प्रदीप कुमार साह की लघुकथा - प्रयत्न

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एकबार कोई जिज्ञासु किसी तपोमूर्ति साधु को प्रणाम निवेदित कर उनके समक्ष अपना यक्ष प्रश्न रखा-"हरि कथा सुनने में मेरी अत्यन्त प्रीति है; जितना सुनता हूं मन नहीं भरता. किन्तु अभी तक हरि कौन हैं और हरिकथा सुनना किसलिए का समाधान नहीं हुआ.

जवाब मिला-"हरि अनंत हरि कथा अनंता; निज मति अनुरुप गावहि श्रुति संता. अर्थात् हरि अनंत स्वरुप, प्रत्येक जड़-चेतन जीव एवं उनके गुण-धर्म अर्थात स्वभाव एवं उनके कर्म-विकर्म के कर्म फल हैं. अनंत द्वारा स्वभावतः रचित चरितार्थ कर्म की व्याख्या (कथा) निश्चय ही उनसे अधिक बड़ा है,जो सभी जानते हैं. किंतु इच्छा भी अनंत होती हैं. जब हरि और इच्छा दोनों अनंत हैं फिर एक त्याज्य क्यों? वास्तव में त्याज्य कोई नहीं. दोनों धनुष के दो सिरे हैं, जो एक कभी नहीं हो सकते किन्तु परिपूरक आवश्य हैं. प्रयत्न -रुपी कर्म की रस्सी से दोनों का सामजस्य रखना परम आवश्यक हैं. प्रयत्न विचार के अनुरुप ही होता है. 'सामजस्य विचार' प्राप्ति हेतु इच्छा का नियंत्रित होना आवश्यक है. इच्छा पर नियंत्रण स्वभावतः होता है. स्वभाव निर्माणहेतु हरिगुण या सद् गुण ग्रहण करने हेतु कर्म एंव प्रयत्न किये जाते हैं. वही कथा सुनना 'प्रयत्न' है. कहा भी गया है कि 'कर्म प्रधान विश्व करि राखा,जो जस करहिं सो तस फल चाखा.' कर्म का सार तत्व प्रयत्न है."

ऐसा कहते हुये साधु तप –लीन होने के प्रयत्न करने लगें और अपने प्रश्न का समाधान पाकर जिज्ञासु साधु को प्रणाम कर विदा लिया.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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