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रवि श्रीवास्तव की कहानी - सफर में शादी

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सफर करने के लिए रेलवे से ज्यादा अच्छा कुछ भी नहीं है . आरक्षण की बोगी हो या फिर सामान्य का डिब्बा . कितना भी लम्बा सफर हो आसानी से कट जाता ...

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सफर करने के लिए रेलवे से ज्यादा अच्छा कुछ भी नहीं है . आरक्षण की बोगी हो या फिर सामान्य का डिब्बा . कितना भी लम्बा सफर हो आसानी से कट जाता है .

मैं दिल्ली में एक कम्पनी में काम करता है . काफी सालों से वह अपने गांव नहीं गया था . दिल्ली की भाग दौड़ भरी जिंदगी में काफी व्यस्त रहता है . गांव से उसके मित्र आनंद का फोन आता है .  आनंद की बहन की शादी तय हो गई थी .

बहन की शादी में आनंद ने बुलाया था . कम्पनी से मुझे छुट्टी नहीं मिल रही थी . अपनी इस समस्या को आनंद को बताता हूं . लेकिन आनंद कुछ सुनने को तैयार नहीं था . उसने साफ कह दिया कि शादी में नहीं आए तो कभी बात मत करना . मैं थोड़ा परेशान हो गया . आखिर करे तो क्या . एक तरफ नौकरी, तो दूसरी तरफ गहरी दोस्ती थी.

समझ में नहीं आ रहा था, कि कैसे जाए . बॉस ने तो साफ मना कर दिया था.  छुट्टियों पर बहुत सारे लोग गए हैं, तो हम आप को कैसे छुट्टी दे दें.  आनंद बहन की शादी की तैयारियों में जुटा हुआ था . शादी का सारा सामान घर पर आ रहा था. घर पर तैयारियां भी जोर-शोर से चल रही थी. रिश्तेदारों का आना जाना लगा हुआ था.  आनंद ने शादी के दो दिन पहले फोन किया.

उसने कहा अरे दिवाकर, तुम कुछ दिन पहले नहीं आए, तो शादी के दिन आ जाना यार . मैं कुछ देर तक सोचता रहा.  फिर बोला कोशिश करता हूं यार.  नाराज़ हो आनंद ने फोन काट दिया.  तभी मेरे पास एक और फोन आता है. मैंने सोचा आनंद का ही फोन होगा. जब उसने फोन को उठाया तो दंग रह गया.  मन में सोचता रहा भगवान तू ये कैसी परीक्षा ले रहा है.  

अभी मेरा दोस्त नाराज़ होकर फोन को काट दिया.  मैं उसके बुलाने पर घर नहीं जा पा रहा हूं.  और आप ने और भी असमंजस में डाल दिया है.

काफी महत्त्वपूर्ण फोन आया था. फोन दूसरी कम्पनी से आया था. जहां मैंने अपना इंटरव्यू दिया था. फोन में ऐसा कहा गया कि आप को किसी भी वक्त बुलाया जा सकता है. महीने की आखिरी तारीख को शादी थी. मैं जाना चाहता है.

अब करे तो क्या? एक तरफ दोस्ती तो दूसरी तरफ नौकरी.

चुने तो किसे चुने? नौकरी भी जरूरी थी. और दोस्ती भी.  बहुत सोच विचार के बाद उसने फैसला किया.  हमें तो जाना है.  नौकरी तो दूसरी भी मिल जाएगी. एक अच्छा दोस्त नहीं मिल पाएगा.  मैंने दफ्तर में जाने के दो दिन पहले अपनी छुट्टी की अर्जी लगाई.

छुट्टी का प्रार्थना पत्र बॉस के पास पहुंचा. बड़े हंसी खुशी से बॉस मेरे पास आए. बोले, ओह तुम यहां से चुपके से मुझे छुट्टी का ई-मेल कर रहे हो. मैं हंसने लगा. तभी बॉस ने कहा मैंने भी अपना जवाब दे दिया है.  पढ़ लो. ये सुनते ही थोड़ा अजीब लगा. पता नहीं क्या लिखा है.

लगता है आफिस से छुट्टी नहीं मिलेगी.  बॉस का मेल देखा तो लिखा था कि पहले मानव संसाधन विभाग(एच आर) विभाग से अपनी छुट्टी के बारे में पता कर लो.  मैं वहां जाता हूं।
पर कोई फायदा नहीं होता.  वहां किसी से मुलाकात नहीं हो पाती.  लौट आता है.  बॉस पूछते हैं अरे दिवाकर क्या बात हुई?  सर कोई मिला नहीं फोन भी किया पर उठाया नहीं.

चलो कोई बात नहीं पर कुछ दिन छुट्टी को कम कर लो। कम्पनी के बहुत सारे लोग पहले से छुट्टी पर हैं. 

सर कोशिश करूंगा. जल्दी आने की.  मेरी खुशियों का ठिकाना न रहा.  ये बात अपने दोस्त को भी नहीं बताई थी।

नाराज आनंद का फोन भी दोबारा से नहीं आया.   मैंने आने की सूचना घर पर भी नहीं दी.  घर के सामने ही आनंद का घऱ है.  उसे पता चल जाएगा.  मैं आनंद को अचानक पहुंचकर आश्चर्य चकित करना चाहता था.

आखिर वो दिन आ ही गया. मुझे दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी.  साथ ही दिल में एक बात भी चुभ रही थी.  कही वहां पहुंचते ही दूसरी कम्पनी से फोन न आ जाए.  और वह कह दे कि कल से आफिस आना है.

इन ख्यालों के साथ रेलवे स्टेशन पर पहुंचता हूं. उसे वहां से ट्रेन पकड़नी थी.

बड़े हर्ष और उमंग के ट्रेन के आने का इंतजार कर रहा था. लोग आ जा रहे थे. कोई ट्रेन पर चढ़ रहा तो कोई उतर रहा था.

मुझे गुस्सा आ रहा था. मन ही मन रेलवे को और रेल मंत्रालय दोनों को गाली दे रहा था.

जिसका सिर्फ एक ही कारण था. समय हो जाने के बाद गाड़ी प्लेटफार्म पर नहीं लगाई गई थी.

घर जल्द पहुंचने की इच्छा और उत्सुकता ने काफी प्रभाव डाला था. अब मन से निकले हर शब्द गाली थे. हो भी क्यों न उत्साह में जनाब दो घण्टे पहले जो रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए थे.

वो दो घण्टे तो कट गए थे. लेकिन दस मिनट का कटना एक साल के जैसा लग रहा था. मैं सोच रहा था. कही पिछली बार की तरह न हो जाए. गाड़ी पूरे 8 घण्टे देरी से चली थी. और मैं दूसरे दिन पहुंचा था घर. मन से आवाज आती है ओह , इस देश का क्या होगा ? चुनाव आता है तो नेता लोग हजारों वादे करते हैं. और जीतने पर ठेंगा.

होते करते वो दस मिनट भी कट गए थे. गाड़ी प्लेटफार्म पर 20 मिनट देरी से लगाई गई थी. दिल में उमंगें लिए ट्रेन की तरफ बढ़ता हूं. भगवान का शुक्रिया अदा करता हूं. चलो गाड़ी आ तो गई. ट्रेन के रूकते ही खड़ी भीड़ दौड़ पड़ी. ऐसा लग रहा था कि कही दौड़ प्रतियोगिता आयोजित की गई है. जो पहला स्थान प्राप्त करेगा उसे ईनाम मिलेगा.

लेकिन ये भीड़ यात्रियों की थी. कुछ जो सामान्य डिब्बे में सफर करने वाले थे. तो कुछ जो स्लीपर क्लास में. इस दौड़ में शामिल थे. एसी में सफर करने वाले तो धीरे-धीरे अपने बोगी की तरफ़ बढ़ रहे थे. सामान्य टिकट रखने वालों को सोच भी ठीक थी. उनके लिए तो जगह मिलने के लिए दौड़ प्रतियोगिता थी. लेकिन इसमें पहला, दूसरा, तीसरा स्थान नहीं था. हर किसी को दौड़कर अपनी जगह बनानी थी. नहीं तो सफ़र करना मुश्किल भरा होता. शायद पूरे रास्ते खड़े होकर जाना पड़ता.

ये मधुमक्खी की तरह एक साथ टूट पड़ने वाले लोग जैसे-तैसे अपना रास्ता ट्रेन पर चढ़ने के लिए बना रहे थे. मैं अपना बैग लिए इधर उधर घूम रहा था. मेरे पास स्लीपर क्लास का टिकट था.  अपनी बोगी को तलाश रहा था.  जो कि इंजन के पास थी.  एस-1 में 40 नम्बर की सीट. अपने डिब्बे के पास पहुंचकर चैन की सांस ली. वाह, चलो घर की ओर.  डिब्बे में चढ़ वह अपनी सीट तलाश रहा था.  तभी एक सज्जन को बैग का एक हिस्सा लग जाता है. वह आक्रोश दिखाते हुए अबे, दिखता नहीं है क्या तुझे.

सर जी दिखता तो है, पर भीड़ की वजह से आप को लग गया होगा.  माफ कर देना.  सज्जन पुरुष ने तुरंत जवाब दिया. पहले मार दो फिर माफ कर दो.  मैं अपनी सीट की तरफ बढ़ा और अपना सामान रख दिया.  सीट पर बैठने के बाद देख रहा था. लोग कितने मुश्किल से चढ़ रहे है.  हो भी क्यों न सामान्य का टिकट रखने वाले भी आरक्षण के डिब्बे में घुसते चले आ रहे थे. चलो, मैं किसी तरह से चढ़ गया और अपनी सीट पर बैठ गया हूं. ट्रेन रूकी हुई थी. लोग चढ़-उतर रहे थे.  

तभी मेरी नज़र एक पण्डित जी पर पड़ी. बड़ी तिलक लगाए, बहुत सारी मालाएँ धोती कुर्ती पहने.  उनके साथ कुछ चेले भी थे.  जो भगवान की भक्ति भावनाओं में लीन दिख रहे थे. पण्डित जी दो सीट छोड़ बैठ गए. उनके चेले का प्रतीक्षा श्रेणी में टिकट होने से ट्रेन की फर्श पर चद्दर बिछा के बैठ गए. तभी ट्रेन पर एक पूरा परिवार धक्का मुक्की करते हुए अपनी सीट की तलाश में आ रहा था.

एक मोटा तगड़ा आदमी जिसके साथ उसकी पत्नी और एक लड़की दो लड़के थे. उस आदमी का शरीर देखकर लग रहा था कि जैसे किसी शैतान ने ट्रेन पर कदम रख दिया हो. मैं मन में यही सोच रहा था। कि अगर ट्रेन में टायर लगा होता तो जरूर पंचर हो जाता. जैसे बाप वैसा पूरा परिवार, बस एक को छोड़कर जो थी उसकी लड़की.

परिवार के लोग देखने में जितने खतरनाक थे. बेटी उतनी ही सुंदर थी. मैं उस लड़की को देखकर सोचने लगा. हे भगवान, कुछ ऐसा कर दे कि ये मेरे सामने वाली सीट पर बैठ जाए. बाकी को तू कही भी फेंक दे. कोई परवाह नहीं. वो शैतान सा लग रहा आदमी मेरे करीब आकर अपनी सीट को देखने लगा.

सभी प्रकार का निरीक्षण करने के बाद उसने पत्नी से बोला, अरे अपनी सारी सीटें मिल गई. मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. अब तो ये लोग यहीं बैठेंगे. उस आदमी को देख मैं डर भी जाता. तभी अचानक से एक झटका महसूस होता है. साथ ही ट्रेन की सीटी बजने लगती है.  आख़िरकार ट्रेन चलने लगी थी. लोग सीट पर बैठ रहे थे. वो शैतान सा भी आदमी आकर मेरे सामने वाली सीट पर  बैठ गया।.हे भगवान तूने ये किस जनम की सज़ा दी है. क्या मांगा था क्या दिया ? इस शैतान को देखने से अच्छा है चद्दर तान के सो जाऊं. पण्डित जी का भजन कीर्तन शुरू हो गया. लोग मस्त होने लगे चलो सफर तो आसानी से कट जाएगा. तभी चिल्लाने की आवाज़ सुनाई पड़ती है. ये आवाज़ बगल वाले बर्थ से आ रही थी.  शोर हो रहा था मैं उठकर देखने लगा. पता चला दो महानुभाव आपस में लड़ रहे थे.  

वो भी सीट को लेकर.  एक ने आरक्षण करा रखी थी, तो दूसरे ने सामान्य श्रेणी का टिकट ले रखा था. बस बैठने को लेकर झगड़ा शुरू हो गया था.  जिसने आरक्षण कराई थी वह कह रहा था कि मुझे सोना है आप किसी और सीट पर बैठ जाओ.  दूसरे का जवाब मैं यही बैठूंगा।. जैसे कि उसके बाप की बपौती वहां पर दबी पड़ी है.  

अब दोनों में घमासान शुरू था.  इधर दोनों के घमासान ने रफ़्तार पकड़ ली थी.  उधर ट्रेन ने भी.  बात तो कही से समाप्त होने वाली नहीं लग रही थी.  एक अपने हक़ के लिए लड़ रहा हो तो दूसरा छीनने के लिए.  अब बेचारा वो इंसान दुबला पतला सा था. जो उस पर चढ़ाई कर रहा था वो तगड़ा सा. भारी पड़ रहा था.

सुरक्षा के नाम पर तो रेलवे की बात ही निराली है. मैं बैठे-बैठे यही सोच रहा था. सफ़र कर रहे मुसाफ़िर भी कुछ नहीं बोल रहे हैं. उस बेचारे को दबाने के लिए उस तगड़े इंसान के साथ एक और आदमी था. ज्यादा देर तक ये बहस चलती रही. फिर उस दुबले से आदमी ने अपनी सीट छोड़ दी. और कहा कि अब तुम बैठकर जाओ या लेटकर मैंने आरक्षण करा दिया है.  सीट का मज़ा उठा लो.

इतना कहकर वह सीट से उतर गया. वह तगड़ा सा बेशर्म आदमी उस पर लेट गया. और कहा जाओ जिसे बुलाना चाहते हो बुला लाओ. बेचारा एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे घूमता रहा. पर कोई फायदा नहीं. न आरपीएफ के लोग मिले न टीटी. थक हार के लौट कर आकर गेट के पास खड़ा हो गया. आंख में आंसू भरे हुए थे.  वह सोच रहा था, अगर मेरे साथ भी कोई होता तो अच्छा होता. आज मेरी मदद के लिए कोई भी नहीं है. मैं कितना अकेला और बेबस हूं. भगवान क्या यहां तेरा इंसाफ है ?

रात के नौ बज गए थे. उसके आंसू के धार बह रही थी. पर किसे क्या फर्क़ पड़ता है ? रो रहा होगा.  लेकिन उस आदमी ने अपनी चादर तान ली थी. अब क्या आरक्षण टिकट का मज़ा सामान्य टिकट लेकर उठा रहा था. मैं काफी देर से ये नौटंकी देख रहा था. वह उसकी मद्द करना चाहता था पर करें तो कैसे.

बाकी लोग तो एक मूरत के जैसे बैठे हैं. उन्हें सही गलत का कोई मतलब नहीं पता है. मेरे दिल से आवाज़ आई, अरे दिवाकर तू भी इन लोगों की तरह है. क्या मनुष्यता को भूल गया है.

किसी की मदद भी नहीं कर सकता. फिर दिमाग की उपज़ निकली क्या फ़ायदा किसी के मामले में पड़ना.  अपना काम देखो.  वह चुप-चाप फिर से बैठ गया.  वह पतला-दुबला सा नौजवान वही खड़ा रहा.  जैसे किसी ख़ुदा के नुमाइंदे  का इंतजार कर रहा है.

ऊपर वाला उसकी आंखों के आंसू को देखकर कोई रास्ता तो निकालेगा. इस बात को देखते हुए मैंने आखिर दिल की बात सुन ली. और वॉशरूम जाने के लिए उठा. और उस तरफ बढ़ने लगा। जिधर वह नौजवान ट्रेन के दरवाजे के पास खड़ा हुआ था. वह उसे देखते हुए बाथरूम के अंदर चला गया. देखा कि वह काफी परेशान था. बाहर निकला तो अब मुझसे रहा न गया. मैंने उस लड़के से पूंछ लिया. अरे भाई, गेट को पास क्यों खड़े हो ?

इतना उस नौजवान को सुनने की देरी थी. बस वह तेज से रोने लगा. सारी बातों के जानते हुए अंजान की तरह पूछा आखिर बात क्या है ? वह नौजवान ने कोई जवाब नहीं दिया. बस रोता रहा. अब अपने मन में ठान ली की इसकी मदद जरूर करनी है.  अरे भाई बात तो बताओ . बस ऐसे रोते रहोगे. उस नौजवान को अपने सीने से लगा लिया. आंसू पोछते हुए नौजवान ने अपनी बात बतानी शुरू कर दी.

सीट को लेकर जिसे उसने तत्काल में बुक कराई थी. सुबह लखनऊ पहुंचकर सरकारी नौकरी के लिए पेपर देने हैं. सुबह 9:30 से मेरा इक्जाम हैं. मेरी सीट पर देखो गुण्डागर्दी दिखाकर लेट गए हैं. जबकि इनके पास जनरल का टिकट है. बेशर्मी की हद होती है .इतने सारे लोग देख रहे हैं पर सही गलत कोई बोलने वाला नहीं है.

अरे भाई आजकल कोई दूसरे के मसले में टांग नहीं अड़ाता है. भाई बात उसकी नहीं अपने से कमजोर को सभी लोग दबाते हैं. अपने से जीतने वाले के पास जाकर ऐसा करने की हिम्मत नहीं होगी. चलो मैं बात करता हूं. उस नौजवान को किसी ने सहारा दिया. मैं भी थोड़ा तंदुरूस्त था. आखिर जिम जाता था.

उस नौजवान के सीट के पास पहुंचकर बड़े प्यार से मैंने पूछा भाई इसकी सीट है तो इसे क्यों नहीं दे रहे हो. बेचारा कब से रो रहा है. इंसानियत मर गई है क्या तुम्हारी ? चलो उतरो इसको सोने दो कल इसका पेपर है. अगर सो के जाने का शौक है तो आरक्षण करा लेते. इतना कहना मेरा का खत्म हुआ कि दोनों टूट पड़े. चल तू निकल ले अपनी सीट पर वरना. वरना क्या ?  अभी सीधी तरह कह रहा हूं. उठ जाओ।

उस नौजवान से कहा अपना बैग लाकर सीट पर रखो. जैसे ही उसने सीट पर अपना बैग रखा उसने अपने पैर से धक्का देकर गिरा दिया. और बोला जाओ अब किसी को बुला लाओ किसी को नहीं डरते हैं. अब तो तू यहां नहीं बैठ सकता.

लोग तो जैसे तमाशा देख रहे हैं. अब बर्दाश्त की हद हो चुकी थी. मैंने उसका पैर पकड़ा और जोर से खींचा वह सीट से नीचे आ गिरा. तभी पीछे से दूसरे ने मुझे एक घूंसा मार दिया. मैं गुस्से से बौखला गया. दोनों को जमकर धूना और कहा दोबारा नज़र भी आए तो इससे ज्यादा मारूंगा. वो खूबसूरत लड़की ये सब देख रही थी.

जैसे मन में सोच रही हो. इतना हैंडसम लड़का और दूसरों के दर्द को समझता भी है. कैसे उस परेशान लड़के की मदद की .मेरी लड़ाई चल रही थी.  इतने में उसमें से एक लड़के ने जूता फेंक कर मारा जो उस लड़की को लगा.

जूता उसे लगते ही लड़की के पिता ने अपना विकराल रूप दिखाया. वो देखने में शैतान था ही, उसे बेरहमी से मारने लगा. पण्डित जी बीच-बचाव के लिए आए थे. इतने में आर.पी.एफ वाले आ गए थे.  उन लोगों ने सबको अलग कराया.  लेकिन सबको पकड़ लिया. अगले स्टेशन पर सबको उतार लिया. ट्रेन चली गई.

शैतान से आदमी का परिवार भी उस स्टेशन पर उतर गया. मैं भी था वहां.  दोनों लड़के थे. पण्डित जी को भी उतार लिया था. कुछ पूछ-ताछ के बाद पण्डित जी को छोड़ दिया. जिसकी वजह से झगड़ा हुआ था उसे भेज दिया. उसका कल पेपर था. हम सबको थाने में बैठा लिया गया. वो लड़की मुझे बार-बार देख रही थी.

ऐसा लग रहा था कि मेरे दिल में जो  है वो भी उसी के दिल में चल रहा था. फिर मैंने शैतान जैसे उसके पिता को देखा. और चुपचाप नज़रे नीचे करके बैठा गया. वो है कि देखे जा रही थी. कोई परवाह नहीं थी उसे. वो तो लॉकप के बाहर थी.

हम चार लोग तो अंदर थे. रात काफी हो गई थी. मुझे दूसरे दिन दोस्त की बहन की शादी में जाना था. नहीं पहुंच पाया तो वो भी नाराज होगा. मैंने भी पंगा ले लिया था. हीरो बन रहा था. सारी हीरोगिरी अब थाने में बंद होकर दिखा रहा हूं. तभी एक फोन बजता है.

पुलिस वाला उठाता है. हैलो, उसके बाद वो जी सर जी सर कहता है. और उस शैतान को देखता है.  मुझे लग गया था कि अब कुछ तो होने वाला है. हमें या तो पिटाई पड़ेगी या फिर छूट जाएंगे. फोन रखकर उसने अपना डण्डा उठाया.

और हम सबकी तरफ बढ़ा. मैंने मन में कहा लो बेटा अब डण्डे खाओ. वो पुलिसवाला करीब पहुंचा. और उस शैतान से पूछा आप ने पहले क्यों नहीं बताया. आप मंत्री जी के रिश्तेदार लगते हैं. मेरे तो होश उड़ गए. पूरा परिवार इस तरह से स्लीपर क्लास में.

उस आफिसर ने लॉकप खुलवाया और कहा आप लोग उधर मेरे गेस्ट हाउस में रूक जाएं. उसके पूरे परिवार को लेकर वो चलने लगा. मैं और वो दो लड़के लॉकप में बैठे थे.  तभी आफिसर के कान में उस शैतान ने कुछ बोल दिया. वो आफिसर मुझे देखने लगा. और वापस आ रहा था. मैंने तो सोच लिया अब मेरी पिटाई निश्चित है. उसने बताया होगा कि इसकी सारी शुरूआत मैंने की है. वो पुलिस आफिसर आया. मुझसे बोला चलो. फिल्मों में देखा था. पुलिस वाले ले जाते हैं और बाहर इंकाउण्टर कर देते हैं. या फिर बहुत मारते हैं. अरे भाई इतना बड़ा गुनाह नहीं किया था. जो इंकाउण्टर कर दोगे.

जरूर उस दरिंदे ने उसकी लड़की के साथ आंख मिचौली करते हुए देख लिया होगा. तभी अपनी पावर का गलत प्रयोग कर रहा है. चल बेटा नेकी करने गया था. अब भगवान को याद कर ले. घर वालों को याद कर ले। ऊपर जाने का समय आ गया है.

सुना है पुलिस वाले दौड़ा कर गोली मारते हैं. मैं तो दौडूंगा ही नहीं. उस ऑफिसर ने अकड़ कर कहा चलो. बाहर गाड़ी इंतजार कर रही है. अब तो दिल में एक धक्का लगा. हो गया काम कल पेपर में फोटो के साथ खबर छपेगी.

जिसमें लिखा होगा बदमाश को भागते समय पुलिस ने किया ढ़ेर. बाहर गया तो वो वही शैतान पूरे परिवार के साथ इंतजार कर रहा था. वो ऑफिसर ने कहा लो आप के दामाद को भी छोड़ दिया. मेरे तो होश उड़ गए. लगता है मैंने ठीक से नहीं सुना है.  उस शैतान ने कहा बेटा आप को बचाने के लिए बोल दिया है.  ऐसी कोई बात नहीं है.  चलो अब अपने घर के लिए ट्रेन पकड़ लो.  मैंने सोच लिया कोई बात नहीं अब सूली पर चढ़ जाऊं तो भी कोई फर्क नहीं है। कह दो यही मौका है. दिल पर पत्थर रखकर बोल दिया. अरे ऐसी बात है. मुझे आप की लड़की पसंद है. शादी करना चाहता हूं.

वो शैतान बोल क्या बोला फिर से बोल. अब तो मैं पीटा गया. क्या जरूरत थी बोलने की?  उसने फिर से पूछा .मैंने कोई जवाब नहीं दिया.  वो मेरे करीब आकर बोला. अरे बोलोगे या मुंह में दही जम गया है.  दिमाग कर रहा दिवाकर बेटा अब तो लड़की के छेड़छाड़ का केस बनेगा. एक लहराता हुआ हाथ मुझे पड़ने वाला था कि तभी एक प्यारी सी आवाज़ आई.

पिता जी मैं भी यही चाहती हूं. दो-तीन घण्टों के सफर में इतना भरोसा मुझपर. हाथ तो रूक गया. लेकिन उसके पिता कुछ ख़फ़ा थे. कुछ देर बाद कहा न जात का पता न परिवार का शादी करोगे दोनों. चलो शादी करा देते हैं. आज ही कराएगें. मेरी यही शर्त है.  मंजूर है.  आए हो प्यार करने.  मैं तो कुछ समझ नहीं पा रहा था. क्या करूं ?

ये कैसा धर्म संकट है ?  अभी एक से बाहर निकला था दूसरा सामने. माता-पिता से बात करने का मौका भी नहीं दे रहा है ये राक्षस. मैंने मना कर दिया. कुछ दिन का समय तो घर पर बात चलाऊंगा तो करूंगा. इतना सुनते ही वो चिल्लाते हुए बोला शादी तो अभी होगी.

इसी समय अब देखता हूं कौन मना करता है. मुझे मां की बात याद आने लगी थी. कुछ महीनों पहले घर से फोन गया था. मेरे लिए लड़की देख रखी थी. प्राइमरी स्कूल में टीचर थी. मुझे पसंद करना था बस. हम यूपी वालों के यहां तो वसूल बना है.

लड़की की शादी तय कर रहे हो तो पहले दहेज तय होगा. लड़की के पिता को एक लम्बी पर्ची पकड़ायी जाती है. शादी में ये सब चाहिए. साथ ही 200 बराती का स्वागत सत्कार अच्छे से करना. लड़की वाला बेचारा कुछ बोल भी नहीं पाता .

बोले तो कहीं शादी कैंसिल न हो जाए. मां ने भी मुझसे कहा. लड़की अच्छी है. दहेज में चार पहिया गाड़ी दे रहे हैं.  जो मांग की है वो दे रहे हे शादी में.  मुझे अभी तक उस लड़की की फोटो नहीं दिखाई गई थी. पसंद न पसंद का सवाल तो अभी उठता नहीं था .

मैंने मां से कह दिया था.  जब आऊंगा तो देख लूंगा लड़की को. लड़की को तो देख ही रखा हूं. इस रेलवे के सफर में.  जो मुझे तो बहुत पसंद है. वो भी इन तीन घण्टों के सफर में मुझे पसंद करने लगी. हम दोनों शादी करना चाहते हैं. लेकिन आज मेरे ऊपर धर्म संकट था. एक तरफ डर भी था. पता नहीं लड़की कैसी होगी. परिवार को संभाल पाएगी.

अभी मुलाकात को 3 घण्टे हुए थे. किसी के बारे में कैसे कुछ पता चले. वो लड़की का भरोसा भी तो अटल था. उसने भी शादी के लिए हामी भर दी थी. आखिर भरोसे पर तो दुनिया कायम है. मैं घर को फोन करना चाहता था. उस शैतान ने करने न दिया. बड़ा बेरहम आदमी है.

यही था तो दामाद बनाकर हवालात से बाहर क्यों निकाला ? मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. मेरा हाल तो आगे कुंआ पीछे खाई जैसा था. माता-पिता को क्या बोलूंगा ? मैंने उन्हें बताकर शादी नहीं की. उनका दिल भी टूट जाएगा. कितने अरमान सजाए होंगे ? कहेंगे फलाने के यहां कितना दहेज दे रहे थे.  अब तूने दूसरी बिरादरी की लड़की से शादी की.  रिश्तेदार क्या कहेंगे ?

कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. ये सब मैं सोच रहा था. तभी पण्डित जी नज़र आए. उस शैतान ने तुरंत पण्डित को बुलाया. और बोला शादी करानी है. पण्डित ने कहा कब ? उसने बोला अभी. पण्डित जी पगला तो नहीं गए. दूल्हा कहां है, दुल्हन कहां, बराती तो नज़र नहीं आ रहे. मेरी तरफ इशारा कर बोला दूल्हा.  अपनी बेटी की तरफ देखा, बोला दुल्हन.  और हम सब बराती.  पण्डित ने कहा लगता है छटिया गए हो.

मैंने तो मना करने की ठान ली. मुझे नहीं करनी शादी. वो लड़की अपने पिता से गिडगिड़ा रही थी. ये सब न करो. पहले दिवाकर के घर पर बात कर लो. वो शैतान सुनने का नाम नहीं ले रहा था. शादी तो अभी होगी. मैंने भी कह दिया चलो कराओ. माता-पिता का मना लूंगा.

दोबारा से घर पर धूम-धाम से कर लूंगा. वो लड़की मुझे देखकर रो रही थी. उसके हर एक आंसू मुझपर बोझ थे. जैसे वो अपने उन लोगों पर बोझ हो. न हर्रा न फिटकरी. विदा कर दो. कंजूस परिवार. उस लड़की के आंखों में काफी दर्द दिख रहा था. पण्डित ने बिना किसी अरेंजमेंट के मंत्र पढ़ा. हो गई हम दोनों की शादी. खड़े खड़े.

मंदिर में भगवान के फेरे लगवा दिए. अब तक सुबह के 6 बज चुके थे. आज ही आनंद के बहन की शादी थी. मुझे पहुंचना था. अब घर जाने में भी डर लग रहा था. क्या कहेंगे लोग ? बाहर से शादी करके चला आया. वो भी गैर बिरादरी.

उस शैतान ने कहा अपनी दुल्हन को ले जाओ. हम चले अपने घर. इतनी घटिया बाप मैंने पहली बार देखा. अब ओखली में सर डाले हैं तो मूसर पड़ेंगे. मैंने एक कार बुक की घर तक के लिए. उसी पर हम दोनों बैठ गए. रास्ते में हमने ठीक से बात तक नहीं की.

वो मुझे देख रो रही थी. मैंने उसे समझाने की कोशिश की. उसने सिर्फ इतना बताया कि ये मेरे सगे पापा मम्मी नहीं थे. वो तो बचपन में गुजर गए थे. बोझ थी मैं इन पर. तुम्हें देखा तो कुछ अपना सा लगा. मुझे हर रोज बिना गलती के मारते थे. गुस्सा तो बहुत आया.

उसके आंसू देखकर पी गया. अचानक एक जोरदार झटका लगा. कार बंद हो चुकी थी. दो बज रहे थे. घर जल्दी पहुंचना था. अरे ड्राइवर क्य़ा हुआ? ड्राइवर ने मुंह खोलते ही, सब गुड़ गोबर कर दिया. साहब कार खराब हो गई. लो तब नहीं तो अब बना काम. जहां कबीर दूध का जाएं, भैंस, पणवा दोनों मर जाए. बीच रास्ते में कार खराब होनी थी. सफर की शुरूआत ही नसुड्डेपन से निकली थी. भाई जल्दी से कोई मिस्त्री का इंतजाम करो. जी साहब करता हूं. अब क्या करोगे?  देखता हूं साहब कोई मिस्त्री का जुगाड़ करता हूं. जल्दी करो भाई. घर पर शादी है. साहब आप भी तो शादी करके जा रहे हो. उसकी बातें मुझे ताने की तरह लगी. अपना काम करो जल्दी से गाड़ी बनवाओ.

कहकर वो चला गया.

समय की धारा बढ़ रही थी. 5 बज चुके थे. न मिस्त्री का पता न उस ड्राइवर का. हमारे भरोसे कार को छोड़कर गायब है बंदा. हम दोनों पति पत्नी कार की चौकीदारी कर रहे थे. घर पहुंचने की व्याकुलता बढ़ती जा रही थी. 7 बज चुके थे. अंधेरा हो गया था. क्या करें दिमाग काम नहीं कर रहा था. मैं इधर-उधर घूम रहा था. टेंशन बढ़ रहा था. सोच रहा था, सजावट हो गई होगी. बारात भी आने का टाइम हो रहा है. क्या जवाब दूंगा आनंद को?  एक मोटर साईकिल कार के पास रुकी आकर.

ड्राइवर और मिस्त्री थे. बढ़ा समय लगा दिए भाई. साहब बहुत दूर से लाया हूं. आस-पास कोई नहीं था. चलो जल्दी बना दो भाई. देर रात तक पहुंच जाऊं. विदाई से पहले. आनंद खुश हो जाएगा. गाड़ी के पार्ट खुलने शुरू हो गए थे. मुझे लगा बस अभी मिस्त्री कह देगा हो गया. अब ठीक हो गई कार. लेकिन वो तो इतने सारे पार्ट खोल चुका था. मुझे डर था वो इसे नहीं बांध पाया तो.

जैसे –जैसे देर हो रही थी. मन में ख्याल आ रहा था. मिस्त्री अच्छा नहीं है. अभी तक बना नहीं पाया. रात के ग्यारह बज चुके थे. कार ठीक नहीं हुई थी. अरे भाई कितना समय अब लगेगा. बस साहब हो गया है. समान बांध दूं. रात्रि के 1 बजे हम वहां से आखिरकार चले दिए. भूख भी लग गई थी. भूख से याद आ गया था.

बाराती भी खाना खा रहे होंगे. आनंद गुस्सा जरूर होगा. शादी का कार्यक्रम बढ़ रहा होगा. एक होटल पर हम सब रूके. पेट पूजा भी करनी थी. खाना खाने के बाद हम फिर से सफर पर निकल पड़े. अब तो पता ही था कि किसी भी कीमत पर शादी में नहीं पहुंच सकते.

यही सोचते हुए कब आंख लग गई पता नहीं चला. ड्राइवर ने जगाया. साहब सुबह हो गई चाय पी ले तो चलते हैं. सुबह के 7 बजे थे. चलो यार पी लो. चाय पीते ही पता चला कि हम बस 120 कि.मी दूर थे. चाय पीकर हम निकल चुके थे. आनंद को क्या कहूंगा? और घर पर क्या बताऊंगा? बस यही रास्ते भर में सोच रहा था.

न जाने कितनी जल्दी घर का मोड़ आ गया। घर की तरफ गाड़ी मुड़ी। गाड़ी रुकते ही कुछ लोग सोच में पड़े कौन आया। आनंद के घर के सामने काफी भीड़ थी। रिश्तेदार बाहर बैठे थे। एक सजी कार जाने को तैयार थी. लोगों की रोने की आवाज आ रही थी. विदाई हो गई थी.  मेरी गाड़ी खड़ी हुई और विदाई वाली कार चली गई. एक तरफ दुल्हन की विदाई हुई थी. दूसरी तरफ मेरे घर पर दुल्हन की डोली आई थी. गाड़ी के नीचे उतरते ही देखा मां घर के दरवाजे पर खड़ी थी।

जैसे वो इंतजार कर रही थी। कि बेटा दुल्हन लेकर वापस आ रहा होगा। गाड़ी से दुल्हन को उतारना है। कार के आस-पास लोग आ गए थे. लड़की को बैठा देख सब दंग थे. घर पर मां से सब बताया. एक झापड़ कब पड़ गया पता न चला. कटा दी परिवार की नाक. ये पिता जी के अल्फाज थे. मां ने कहा चलो जो हो गया सो हो गया. लड़की को अंदर लाओ. लड़की के उतरते ही भीड़ का जमावडा लग गया था. दुल्हन को गृह प्रवेश कराया गया. आनंद भी आ चुका था. जिसे देख मेरी आंखों में आंसू थे. मैंने अपनी सारी कहानी आनंद को बताई. और कहा भाई मुझे माफ कर देना. उसने गले से लगाते हुए कहा दोनों शादी सफर में ही कर ड़ाली. और माफी मांगता है. चल दीदी गई तो तू मेरे लिए भाभी लेकर आ गया. सब हंस पड़े.

रवि श्रीवास्तव

लेखक, कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार,

सम्पर्क सूत्र- ravi21dec1987@gmail.com

मो-9718895616, 9452500016

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(ऊपर का चित्र - संध्या सालुंके, इंदौर की कलाकृति)

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रचनाकार: रवि श्रीवास्तव की कहानी - सफर में शादी
रवि श्रीवास्तव की कहानी - सफर में शादी
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