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संजय वर्मा "दृष्टि " की नई कविताएँ

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नेत्रहीन बेटी का नेत्रदान-महादान करने हेतु भावनात्मक गीत की गुहार

(रंगों से रंगी दुनिया ) नेत्रदान -महादान

मैंने देखी ही नहीं
रंगों से रंगी दुनिया को
मेरी आँखें ही नहीं
ख्वाबों के रंग सजाने को |
*
कौन आएगा ,आँखों में समाएगा
रंगों के रूप को जब दिखायेगा
रंगों पे इठलाने वालों
डगर मुझे दिखाओ जरा
चल संकू मैं भी अपने पग से
रोशनी मुझे दिलाओं जरा
ये हकीकत है कि, क्यों दुनिया है खफा मुझसे
मैंने देखी ही नहीं ...........................
*
याद आएगा ,दिलों में समाएगा
मन के मित को पास पायेगा
आँखों से देखने वालों
नयन मुझे दिलों जरा
देख सकूं मैं भी भेदकर
इन्द्रधनुष के तीर दिलाओ जरा
ये हकीकत है कि .क्यों दुनिया है खफा मुझसे
मैंने देखी ही नहीं ..............................
*
जान जायेगा ,वो दिन आएगा
आँखों से बोल के कोई समझाएगा
रंगों से खेलने वालों
रोशनी मुझे दिलाओ जरा
देख संकू मैं भी खुशियों को
आँखों में रोशनी दे जाओ जरा
ये हकीकत है कि क्यों दुनिया है खफा मुझसे
मैंने देखी ही नहीं ................................


रंग

लहराती जुल्फों में
ढँक जाती तुम्हारे माथे की
बिंदिया
लगता हो जैसे बादलों ने
ढांक रखा हो चाँद को ।

कलाईयों में सजी चूडियाँ
अँगुलियों में अँगूठी के नग से
निकली चमक
पड़ती है मेरी आँखों में
जब तुम हाथों में सजे
कंगन को घुमाती हो ।

सुर्ख लब
कजरारी आँखों में लगे
काजल से
तुम जब मेरी और देखो
तब तुम्हें केनवास पर
उतरना चाहूँगा ।

हाथों में रची मेहंदी
रंगीन कपड़ों में लिपटे
चंदन से तन को देखता
सोचता हूँ
जितने रंग भरे तुम्हारी
खूबसूरत सी काया में
गिनता हूँ
इन रंगों को दूर से ।
अपने केनवास पर उतारना
चाहता हूँ तस्वीर
जब तुम सामने हो मेरे
पास हो मेरे ।

दूर से अधूरा पाता रंगों को
शायद उसमें प्रेम का रंग
समाहित ना हो ।


इंतजार


विरहता की टीस से
उभर जाता है प्रेम ज्वार भाटे सा
चाहत ,चकोर सी
आकर्षण दे जाती चंद्रमा को

आँगन में चांदनी की छाया
जब बादलों की ओट से
कराती पल-पल इंतजार
लगता है चंद्रमा के रुख पे
डाल रखा हो बादलों ने नकाब

सोचती हूँ
अगर तुम आ जाओ
तो लिपट जाऊ बेल की तरह
और दिखा सकूँ
प्रेम के मील पत्थर बने
ताजमहल को

विरहता में
समझ सको प्रेम का मतलब तो
इंतजार के मायनों में
तुम्हें चंद्रमा की चांदनी
और भी उजली नजर आने लगेगी
जब पास होंगे तुम मेरे

विरहता

विरहता के समय
आती है यादें
रुलाती है यादें
पुकारती है यादें
ढूंढती है नजरे
उन पलों को जो गुजर चुके
सर्द हवाओं के बादलों की तरह
खिले फूलों की खुशबुओं से
पता पूछती है तितलियाँ तेरा
रहकर उपवन को महकाती थी कभी
जब फूल  न खिलते

उदास तितलियाँ भी है
जिन्हें बहारों की विरहता
सता रही
एहसास करा रही
कैसी  टीस उठती है मन में
जब हो अकेलापन
बहारें  न हो

विरहता में आँखों
का काजल बहने लगता
तकती निगाहें ढूंढती
आहटों को जो मन के दरवाजे पर
देती थी कभी  हिचकियों से  दस्तक
जब याद आती
विरहता में  


शक्तियाँ

ओस बैठी
पत्तों में दुबककर
कुछ बूंदें दमक रही
सुंदरियों के तन पर

कुछ सजी है मोतियों की
लड़ियों की तरह
बंधे  तार पर

बूंदों की बारात देखकर
पीपल वृक्ष भी आशीर्वाद
स्वरुप न्यौछावर कर रहा फुवारें
बूंदों पर बूंदों की

बूंदों को भी भय सता  रहा
वे याद करने लगी
अपनी दो पलों की
जिंदगी को

क्योंकि अब सूरज की किरणें
सुबह से ही
तपाने  लगी वसुंधरा को
शायद ये बिगड़ते
पर्यावरण का नतीजा हो

ये बूंदें
पुनर्जन्म लेगी
फिर से आने वाले मौसम में

क्योंकि प्रकृति ने
इन्हें दे रखी है शक्तियाँ
बूंद -बूँद से सागर भरने की

 

संजय वर्मा "दृष्टि "
125 ,शहीद भगत सिंग
मार्ग मनावर जिला -धार (म प )
454446 

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