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दीपक आचार्य का आलेख - वास्तु दोष देते हैं स्पीड ब्रेकर और गड्ढे

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वास्तु के मामले में कई सारे पहलुओं पर विचार किया जाता है। केवल किसी के घर का भीतरी वास्तु कितना ही अच्छा हो, बाहर और आस-पास कोई गड़बड़ी हो तो उस पूरे क्षेत्र का वास्तु दूषित हो जाता है।

यही कारण है कि सभी स्थानों पर भूमि का उपयोग और महत्त्व न्यूनाधिक रहता है। कई स्थानों पर अच्छे संकेतों के सुकून प्राप्त होते हैं और दूसरे स्थानों पर कोई न कोई अभिशाप, अंधकार या दुर्घटनाओं की निरन्तरता सताए रहती है।

बहुत सारे स्थान होते हैं जो इंसान को निरापद और विकसित जीवन देते हैं। इसके विपरीत कई स्थान ऎसे भी होते हैं जहाँ कोई सुखी नहीं रह पाता।

आजकल सब तरफ वास्तु का जोर है, वास्तु की चर्चाएं होती हैं। कोई भ्रमित करता है, कोई सच-सच कहता है, कोई तोड़-फोड़ करवाता है और बहुत से हैं जो बिना किसी तोड़-फोड़ के कुछ यंत्रों और बदलाव के माध्यम से वास्तुदोष ठीक करने की बात करते और कहते हैं।

अब तो वास्तु आकर्षक धंधे के रूप में स्थापित होता जा रहा है। लोगों को भ्रमित करने वाले भी हैं और सही ज्ञान देने वाले भी। पर अधिकांश के लिए वास्तु से बड़ा कोई धंधा नहीं हो सकता। जहां हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा का चोखा। न कोई लागत पूंजी, न कोई काउंटर या ऑफिस। फिर भी चले धंधा सौ-सौ की स्पीड़। पर सारे वास्तुविद् घर के भीतरी ज्ञान तक ही सीमित हैं।

अधिकांश लोग घर के भीतरी वास्तु के प्रति ही गंभीर रहते हैं, घर के बाहर चाहे किसी भी प्रकार का दोष क्यों हो। और इस कारण से उन सभी को परेशानी भुगतनी पड़ती है जो आस-पास रहते हैं। 

घर के भीतर का वास्तु चाहे कितना ही शास्त्रीय पद्धति से हो, वास्तु का पूरा-पूरा ज्ञान हो, जब तक परिवेशीय वास्तु ठीक नहीं होता, तब तक समस्याओं, शोक और बीमारियों का कम-ज्यादा प्रभाव हमेशा बना ही रहता है।

इस संसार में असंख्यों अच्छी-बुरी आत्माएँ भटक रही हैं जिन्हें हम भले ही नहीं देख पाते हों मगर वे सूक्ष्म और अदृश्य आत्माएं और विभिन्न योनियों वाले जीव हमें और हमारी हर हरकत को अच्छी तरह देखते हैं, इन पर पूरा और पक्का प्रभाव डालते हैं।

इसलिए बात भूमिगत नैसर्गिक प्रवाह से संबंधित हो या फिर सतही अथवा अंतरिक्ष के किसी प्रवाह की, हर मामले में इनसे जुड़े कारक बस्ती और घरों में रहने वालों पर अपना अच्छा-बुरा प्रभाव दिखाते ही हैं।

घरों के आस-पास, पहुँच मार्गों, आगे-पीछे की स्थिति का न केवल मनुष्यों पर बल्कि सभी प्रकार के प्राणियों पर असर पड़ता है। यही नहीं तो आस-पास की वनस्पति पर भी असर होता है।

घर-आँगन तक पहुंच के मार्ग व आस-पास के रास्तों का प्रवाह मार्ग ठीेक-ठाक होना चाहिए। इनके नैसर्गिक प्रवाह में किसी भी प्रकार की कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। इसी प्रकार आस-पास के नालों, नालियों का प्रवाह बाधित न हो, पोखर और गंदे सडांध भरे स्थल नहीं होने चाहिएं। इससे वास्तु दूषित होता है। 

होता यह है कि जितनी घर के बाहर या आस-पास अथवा पहुंच मार्गों पर गंदगी होती है, बुरी आत्माएं अपने लिए इन स्थलों को बेहद निरापद एवं उपयुक्त आवास मानकर वहां बसना आरंभ कर देती हैंं।

एक बार बुरी आत्माओं या नकारात्मक वस्तुओं का जमावड़ा होना शुरू हो जाने पर इनकी स्वाभाविक आदत होती है कि अपना विस्तार होता रहे। खाली पड़े भूखण्डों पर कचरे का जमावड़ा, घर के पास ठहरा हुआ पानी, कूड़े-करकट और अनुपयोगी निर्माण सामग्री या भराव का टीला घातक होता है।  जिसके घर तक पहुंच का रास्ता ठीक नहीं है, उसका घर भी अच्छा और सुकून देने वाला नहीं हो सकता।

आमतौर पर सभी तरफ आजकल स्पड़ बे्रकरों का जबर्दस्त नेटवर्क है। हर थोड़ी दूरी पर स्पीड़ बे्रेकर होते हैं। जहां स्पीड़ ब्रेकर नहीं हैं वहाँ सड़कों पर खड्डे भी दिखाई देते हैं। यह अपने आप में इस बात को सिद्ध करता है कि उस भूमि या क्षेत्र विशेष में नैसर्गिक प्रवाह या तो स्पीड़ ब्रेकरों द्वारा रोक लिया जा रहा है अथवा नैसर्गिक ऊर्जा खड्डों में गिरकर जमीन द्वारा अवशोषित कर दी जा रही है।

फिर जहाँ खड्डे हों या स्पीड ब्रेकर हों, इनसे वहाँ से गुजरने वाले लोगों और वाहनधारियों को जो पीड़ा होती है, उससे उनकी आह निकलती है और यह सारी आहें इन स्थानों पर नकारात्मक ऊर्जाओं को और अधिक ताकतवर बनाती रहती हैं।

कोई भी इंसान विचित्र और बेढ़ंगे बने स्पीड़ ब्रेकराें और खड्डों को पसंद नहीं करता, इस कारण जो कोई वहाँ से गुजरता है, नकारात्मक टिप्पणी करता है अथवा दुःख अनुभव करता ही करता है।

यह स्थिति किसी भी स्थान विशेष के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। कुछ लोग भले ही स्पीड बे्रकरों को ठीक मानें लेकिन सत्य और तथ्य यही है कि जहां स्पीड़ ब्रेकर होंगे वहां की तरक्की बाधित होगी ही।

जिन दुकानों के आस-पास स्पीड ब्रेकर होते हैं वे दुकानें अभिशप्त हो जाती हैं और वहां धंधा नहीं चल सकता। यही स्थिति उन घरों की है जिनके आगे स्पीड़ बे्रेकर हैं। इन घरों में कोई न कोई समस्या, दरिद्रता और बीमारी रहती ही है। अपने इलाके में ऎसी दुकानों, घरों और प्रतिष्ठानों को देख लिया जाए तो सच अपने आप सामने आ ही जाएगा।  ग्राम और नगर के सम्पूर्ण वास्तु की भी यही स्थिति जाननी चाहिए।

इसलिए सुकूनदायी जीवन के लिए प्राथमिक आवश्यकता यही है कि घर के कोने-कोने से लेकर बाहर, आस-पास और सम्पर्क सड़क तक सभी कुछ साफ-सुथरा होना चाहिए, रास्ते में कहीं भी अनुपयोगी सामग्री या कचरे-मलबे के ढेर न हों, खाली भूखण्ड में गंदगी न हो। तभी सम्पूर्ण वास्तु को ठीक माना जा सकता है।

वास्तु के मूल मर्म को जानें और पूरे परिवेश के प्रति गंभीर रहें क्योंकि जहां हम रहते हैं वह स्थान हमारे लिए मन्दिर की तरह पावन होना चाहिए।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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(ऊपर का चित्र -अजय पुन्यासी की कलाकृति)

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