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शशांक मिश्र भारती का आलेख - पर्यावरण की चिन्ता और चिन्तन

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        आज विश्व में पर्यावरण पर चिन्तन मनन हर ओर हो रहा है।विकास के सारे क्षेत्रों सृजन,जनसंचार,शिक्षा ,चिकित्सा, विज्ञान ,प्रौद्योगिकी ,जनसंचार, आवागमन ,अनुसंधान, उद्योगजगत आदि में  एक स्वर से स्वीकार्य हो चुका है, कि पर्यावरण की अवहेलना प्रकृति के कार्यों में निरन्तर हस्तक्षेप मानव जीवन के लिए कदापि सुखदायी व सुरक्षित नहीं है।साथ ही प्रकृति-मानव व आधुनिक विकास के सामंजस्य से ही सभी का कल्याण सुनिश्चित हो सकता है।सागर की अतल गहराईयों से लेकर अन्तरिक्ष की अनन्तता तक कोई भी इसके महत्व को नकार नहीं सकता।चाहे विज्ञानविद हों या खगोलविद् अन्ततः  अरगो खगीयान ,महतो महीयान अर्थात् प्रकृति सूक्ष्म से सूक्ष्म और विशाल से विशाल है पर आकर अटक जाते हैं।


         मानव को अपनी माता की गोद के बाद प्रकृति की गोद ही भाती है। सदियों से भारतीय मनीषियों ने प्रकृति के आश्रय में रहकर वेद उपनिषद आरण्यक, ब्राह्मण, भाष्य, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ रचे हैं।प्रकृति को ही अपने अनुसंधान की प्रयोगशाला बनाया। उस समय वनस्पति को काटते समय यह सोचा जाता था कि उसमें अनेक स्थानों पर फिर से अंकुर फूटें-


अयं हित्वा स्वधि तिस्ते तिजानः
प्राणिनाय महते सौभगाथ।
अतस्वत्वं देववनस्पते श््रातवत शे
                   विरोह सहस्रवतषा  विवयं रूहेम। यजुर्वेद संहिता-5.43।

         मानव जीविका से जोड़ते हुए शतपथ ब्राह्मण-133.10 में उल्लेख है कि पृथ्वी पर जहां पौधे बहुत होते हैं वहां जीविका भी बहुत है

यथा- यत्र वाऽअस्यै बहुलतमा,
                                         औषधयस्त दस्या उपजीवनीयतम्।

         ऋषि-मुनियों का वृक्षादि वनस्पतियों से अपार प्रेम रहा है।रामायण और महाभारत में वृक्षों-वनों का चित्रण पृथ्वी के रक्षक वस्त्रों के समान प्रदर्शित है, महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् में प्रकृतिशकुन्तला की सहचरी से दिखती हैं ,वहीं मनुस्मृति आदि धर्मग्रन्थों में स्वार्थ के लिए हरे-भरे पेड़ों को काटना पाप घोषित किया गया है। अनाश्यक रूप से काटे गये वृक्षों के लिए दण्ड का विधान है। मत्स्यपुराण में वृक्ष महिमा का वर्णन करते हुए दस पुत्रों के समान एक वृक्ष को महत्व दिया गया है।

          भविष्य की भयावहता का पूर्व अनुमान लगाते हुए  संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए अणुव्रत पाक्षिक 16 जून 1997 पृष्ठ 11 पर छपे लेख में लिखा गया था-‘कि यदि शेष  बचे रहे जंगलों के दोहन की प्रक्रिया न रोकी गई तो सन् 2090 तक मनुष्य का सांस लेना भी बोझिल हो जायेगा।’ तो उपरोक्तों से यह स्पष्ट है कि प्रकृति को अनदेखा नहीं किया जा सकता उसके असन्तुलन से अनेक समस्यायें मानव जीवन व इस संसार में उत्पन्न हो सकती हैं।

          पर्यावरण की उपयोगिता उसके बढ़ते महत्व को सृजनकारों द्वारा विविध माध्यमों से रेखांकित किया जाता रहा हैं साहित्य के विविध अंगों निबन्ध, उपन्यास  कहानी लघुकथा , यात्राएं, संस्कमरणादि आधार बने हैं।कविता का सम्बन्ध चूंकि मानव हृदय से है इसलिए प्रकृति की सहचरी कविता अपने विविध रंग-रूपों में सदियों से रही है कवि कोविद वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति, भारवि, माघ ,बाणभट्ट से तुलसी, भारतेन्दु, श्रीधर पाठक,जयशंकरप्रसाद,राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानन्दन पंत, निराला, महादेवी वर्मा रामधारी सिंह दिनकर भवानीप्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय तक आयी।

समय के साथ बदलती आवश्यकताओं ने बदलाव कराये और इसी का परिणाम है कि काव्य के नये- पुराने तुकान्त अतुकान्त,गेय-अगेय स्वरूपों में आज पर्यावरण विषयक काव्य का सृजन हो रहा है उसका बड़े से छोटे स्तर तक की पत्र-पत्रिकाओं,पुस्तकों,संकलनों में नियमित प्रकाशन हो रहा है।पर्यावरणपत्रिका, भगीरथ,जलचेतना और शिवम्पूर्णा पत्रिकायें इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण  दायित्व निभा रही हैं।प्रदूषण, शुद्धपेयजल, गौरया बचाओ,पर्यावरण के घटकों का संरक्षण,स्वच्छता आदि सभी पर कार्य हो रहा है।इनमें अर्न्तराष्ट्रीयजलदिवस,पर्यावरण दिवस,ओजोन संरक्षण दिवस नयी चेतना का संचार करते है।वहीं निबन्ध,आलेख,शोधों,संगोष्ठियों-चार्चाओं के द्वारा निरन्तर नये-नये प्रयास और प्रयोग हो रहे हैं, कि कैसे भी कर मां के गर्भ में सुरक्षित अजन्में शिशु की भांति मानव भी पर्यावरण के गर्भ में उसके पांचों तत्वों-अग्नि,जल,वायु,धरती व आकाश से सन्तुलन बना सुरक्षित ही न रहें, अपितु प्रगति की ओर अग्रसर भी रहे। उसकी आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुखद व दीर्घ बन सके।

       अन्त में यह कहा जा सकता है कि पर्यावरण के दोनों पक्षों भौतिक व सांस्कृतिक के अंगो-उपांगों में सन्तुलन रख उनकों आवश्यकतानुसार संरक्षित कर धरती को उसकी पावनता को सभी प्रकार के प्रदूषण से बचाया जा सकता है।


शशांक मिश्र भारती

संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन

बड़ागांव शाहजहांपुर – 242401

उ.प्र.

दूरवाणी:-09410985048/09634624150

 

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(ऊपर का चित्र – गूगल सर्च से)

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