सोमवार, 9 नवंबर 2015

सागर यादव 'जख्मी' की प्रेम कविताएँ व मुक्तक

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1.(मुझे जहर दे दो)
देना है तो मुझे जहर दे दो
यूँ जुदाई का गम न दो
तुम्हारे हाँथोँ मरना
मै अपना सौभाग्य समझूँगा
मगर , तुम्हारी याद मेँ
घुट -घुट कर जीना
मुझे किसी भी कीमत पर
मंजूर नहीँ |
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2. (मुजरिम)
सोचा था
शराफ़त से जियूँगा मगर
इंसानियत ने मुझे मुजरिम बना दिया |
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3.(मेरा दिल)
मेरा दिल
एक कोरे कागज़ की तरह है
जो भी आता है
अपना नाम अंकित करके
चला जाता है
और इस बार यह खता
आपने की है |
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4. (लकीर)
जिन्दगी जीने के लिए
मुझे लंबी उम्र की नहीँ
बस तुम्हारे साथ की जरूरत है
पर, ऐसा नहीँ हो सकता
क्योँकि , मेरे हाँथोँ मेँ
तुम्हारे प्यार की
एक भी लकीर नहीँ है |
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5. (पीर)
जो पीर मेरे मन की भीतर है
काश! वो तेरे भी दिल मेँ हो
और तुझे मेरी मोहब्बत का
पता चल जाए
उसके बाद
मेरा दम भी गर निकल जाए तो
कोई गम नहीँ  |
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1.
बुझे दीपक जलाने कौन आएगा
सोयी किस्मत जगाने कौन आएगा |
जिसे चाहा वही धोखा दिया  'सागर '
हमेँ अपना बनाने कौन आएगा ||
2.
तुम्हेँ चाहा तुम्हेँ पूजा खता थी बस यही मेरी
तुम्हीँ पे जाँ लुटाया हूँ सदायेँ कह रही मेरी |
जला दो घर मिटा दो प्यार के सारे निशाँ को तुम
हूँ सागर प्रेम का सुन लो ये बातेँ हैँ कही मेरी||
3.
भली बातेँ सिखाते हैँ
डगर अच्छी दिखाते हैँ |
सदा पूजो पिता को तुम
वही किस्मत बनाते हैँ ||
3.
अकेला छोड़ जाती हो
मेरा दिल तोड़ जाती हो |
बता दो क्या खता मेरी
क्यूँ मुँह को मोड़ जाती हो ||
4.
थोड़ा ही पर रुलाएगी
सभी को आज़माएगी|
बड़ी शातिर ये दुनिया है
अजब नखरे दिखाएगी ||
5.
कभी रोना कभी हँसना पड़ेगा
कहर जीवन का सब सहना पड़ेगा |
इसी उम्मीद रोये नहीँ हम
गमोँ को एक दिन मिटना पड़ेगा||
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निकम्मा
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मै अपने लिए नहीँ
बल्कि समाज के उन लोगोँ के लिए
जीना चाहता हूँ
जिनका इस संसार मेँ
कोई नहीँ है
मेरे माँ-बाप के
भरण-पोषण के लिए
मेरे दो और भाई हैँ
समाजसेवा मेरी रग -रग मेँ बसा है
मगर मेरे घरवाले
मेरी भावनाओँ की जरा भी
कद्र नहीँ करते हैँ
और निकम्मा कहकर
मेरा अपमान करते हैँ |
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सागर यादव 'जख्मी'
नरायनपुर,बदलापुर,जौनपुर,उत्तर प्रदेश
sagareditor6@gmail.com

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