सोमवार, 9 नवंबर 2015

अभिमन्यु सिंह चारण की कविताएँ

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कविता - बदला

जब तुम नए कपडे पहनोगी  ,
पेड़ पर नए पत्ते आएंगे ,
मुरझाए फूल गुलशन होंगे
कोयल गीत गाएगी ,
ढोल बजेंगे
नृत्य होगा
पकवान बनेगें
तुम जेवर पहनो गी
हाथ पर मेहँदी लगेगी
शरीर पर उबटन होगा
लोग गले मिलेंगे
फिर....

मेरा इंतजार होगा
पर मैं नहीं आऊंगा
तुम मुझे ढूढोंगी
घर के अंदर
हर कमरे में
सीढ़ियों पर
घर की छत पर
हर चौराहें पर
मैं कही नहीं मिलूंगा

मोर रोने लगेंगे
कोयल विरह गीत गाएगी

तुम रोने लगोगी
चिल्लाओगी
ठीक वैसे हो
जैसे उस दिन
मैं रोया , चिल्लाया था
जब तुमने कहा था
तुम्हे लेखक पसंद नहीं

अभिमन्यु सिंह चारण

###############$########@

2. सुख तुम्हें कहाँ
      ढूँढू ?

मैं ढूढ़ता हूँ तुम्हें 
घर की चार दीवारी में
कभी ऊँचे पहाड़ो पर ।
कभी ठंडी हवा में
या फिर पुस्तकों के ढेर में ।

कभी मंदिर - मस्जिद में
कभी मूर्ति - चद्दरों में ।
गिरजाघर या फिर चर्चों में
कभी हाथ की लकीरों में ।

मैं ढूढ़ता हूँ तुम्हें
अपनी पत्नी के गहनों में ।
कभी सोने या फिर चाँदी में
हजारों लाखों रुपयों  में ।
चमकते बाजारों या फिर
रंग - बिरंगे मॉलों में ।

आज तक तुम मुझे
कहीं नहीं मिले ।

शायद ,  तुम मिल जाओ
किसी बुजुर्ग को सड़क
पार करवा कर 
ठंड से कांपते शरीर को
कम्बल ओढ़ा कर ।

नन्हे हाथों में बिकते
कुछ गुलाब खरीद कर
ऑफिस के बाहर बैठे
बाबा को कुछ खिलाकर ।

गली में कागज बीनते
बच्चों को पढ़ा कर या
अँधेरे घरों में
कुछ रौशनी फैला कर ।

मुझे पता है
तुम यहीं मिलने वाले हों ।
हों न ।

अभिमन्यु सिंह चारण
जालोर , राजस्थान
09001699762

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