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सीमा स्मृति की लघुकथा - सरप्राइज

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“क्‍या भाभी, कहां चले गये थे आप लोग, मैं दो दिन तक आपकी बेल बजा-बजा कर चली गई। निशा की कामवाली फूला ने कहा ।

“अरे, क्‍या बताऊं परसों मेरी भाभी का जन्‍मदिन था । अचानक बैठे-बिठाए मूड बन गया कि पटियाला जा कर उन्‍हें जन्‍मदिन की शुभकामनायें देकर, उन्‍हें सरप्राइज दिया जाए। फिर पटियाला से एक ही दिन में वापिस आने पर बहुत थकावट हो जाती है,सो वहीं रूक

गए। निशा ने कहा।

‘भाभी ये सरप्राइज क्‍या होता है’।

अचानक से कहीं जाना या कुछ भी करना । समझी मैडम। चल अब काम शुरू कर ले।

“जी अच्‍छा किया, आप की माता जी कैसी हैं ?

‘भगवान की कृपा से बिलकुल ठीक हैं। मैंने कहा।

एक सप्‍ताह बाद-

‘अरे यार,बाहर जाकर देखो कि वो फूला महारानी जी क्‍यों नहीं आई। एक तो आफिस के लिए देर हो रही है और अभी कितने काम बाकी हैं। आज आफिस से छुटी भी नहीं ले सकती हूँ और ये महारानी कि बिना बताये आई नहीं है। निशा कुलबुला रही थी और बोलती जा रही थी।

अगले दिन फूला ने डोर बेल बजाई तो निशा ने ही दरवाजा खोला। इस से पहले कि वह फूला से पूछती कि वह कल क्‍यों नहीं आई।

फूला बोली, ‘भाभी बहुत मजा आता है सरप्राइज देने में, कल मैने भी अपनी ननद के बेटे के जन्‍मदिन पर सब को सरप्राइज कर दिया। खूब मजा आया यूं लगा कोई यादगार दिन बन गया।

सीमा स्‍मृति

15.12.12

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