रविवार, 1 नवंबर 2015

दीपक आचार्य का आलेख - ये रहते हैं हमेशा शोक संतप्त

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कुछ लोग पैदाइशी शोकाकुल होते हैं। शैशवावस्था में जैसे ही ये अपने आपको समझदार समझने लगते हैं बस तभी से इनकी रुदाली शुरू हो जाती है।  किसी का भी कोई सा अरमान कहीं पर मर जाए, शोक और दुःख इन लोगों को ही होगा।

और वह भी इतना भारी कि कई-कई दिनों और महीनों तक ये बेचारे लाचार इसे भुला नहीं पाते हैं। इन लोगों की जन्म कुण्डली में सदा रुदाली और शोका संतप्तता योग होता है। इस वजह से हमेशा मनहूसियत से भरे हुए होते हैं। यह सब कुछ इनके मलीन और कृष्णवर्णी चेहरों से अच्छी तरह भाँपा जा सकता है।

इन लोगों के लिए शोक और दुःख का कोई वाजिब कारण नहीं होता लेकिन जमाने भर की हलचलों को जानने की तीव्रतर आतुरता और जिज्ञासा तथा इन पर निरन्तर मंथन, विश्लेषण और छिद्रान्वेषण करने की बुरी लत की वजह इनका कोई सा क्षण बिना शोक, अलाप-विलाप और रुदाली के नहीं बीत पाता।

हमारे दुर्भाग्य से आजकल ऎसे मनहूस और रुदाली एक्सपर्ट लोगों की एक अजीब किस्म पाँव पसारती जा रही है जो जमाने भर में अपनी काली और घिनौनी करतूतों से सडान्ध फैला रही है और मानवी समुदाय का नाम बदनाम करती जा रही है।

आदमियों की यह किस्म भी बड़ी ही अजीब है जो कि शैशव से लेकर मृत्यु तक औरों के नाम पर रोती-बिलखती रहती है और हमेशा शोकाकुल रहा करती है।

इन लोेगों को अपने स्वभाव, व्यवहार और चरित्र से कोई मतलब नहीं रहता, न ही अपने बारे में और लोगों की धारणाओं के बारे में कभी सोचते हैं। इनका पूरा का पूरा जीवन स्वार्थ केन्दि्रत ही रहता है। अपने थोड़े से लाभ और प्रतिष्ठा के लिए औरों को किसी भी सीमा पर लांछित या प्रताड़ित कर सकने की सारी क्षमताओं से युक्त हुआ करते हैं।

यही कारण है कि चंद नुगरों, नालायकों और नौटंकीबाज लोगों की वजह से सामाजिक और रचनात्मक क्षेत्रों में जहरीला प्रदूषण फैलता जा रहा है जिसकी दूषित और घातक हवाओं ने मूल्यों, सिद्धान्तों और आदर्शों का गला घोंट कर बेरहमी से हत्या कर दी है और इसकी जगह खुदगर्जी, लुच्चाई और लफंगाई को प्रतिष्ठित करने का अभियान जोरों पर है।

समाज के लिए फोड़े-फुँसी और सोरायसिस बने हुए ये ही वे लोग हैं जो कभी अपने बारे में नहीं सोचते बल्कि रात-दिन इसी फिराक में लगे रहते हैं कि कौन क्या कर रहा है, कौन किसके साथ है, कौन क्यों कर रहा है, और कौन क्यों सफल हो रहा है।

ये लोग हर पल दूसरे लोगों के बारे में सोचते हैं, औरों के बारे में इसी सोच-विचार में रहते हैं कि उनका नुकसान कैसे किया जाए, कैसे उनकी प्रतिष्ठा हानि की जाए, किस प्रकार दूसरों को दुःखी कर तनाव दिए जाएं तथा किस प्रकार अपनी चवन्नियां चलाने के लिए औरों को नीचा दिखाया जाए।

ये लोग हर घटना और हर व्यक्ति के बारे में जानकारी पाने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के लिए इतने अधिक व्याकुल रहते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। अपने आपको परम विद्वान, हुनरमंद और लोकप्रतिष्ठ समझने वाले ये लोग अकेले कुछ कर पाने का साहस नहीं रख पाते हैं इसलिए अपनी ही तरह के हरामखोर नुगरों को साथ रखते हुए अपनी कारगुजारियां करते रहते हैं।

इन लोगों के निशाने पर वे सारे लोग हुआ करते हैं जिनसे इन्हें कोई खतरा होता है अथवा जो इन्हें स्वीकार नहीं कर पाते अथवा इन नुगरों को उपेक्षा या हेय दृष्टि से देखने की क्षमता रखा करते हैं।

जमाने भर की नकारात्मकताओं पर निगाह रखते हुए इस पर अनुसंधान करने वाले इन मलीन मन और खुराफाती दिमाग वालों के लिए इनका अपना कोई क्षण नहीं होता बल्कि इनकी जिन्दगी का हर पल औरों के बारे में चिन्तन पर ही बीतता रहता है।

समाज में जहां ऎसे लोगों का बाहुल्य है वहां नकारात्मकता की वजह से रचनात्मकता पर घातक प्रहार होना स्वाभाविक ही है। इन लोगों को उपेक्षित रखें और जहां मौका मिले वहां इन्हें हतोत्साहित करें और ठिकाने लगाने में कहीं पीछे नहीं रहें। यही आज की सबसे बड़ी समाजसेवा और राष्ट्रधर्म हैं

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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