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कामिनी कामायनी का यात्रा संस्मरण : मलाका -एक अद्वितीय शहर

मलेशिया का एक राज्य ,मलाका स्वच्छ नील गगन ,घनघोर हरियाली और विशाल समुद्र तट पर बसा हुआ एक बहुत ही खूब सूरत जगह है।  यह पर्यटकों के लिए एक बेहद आकर्षक जगह बन गया है । बचपन में पढे गए सिंदबाद की यात्रा अनायास याद आ जाना मेरे मस्तिष्क में एक ऐसा रहस्यमय किला बना गया ,लगा ,इसे गंभीरता से जानने ,समझने ,बूझने के लिए ही मैं यहाँ की दहलीज पर आ खड़ी हुई थी । सुल्तान ,शाहजादे ,शाहजादिओं की धरती ,व्यापार और व्यापारियों की धरती ,तीर और तलवार की धरती ,तिलस्म और खुराफात की धरती ,षडयंत्र और गुनाह की धरती । क्या इसे कभी चैन मिला होगा ?

0 । यह देश की राजधानी कुवालालम्पूर से 147 किलोमीटर और सिंगापूर से 245किलो मीटर दूर है ।यहाँ की सड़कें चौड़ी और सुंदर है ,।  इसकी विधिवत  स्थापना 1396 ईसवी में परामेश्वरा जो तेमासिक {प्राचीन सिंगापूर का अंतिम राजा था } ने किया । यहाँ मलाका नाम का वृक्ष और नदी  भी है,शायद इसी के नाम पर इसका नाम कारण हुआ हो । प्रथम सुल्तान के आगमन के पहले मलाका एक मछुआरों का गाँव था ।उसकी अपनी व्यथा कथा थी और अपना एक इतिहास था । मलय सभ्यता का प्रभाव अगल बगल के पड़ोसी राज्यों मे आज भी दिखाई पड़ता है ।

      मलाका पर मलाका सुल्तान ,डच ,पुर्तगाल ,ब्रिटेन ,और जापान ने भी शासन किया था ,और अपने अपने स्थापत्य कला,रीति रिवाज के अवशेष भी छोड़े । सन 1957 के 31 अगस्त को यह स्वतंत्र हो गया {मलेशिया}  अपनी प्राचीन धरोहरों  की वजह से यह एक अति महत्वपूर्ण स्थान समझा गया और ,7 जुलाई 2008 को इसे यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज मे शामिल कर लिया गया ।

     प्राचीन काल मे यह सामुद्रिक व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था ,प्राय; कई देशों से इसके व्यापारिक संबंध थे जिसमें भारत भी एक था ।अपने सामरिक महत्व के खातिर यह प्राय; दुश्मनों की आँखों मे खटकता रहता था । इसकी प्राचीन गाथाएँ इसके म्यूजियम ,इसकी कला कृतियों ,इसके वर्तमान शहर में भी अंगड़ाई लेती देखी जा सकती है । मलाका राज्य की राजधानी मलाका है । मलाका का नारा है “विजिटिंग मलाका मीन्स विजिटिंग मलेशिया”। यह मलेशिया का तीसरा सबसे छोटा राज्य है ,पहला पेरालिस और दूसरा पेनांग है ।  मलाका  के एक खूब सूरत  पाँच सितारे बहुमंजिले होटल से मलाका शहर का दृश्य देखते ही बनता था , शहर के किनारे दूर दूर तक समंदर ,समंदर मे जाती हुई कश्तियां,कश्तिओ पर मचलती हुई,ख्वाब से भरी , जिंदगानियाँ । रात में रंगबिरंगी बल्बों से चमकता शहर अलिफलैला के किसी सुनहरे संसार की रचना करती हुई सी लगती  है।

यहाँ बहुत कुछ देखने वाली जगहें हैं ।सेंट पीटर चर्च ,कहते हैं कि इसकी घंटी 1608 ईसवी में गोवा से लायी गई थी । इस्ताना केसुलताना मेलाका – इस बहू मंज़िले  महल रूपी म्यूजियम को देखने पर वहाँ के प्राचीन राजदरबार के गतिविधिओं की झलक मिलती है । मंहगी लकड़ी का नक्काशीदार महल ,दरवाजे पर दो हबशी भाला  लिए खड़े ॰हब्शी की आँखों मे क्रूरता ,राजमहलों की छतों पर बैठी ,घूमती किसी भी महिला पर कोई आँख भी उठा कर देख ले ,चाहे वो जो हो ,उसकी मौत तय थी ,इन्हीं खूंखार पहरूओं के हाथों ।

दरबार में राजा के बाद कौन अधिकारी कहाँ बैठता था ,इसे मूर्ति के माध्यम से बहुत खूबसूरती के साथ दिखाया गया है । राजकुमारों के सजीले वस्त्र ,गहने, सुल्तान का शयन कक्ष ,उनके दरबार में आने वाले विदेशी व्यापारियों ,उनके उत्पादन या सामाग्री आदि को बहुत ही बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया गया है । बड़े बड़े आयल पेंटिंग के माध्यम से भी तत्कालीन सल्तनत की दिन चर्या दिखाई गई है ।

इसके अलावे भी यहाँ बहुत सारे म्यूजियम है ।एक म्यूजियम विराट जहाज पर भी बना हुआ है जो अपने आप मे निराला है  इस प्राचीन  जहाज के सबसे नीचे वाले तल में समुद्री लुटेरों ,आक्रमणकारियों को पकड़ कर रखा जाता था ,कुछ को मार दिया जाता था कुछ को गुलाम बना कर बेच या काम पर रख लिया जाता था । एडुकेशन म्यूजियम ,कस्टम म्यूजियम आदि भी देखने योग्य है । ।कस्टम म्यूजियम में तो साठ के दशक के मोहम्मद रफी के गाने बज रहा था ,काउंटर पर बैठे मलय व्यक्ति ने इसे सुनना अपना शौक बताया । द्वितीय विश्व युद्ध से पहले 1876 और 1941 के बीच वहाँ तकरीबन 55 मलय अखबार प्रकाशित होती थी और 100पत्रिकाएँ मलय ,अरबी और रोमन मिश्रित भाषाओं में प्रकाशित हुई थी .। यहाँ का पहला मलय  अखबार जावी पेराना कान1876 में सिंगापूर से प्रकाशित हुई थी ।यहाँ का साहित्य बहुत ही समृद्ध है । और साहित्यकारों का सम्मान भी काफी है ।

  लिटरेचर म्यूजियम की संरचना एक निवास स्थान की तरह ,यहाँ नीचे के तहखाने में बंदियों ,लुटेरों को कैद करने की जगह बनी है । समुद्री इलाका होने के कारण यहाँ चोर लुटेरों का काफी उपद्रव भी होता रहता था । विभिन्न प्रान्तों के व्यापारियों के आने से यहाँ इस्लाम का प्रादुर्भाव बहुत पहले हो गया था ।

वहाँ का मौल पहलावान का वास्तु शिल्प बेहद आकर्षक है । अलादीन के चराग ,जुते ,सुराही आदि देखते ही बनती है ।

वहाँ खाने पीने के लिए अनेक बेहतरीन होटल और रेस्तरा हैं । यहाँ मलय ,चीनी ,भारतीय आदि सभी प्रकार के भोजन मिलते हैं । यहाँ प्राचीन चर्च की सुन्दर इमारत के सामने खूब सूरत तरीके से सजाए रिक्शे लगे रहते हैं ,जिसपर लोग सवारी कारण पसंद करते हैं ।

    मेनारा तमिंग साई सबसे ऊंची[ 110 मीटर]  परिक्रमा करती हुई मीनार है जहां से पूरे मलाका का दृश्य दिखाई पड़ता है ,पुरानी पुर्तगाली बिल्डिंग से दूर आधुनिक इमारतें इसे नूतन और पुरातन दोनों दृष्टि से बेमिसाल बनती है ।

सन 2010 के 21 अक्तूबर को हुए एक समारोह मे कहा गया कि ओरगनाईजेशन फॉर इकनॉमिक कोओपरेसन एंड डेव्लपमेंट द्वारा निर्धारित बेंचमार्क पूरा कर यह डेव्लप्ड स्टेट बन गया है ।

   यहाँ की आबादी के 63% मलय हैं ,25.3% चीनी ,भारतीय और चील्टी 6% ।कुछ संख्या मे यहाँ सिक्ख समुदाय है जिन्होने गुरुद्वारा बनाया है । मलाका एक समृद्ध देश है {पहले यह ओपेक का सदस्य था } और प्रकृतिक संसाधन से भरपूर भी ।  यहाँ के लोग बड़े रईस  स्वभाव के होते हैं बड़ी बड़ी गाडियाँ चलाना ,मौज मस्ती करना इन्हें अच्छा लगता है । वहाँ चारों तरफ काफी लंबी दूरी तक ऊंचे ऊंचे पेड़ है यहाँ का टिंबर पूरे विश्व में निर्यात होता है ।

    कामिनी कामायनी ॥

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