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- राजेन्द्र नागदेव की कविता - बच्चों! मैं आ रहा हूँ

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बच्चों! मैं आ रहा हूँ

(अमेरिका में युध्द में मारे गए सैनिकों का एक स्मारक देख कर)

 

15-12-1944

पापा, माँ, जेनी

प्यारे जस्टिन, एलिस मेरी नन्हीं परी!

बहुत दिनों बाद लिखने का वक्त़ मिला

युद्ध बारूद, रक्त, घृणा, मरी हुई और मरती हुई साँसों से भरा होता है

वहाँ पत्र के लिए जगह नहीं होती

मैं ज़ल्द आ रहा हूँ तुम्हारे पास

युध्द हो चुका है लगभग ख़त्म

 

मेरे अंदर का मेरा ही एक बिंब बताता है हर पल तुम रोज़ राह देखते हो मेरी

इस विकलता से जैसे मृत्यु से मिल कर आ रहा होऊँ

हाँ, उसे देखा है बहुत निकट से मैंने

जितनी बार देखा

तुमसे मिलने की इच्छा उतनी बलवती हुई

मेरी वर्दी बारूद से भारी है

बंदूक का वज़न कंधे से उतरा नहीं कई हफ़्ते हुए मैं उतार रहा हूँ सारी बारूद

उतार रहा हूँ कंधे से बंदूक

हल्का होकर आऊँगा परिंदे की तरह तुम्हारे पास पीछे छोड़ युध्द के सारे मैदान

 

मैं आऊँगा जल्द

प्यारी एलिस! तुम्हारे लिए लाऊँगा गुड़िया

उतरूँगा सैनिक गाड़ी से किसी गांव –कस्बे में

जहाँ गुड़ियाएं मिलती होंगी

पापा! मैं आ रहा हूँ

माँ! मैं आ रहा हूँ

जेनी! मैं आ रहा हूँ

बच्चों! आ रहा हूँ

 

समझो पहुँच ही गया बड़े दिन से पहले तुम्हारे पास

तुमने बड़े दिन के रंगीन सितारे और गुब्बारे लटका लिए होंगे अबतक

मेरी हथेलियों में बंदूक उठाते उठाते हो गए घाव

मुझे आना है घर

कुछ घावों का इलाज अस्पताल में नहीं होता

यहाँ मरते हुए सैनिक देख कर कई बार मरा हूँ

जबकि वे मरे थे मेरी ही गोलियों से

वह राष्ट्रधर्म था

 

अब लगता है कोई धर्म और भी होता होगा उससे ऊपर

मैं प्रार्थना करता हूँ उन सैनिकों के लिए जो उस तरफ हैं

वे उसी तरह लौटें अभी अपने घर जिस तरह लौटूँगा मैं

हमारा सामना फिर युध्दभूमि में होना ही है

मैं नहीं जानता तुम सबसे मिलने के बाद

कितनी गोलियाँ दाग सकूँगा दुश्मन पर

उसके चेहरे में तब कई चेहरे होंगे

मेरे बच्चों! तुम्हारे भी होंगे उनमें

चलो छोड़ो, आ रहा हूँ

 

सहेज लिये हैं कपड़े, तुम्हारे पत्र

थोड़ा-सा सामान जो एक सैनिक के पास होता है

एलिस, जस्टिन मेरे बच्चों!

क्या हो गया मुझे! यह क्या दिख रहा है!

तुम युध्द के मैदान में बच्चों के साथ खेल रहे हो

उनमे दुश्मन के भी हैं

 

मेरी गोलियाँ राख में बदल गईं बंदूक विकलांग हो गई

फिर लगा एक बार कोई धर्म राष्ट्र्धर्म से ऊपर है

जिसमे शामिल हैं पृथ्वी के तमाम बाशिंदे।

तुम्हारा. . . कार्ल विलियम

. . . . . . . . . . . . . .

तार लेकर आया है डाकघर से आदमी

आल्हाद, विषाद, आशंका- सब रंग अचानक हवा में आ गए

थरथराती उँगलियाँ खोलती हैं तार-

“24-12-1944 कार्ल विलियम आज सुबह साढे तीन बजे मोर्चे पर मारा गया” काले दिन का सन्नाटा

बड़े दिन के उजाले पर दूर तक पसर गया।

* * * * *

 

राजेन्द्र नागदेव

डी के 2- 166/18, दानिशकुंज

कोलार रोड

भोपाल- 462042

फोन 0755 2411838 मो 8989569036

ईमेल raj_nagdeve@hotmail.com

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