बुधवार, 11 नवंबर 2015

कैलाश प्रसाद यादव सनातन की दीवाली कविता–आओ तम को दूर भगाएँ…

आओ तम को दूर भगायें...

मावस को हम कर दें पूनम, आओ झिलमिल दीप जलायें।
कोना -कोना कर दें रोशन, गले लगायें,
घर-घर जाकर, मिलें जुलें हम, आओ समता-भाव जगायें।

कोना -कोना कर दें रोशन, आओ तम को दूर भगायें।।

 

किसी के घर में दीप नहीं है, किसी के घर में तेल नहीं,

ऐसे जग में स्वर्ग नहीं है, जहां पे जग में मेल नहीं।

जिनकी ऑंखों बसा अंधेरा, उनके दिल में दीप जलायें।

कोना -कोना कर दें रोशन, आओ तम को दूर भगायें।।

यहां पे घर-घर छटा निराली, हर ओर छाई दीवाली,

कहीं पड़ोसी मुस्लिम भाई, कहीं सिक्ख और कहीं ईसाई,
कोई कोना छूट न जाये, कोई पड़ोसी रूठ न जाये,

दीप जलाना रंगबिरंगे, कोई रिश्ता टूट न जाये,

दीप-दान घर-घर में कर दें, आओ ज्योति पर्व मनायें।

कोना -कोना कर दें रोशन, आओ तम को दूर भगायें।।


सनातन

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