कह रहा था. पुछने पर पता चला कि समाज में अंधविश्वास फैल चुका था. प्रतिमा भौतिक संपन्नता देनेवाली शक्ति बन गयी थी. लोग स्वचरित्र सुधार की जगह प्रतिमा से गुहार (मनोकामनापूर्ति हेतु प्रार्थना) करने में लगे थे. मनोकामना पूरी नहीं करने पर प्रतिमा लोगों द्वारा कोसा जाता था. यह सबकुछ देखकर मूर्तिकार काफी दुखी हुआ. किंतु वह भी विवश था कि भौतिक साधन जुटाने के पीछे रहे या जीवन के सच्चा सुख पाने के लिए अति-कामना के त्याग का रास्ता अपनाए.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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