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दीपक आचार्य का आलेख - - दीवाली की राम-राम

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

दीवाली आयी नहीं कि राम-राम शुरू हो जाती है। धनतेरस से लेकर दीपावली तक सब तरफ शुभकामनाओं और बधाइयों के दौर चलते रहते हैं। 

सभी इस बात को लेकर खुश हैं कि एक-दूसरे को बधाइयां और शुभकामनाएं देकर हम औरों पर उपकार कर रहे हैं,  साल भर में एक-दो बार उनका स्मरण कर संबंधों और परिचय को ताजा करने का महान कार्य कर रहे हैं।

और वह भी प्रत्यक्ष नहीं बल्कि फोन, मोबाइल, एसएमएस, व्हाट्सएप, फेसबुक और ऎसे ही जाने कितने दूरवर्ती माध्यमों से। जहाँ खुद को कुछ नहीं करना पड़ता। एक-दो लाईन लिख कर भेज दो एक साथ, ग्रुप में डाल दो और मस्त हो जाओ।

फिर दीपावली के दिनों में कुछ ज्यादा मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है। बहुत सारे लोग हैं जो गणपति और लक्ष्मीजी से लेकर सारे देवी-देवताओं के फोटो भेजकर घर बैठे देव दर्शन करवाते रहते हैं, तरह-तरह के दीयों और संदेशों से दीपावली और उनकी याद तरोताजा कराते रहते हैं।

फिर खूब सारे दीपावली से एक सप्ताह पहले से ही एडवान्स शुभकामनाएं भेजकर अपने आपको सबसे पहले होने का दम भरते हैं। उन्हें अच्छी तरह पता होता है कि दीपावली के दिन एसएमएस तक ज्यादा खर्चीले हो जाते हैं।

दोहरा फायदा उठाने वाले ये ही लोग हैं जिनकी वजह से हम पखवाड़े भर पहले से रोज दीवाली के त्योहार को याद करने लग जाते हैं। भला हो इन लोगों का जिनकी वजह से हमारे पर्व और त्योहारों का प्लान बनाने के लिए दस-पन्द्रह दिन पहले ही शुभकामनाओं के बहाने ही सही रिमाइंडर आ जाते हैं।

शुभकामनाएं देना और शुभकामनाओं के संकल्प को पूर्ण करना दो अलग-अलग बाते हैं। बहुधा हम सभी लोगों को शुभकामनाएं देने में कभी पीछे नहीं रहते। यह औपचारिकता हमें मुखौटा कल्चर से जोड़ती है और दोहरे-तिहरे चरित्र वाले हमारे अभिनय को और अधिक धार देती है।

किसी का शुभ हो न हो, हमें क्या पड़ी है। फिर कौनसा हमारी वाणी इतनी सिद्ध है कि हमारी शुभकामनाएं फलती ही हैं। हम साल भर में कई-कई बार शुभकामनाओं का जखीरा उदारतापूर्वक लुटाते रहने के आदी हो गए हैं।

हमारा क्या जाता है, जो मिले उसे शुभकामनाएं देते चलो, कोई परिचित हो न हो, इससे क्या फर्क पड़ता है।  यह शुभकामना संदेश पेंशनरों द्वारा पेश किए जाने वाले जीवितता प्रमाण पत्र की तरह ही हो गए हैं जहां साल भर में दो-चार बार संदेश आते-रहने पर यह पक्का हो जाता है कि ये लोग अभी अस्तित्व में हैं।

हममें से बहुत से लोग हैं जो होली-दीवाली पर गुण्डे -बदमाशों और असामाजिक तत्वों से हाथ मिलाते हैं, गले मिलकर शुभकामनाएं देते हैं। कई धुर विरोधी भी आपस में ऎसा ही करते हैं। इनकी शुभकामनाओं में कौन सी मानवता की गंध होती है? यह या तो लोगाेंं को भरमाने का अभिनय है, अथवा औरों के भय से प्रसूत हुई शुभकामनाएं।

शुभकामनाओं ने अपनी ऊर्जा शक्ति खो दी है जब से शुभकामनाओं का अंबार लुटता चला जा रहा है। अब शुभकामनाएं औपचारिकता के सिवा कुछ नहीं रह गई हैं। हमारी शुभकामनाओं में इतना ही दम होता तो आज कोई बीपीएल नहीं होता, कोई गरीब नहीं होता, कहीं कोई झगड़े-फसाद नहीं होते, सर्वत्र शांति और संतोष पसरा होता, हर घर में गणपति और लक्ष्मी का वास होता। यह धरा स्वर्ग होती।

लेकिन हकीकत में ऎसा नहीं हो पा रहा है क्योंकि हम जो कुछ कर रहे हैं वह केवल नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं है। अक्सर हम उन लोगों को भी बड़ी ही गर्मजोशी से शुभकामनाएं देते रहते हैं जिनके बारे में हमारा मन यह कहता है कि इससे कमीन, नालायक और खुदगर्ज इंसान दुनिया में कोई दूसरा नहीं हो सकता, इस दुष्ट और शोषण करने वाले नरपिशाच को अब मर जाना चाहिए, ऎसे भ्रष्ट, रिश्वतखोर और बेईमान इंसान को जिन्दा रहने का कोई हक नहीं है, ये ही नुगरे हैं जिन्होंने समाज और देश की मिट्टी पलीत कर रखी है, इन्हीं व्यभिचारियों और अन्यायियों की वजह से देश तरक्की नहीं कर पा रहा है, ये ही हैं जो हरामखोरी के साथ जी रहे हैं और इंसान के नाम पर कलंक हैं .... आदि-आदि।

बावजूद इस शाश्वत सत्य के, हम चाटुकार लोग इन शोषकों और मानवता के हत्यारों को शुभकामनाएं देते हुए प्रसन्न होते हैं और इतने अधिक बौरा जाते हैं कि इनके साथ फोटो खिंचवाने को स्वर्ग के आनंद से कहीं ज्यादा मानकर सोशल साईट्स पर छा जाने की कोशिशें करते रहते हैं।

पता नहीं यह शुभकामना शब्द अर्थहीन क्यों होता जा रहा है। हममें से बहुत सारे लोग ऊपरी मन से शुभकामनाएं दे रहे हैं, उन्हें हमारे जीवन की समस्याओं, अभावों, पीड़ाओं और असामयिक तनावों आदि से कोई मतलब नहीं है।

न वे हमारे बारे में सोचते हैं, न हमारी किसी भी प्रकार की कोई मदद कर सकते हैं। हमारी क्या, ये किसी की भी मदद नहीं कर सकते। ये लोग सिर्फ वाहवाही लूट सकते हैं, अभिनय कर सकते हैं और शुभकामनाओं के नाम पर जमाने भर में अपने आपको उदारवादी, मददगार एवं आत्मीय सिद्ध करने के ही आदी होते हैं।

इनसे किसी प्रकार की अपेक्षा करना भी मूर्खता ही है। शुभकामनाएं देने वाले अधिकांश लोगों की यही कहानी है। ये लोग केवल बातों के हमदर्द हैं, बाकी इनका किसी से कोई मतलब नहीं है। हो सकता है कभी छपास की भूख और तस्वीरों की प्यास बुझाने के लिए कुछ आडम्बर कहीं रच दें अन्यथा ये लोग किसी काम के नहीं।

शुभकामनाएं देने में किसी का कुछ भी खर्च नहीं होता, कहने भर की ही तो बात है। फिर आजकल कहना भी नहीं पड़ता, बटन दबाओ और सबको एक साथ पहुंच जाती हैं शुभकामनाएं। खुद के पास लिखने की फुर्सत न हो तब भी कोई बात नहीं। बहुत सारे लोग स्लोगन और फोटो कैप्शन दागने को हमेशा तैयार रहते हैं। इनके पास कोई दूसरा काम है ही नहीं, साल भर में जब भी कोई पर्व-त्योहार आता है शुभकामनाओं के असंख्य थाल सजाकर भेज देते हैं। अपने पास रखो या औरों को फॉरवर्ड करते रहो। यह आपकी समस्या है।

हम भी पीछे क्यों रहें, जो मिले उसे दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देते चलें, दीपावली पर शुभकामनाओं के सचित्र संदेशों की बारिश करते रहें। लक्ष्मी प्रसन्न हो न हो, हमारे बारे में सभी को यह पता रहना ही चाहिए कि हम अभी धरा पर बने हुए हैं।

सभी को दीपावली की राम-राम....।

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