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दीपक आचार्य का आलेख - सुकून देने वाली हो अपनी मौजूदगी

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  हर तत्व, प्राणी और वस्तु की मौलिकता ही उसकी अन्यतम विशिष्टता है। इसी के अनुरूप गुणधर्म निर्धारित हैं। मनुष्य होने का अर्थ मानवीय गुणों और सकारात्मक गतिविधियों के प्रति समर्पण, सेवा और परोपकार, जिओ और जीने दो में विश्वास तथा लोक मंगल से लेकर विश्वोत्थान तक के समस्त रचनात्मक कार्यों में समर्पित भागीदारी है।

यही असली इंसान की पहचान है। अन्यथा बहुत सारी अनचाही भीड़ सब जगह है जो इंसान कही तो जाती है लेकिन इंसानियत का कोई कतरा देखने को नहीं मिलता।

जहाँ कहीं मनुष्य का अस्तित्व है वहाँ मानवीय मूल्यों का प्राकट्य और प्रसार स्वाभाविक है। यथार्थ में मनुष्य वही है जिसमें से मनुष्यता की गंध आए और मानवीय भावनाओं का जीवन्त दिग्दर्शन हो।

जहाँ तक गंध का संबंध है, दुनिया में हर तत्व और मिश्रण से लेकर तमाम प्राणियों की अपनी कोई न कोई अन्यतम गंध होती ही है। लेकिन मनुष्य के मामले में ऎसा नहीं होता।

मनुष्य की गंध उसके कर्म, स्वभाव, चरित्र और व्यवहार से आती है तथा इसी से उसकी मनुष्यता के प्रतिशत का निर्धारण होता है। जो इंसान मनुष्यता की कसौटी पर खरा उतरता है वही असली इंसान माना जा सकता है बाकी सारे के सारे या तो जानवरों की श्रेणी में गिने जा सकते हैं अथवा उन लोगों में जो राक्षसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें भी कुछ ऎसे हो सकते हैं जो हिंसक जानवरों और असुरों के कॉकटेल हों।

जो इंसान जितना अधिक सहज, सरल, सौम्य और मानसिक-शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है उसका आभामण्डल चमकीला, तेजस्वी तथा शुभ्र होता है और इसका घेरा भी बहुत बड़ा होता है। जो लोग इनके आस-पास आते हैं या रहा करते हैं, वे इनकी दिव्यता और तेजस्विता को अच्छी तरह महसूस करते हैं। ऎसे लोग जहाँ होते हैं वहाँ का पूरा का पूरा वातावरण उमंग, आनंद और उल्लास में बदल जाता है तथा अद्भुत मनःशांति व सुकून हर तरफ पसरा रहता है।

इन सकारात्मक वैचारिक भावभूमि वाले रचनात्मक लोगों की मौजूदगी ही अपने आप में आत्मतोष भरे सुकून का महास्रोत हुआ करती है जिसकी वजह से इनके साथ आनंद और मुग्धकारी भावों का प्रभाव हर क्षण बना रहता है। पर आजकल ऎसे लोगों की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है।

अब लोगों के भीतर से इंसानियत के भाव पलायन करते जा रहे हैं और वैयक्तिक स्वार्थों की सडान्ध इतनी अधिक हावी हो चुकी है कि इंसान केवल नाम मात्र का रह गया है, उसके भीतर से वह सब कुछ कहीं गायब हो गया है जो आदमी के रूप में पहचान बनाने के लिए सर्वोपरि आवश्यकता रहा है।

आदमियत के निरन्तर ह्रास की स्थिति ने मानवी समुदाय के बाड़ों से संवेदनशीलता और सामाजिकता की सुगंध को हर लिया है। पहले जहाँ एक ही प्रकार के बाड़ों, गलियारों और क्षेत्रों में सामूहिक विकास, सामुदायिक उत्थान और सबका साथ लेकर आगे बढ़ने की भावनाओं ने स्वर्णिम इतिहास कायम किया था, आज इसकी बजाय अपने आपको ऊँचा और प्रतिष्ठित करने, समृद्धि पाने और खुद को संप्रभु बनाने का शगल हर तरफ विकृतियों, विषमताओं और दावानल का जनक बना हुआ है।

अपने आपको इंसान कहने वाले लोग इंसान के ही दुश्मन होते जा रहे हैं, इंसान के काम आने की बजाय इंसान का काम तमाम करने लग गए हैं, अपने आस-पास वालों की छाती और कंधों पर चढ़कर अपने कद को बढ़ाने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं।

बहुत सारे भाड़े के टट्टू या कहार हैं जो पालकियों में बिठाकर इन छद्म इंसानों के कद को ऊँचा दिखा रहे हैं, इंसानी पुतलों को गधों, घोड़ों और हाथियों पर बिठा-बिठा कर आसमान की ऊँचाइयों के करीब ले जाने के सब्ज बाग दिखा रहे हैं।

मुफतिया माल खाने और पीने वाले बहुत सारे अखाड़ची उस्ताद हैं जो कि अपने कंधों पर चढ़ा-चढ़ा कर इंसानियत के लिहाज से निहायत बौने और ठिगने साबित हो चुके लोगों को जमीन से दूर कर हवाओं में उछाल रहे हैं।

हालात इतने भयावह हो चले हैं कि आदमियों की बस्ती में आदमी नहीं मिलते, इनकी जगह बिजूके दिखते हैं या फिर औरों के इशारों पर नाच-गान करने वाले और अपने आपको हर तरह से समर्पित कर नंगा नाच करने और कराने वाले कठपुतले।

इंसानी गंध हीन लोगों की वजह से अब बहुत सारे बाड़े नकारात्मकता, ईष्र्या-द्वेष, गलाकाट स्पर्धाओं और एक दूसरे को नीचा दिखाकर अपने वजूद को स्थापित करने के धाम बने हुए हैं। जहां पिछले दरवाजों को खोल कर पूरी दुनिया को अंधेरे में रख कर सब कुछ हासिल करने के तमाम गुर सिखाने और आजमाने वाले गुरु घण्टाल भी हैं और चेले-चेलियों की भरमार भी।

कुछ लोग हर जगह हैं जिनका सामाजिकता से कोई रिश्ता रहा ही नहीं। ये विघ्नसंतोषी लोग उन लोगों को भरमाने के सारे हथकण्डों में माहिर हैं जिन लोगों के लिए उच्चांकाक्षाओं की पूर्ति ही जीवन का सबसे बड़ा और अंतिम सच है। चाहे इसके लिए जो कुछ करना-करवाना पड़े।

इंसान का जीवन मानवता की भलाई, अपने क्षेत्र और कुटुम्ब के लिए समर्पण, सभी के विकास की कामना से कर्मयोग और राष्ट्रोत्थान में जुटना है न कि स्वार्थों और मामूली कामों के लिए बेवजह संघर्ष करते हुए प्रदूषण फैलाना।

आजकल स्वच्छता अभियान का जमाना है। जाने कितने पुराने और सडांध भरे कचरा पात्रों के मुँह खुल गए हैं। जगह-जगह ऎसे कूड़ादानों का वजूद सामने आ रहा है। ऎसा ही कुछ  उन लोगों के साथ हो रहा है जो इंसान के भेस में विचरण कर रहे हैं।

षड़यंत्रों और गोरखधंधों से अपने वजूद को साबित करने, अपनी पहचान बनाने और अपने अहंकारों को परिपुष्ट करने वाले बहुत सारे लोग सम सामयिक दुर्भाग्य से हमारे इर्द-गिर्द भी हैं जिनका आभामण्डल नकारात्मक और अंधकार से भरा-पूरा हैं।

ये लोग जहाँ कहीं होंगे वहाँ रोजाना कोई न कोई नकारात्मकता और अपशकुन होते ही रहते हैं क्योंकि इनकी मौजूदगी ही अंधकार और मनहूसियत लाती है। जो लोग अपशकुनी हैं उनसे यथोचित दूरी बनाए रखें, ताकि अपना कर्मयोग निरापद रह सके। अपने आपको ऎसा बनाएं कि जहाँ जाएं, रहें या आए-जाएं, वहां के लोगों को हमसे सुकून प्राप्त हो, और बार-बार वे लोग श्रद्धा, आदर एवं सम्मान दें।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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