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प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून' की ग़ज़लें

1.

रूठ कर बैठा रहूँ कोई मनाता ही नहीं।
माँ मुझे तेरे सिवा कोई हँसाता ही नहीं।


मैं बुलंदी पर मिरे हर ओर मीठे लोग हैं,
आइना भी आज मुझको सच बताता ही नहीं।

क्या बढ़ाये बॉस बेमतलब हमारी सैलरी,
पास डिग्री टॉप की पर हुनर आता ही नहीं।

ग़र मुझे मालूम होता यूँ उड़ाओगे इसे,
सच कहूँ बेटा कभी पैसे जुटाता ही नहीं।

इस जुदाई ने हमें कुछ इस तरह पागल किया,
कब मिले बिछड़े हमें कुछ याद आता ही नहीं।

 

2.

तुम्हारा दिल किसी के वास्ते घर हो गया होगा।
हमारे वास्ते अब तक तो' पत्थर हो गया होगा।

ये रहमत बादशाहों की बँटी होगी रियाया में,
कोई इक बूँद तो कोई समंदर हो गया होगा।

अभी है बचपना ये दोस्ती गाढ़ी बहुत है जो,
जवानी तक हमारे बीच अंतर हो गया होगा।

करो ये कल्पना मंगल कभी उर्वर रहा होगा,
कहीं ये यूरिया से तो न बंज़र हो गया होगा।

कहा जो झूठ होता तो कई हमदर्द मिल जाते,
यकीं सच बोलने पर ही कलम सर हो गया होगा।

--

परिचय

प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

ग्राम : सनगाँव पोस्ट : बहरामपुर

जिला : फतेहपुर उत्तर प्रदेश

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