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महावीर सरन जैन का आलेख - श्री अशोक सिंघल: स्मृतियों को नमन

अशोक सिंघल - स्मृतियों को नमन

श्री अशोक सिंघल: स्मृतियों को नमन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

विश्व हिन्दू परिषद के श्री अशोक सिंघल के निधन के समाचार से मुझे हार्दिक दुख हुआ। जब मैं जबलपुर के विश्वविद्यालय में कार्यरत था तब सन् 1970 के आसपास वे जबलपुर के मेरे मित्र श्री कैलाश गुप्त के घर पधारे थे। मेरी उनसे सबसे पहली मुलाकात वहीं हुई थी। हमारी भारतीय संस्कृति और धर्म साधना के सम्बंध में विचार विमर्श भी हुआ। भारतीय संस्कृति की महान परम्परा को लेकर हम दोनों के बीच मतैक्य था मगर उसके स्वरूप को लेकर मत-भिन्नता थी।

मेरी मान्यता थी कि भारत में भाषाओं, प्रजातियों, धर्मों, सांस्कृतिक परम्पराओं एवं भौगोलिक स्थितियों का असाधारण एवं अद्वितीय वैविध्य विद्यमान है। विश्व के इस सातवें विशालतम देश को पर्वत तथा समुद्र शेष एशिया से अलग करते हैं जिससे इसकी अपनी अलग पहचान है, अविरल एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, राष्ट्र की अखंडित मानसिकता है। “अनेकता में एकता” तथा “एकता में अनेकता” की विशिष्टता के कारण भारत को विश्व में अद्वितीय सांस्कृतिक लोक माना जाता है। मगर श्री अशोक सिंघल जी की मान्यता थी कि भारत में रहनेवाले सभी लोग हिन्दू हैं। हिन्दू भारत की राष्ट्रीयता का वाहक है। मगर मैंने उनका ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तानी शब्द भारत में आए कहाँ से। इसका कारण यह है कि हमें ये शब्द मुसलमानों के भारत आगमन के पूर्व के रचित साहित्य में ढ़ूढ़े से भी नहीं मिलते। इनका प्रयोग वेदों, उपनिषदों, गीता, महाभारत, रामायण, पुराणों में नहीं हुआ है।

मैंने उनको विस्तार से स्पष्ट किया कि ईरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में “स्” ध्वनि नहीं बोली जाती थी। अवेस्ता में “स्” का उच्चारण “ह्” किया जाता था। उदाहरण के लिए संस्कृत के असुर शब्द का उच्चारण अहुर किया जाता था। मैंने यह प्रतिपादित किया कि 'हिंदी' शब्द का विकास कई चरणों में हुआ है- सिंधु→ हिन्दु→ हिन्द+ई→ हिंदी। अफ़ग़ानिस्तान के बाद की सिन्धु नदी के पार के हिन्दुस्तान के इलाके को प्राचीन फारसी साहित्य में “हिन्द” एवं “हिन्दुश” के नामों से पुकारा गया है। “हिन्द” के भूभाग की किसी भी वस्तु, भाषा तथा विचार के लिए विशेषण के रूप में “हिन्दीक” का प्रयोग होता था। हिन्दीक माने हिन्द का या हिन्द की। यही हिन्दीक शब्द अरबी से होता हुआ ग्रीक में “इंदिका” तथा “इंदिके” हो गया। ग्रीक से लैटिन में यह “इंदिया” तथा लैटिन से अंग्रेज़ी में “इंडिया” बन गया। यही कारण है कि अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में “हिन्द” में बोली जाने वाली ज़बानों के लिए “ज़बान-ए-हिन्द” लफ्ज़ मिलता है। भारत में आने के बाद मुसलमानों ने “ज़बान-ए-हिन्दी” का प्रयोग आगरा-दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली भाषा के लिए किया। “ज़बान-ए-हिन्दी” माने हिन्द में बोली जाने वाली जबान। इस इलाक़े के गैर-मुस्लिम लोग बोले जाने वाले भाषा-रूप को “भाखा” कहते थे, हिन्दी नहीं।

कबीरदास की प्रसिद्ध पंक्ति है – संस्किरित है कूप जल, भाखा बहता नीर। अफगानिस्तान की सीमा से लगने वाली सिंधु नदी के पार का इलाका हिन्द कहलाता था और उसके निवासियों को हिन्दू कहा जाता था। इस नाते देखें तब तो सिंधु नदी के इस पार के पाकिस्तान, भारत, बंगलादेश, नेपाल, श्री लंका, भूटान आदि समस्त देश हिन्द हैं, यहाँ की भाषाएँ हिन्दी हैं तथा इन देशों के निवासी हिन्दू हैं। मगर यह शब्द की व्युत्पत्ति का सत्य है। वर्तमान का सत्य नहीं है। वर्तमान का यथार्थ बोध भिन्न है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से धर्म का अर्थ है = धारण करना। जिसे धारण करना चाहिए, वह धर्म है। मैंने उनसे निवेदन किया कि शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से आपका तर्क सही है। इस दृष्टि से धर्म शब्द किसी विशेष धर्म का वाचक नहीं है। जिंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। मगर संकालिक स्तर पर शब्द का अर्थ वह होता है जो उस युग में लोक उसका अर्थ ग्रहण करता है। मैंने उनके विचारार्थ यह निरूपण किया कि वर्तमान में जब हम हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, इसाई धर्म, सिख धर्म, पारसी धर्म आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इन प्रयोगों में प्रयुक्त “धर्म” शब्द रिलीज़न का ही पर्याय है। अब हमें भारत और भारतीय संस्कृति का प्रयोग करना चाहिए। हमारे बीच मतभेद का दूसरा मुद्दा यह था कि उनकी सोच यह थी कि हमारे राष्ट्र की मूल धारा एक है और वह धारा अविरल एवं शुद्ध रूप में, प्रवाहित है।

जो धाराएँ हमारे देश में आक्रांताओं के द्वारा लाई गयीं हैं उन्होंने हमारी राष्ट्र रूपी गंगा को गंदा कर दिया है। हमें उसे निर्मल बनाना है। मेरा विचार इससे भिन्न था। मैंने यह प्रतिपादित किया कि भारतीय संस्कृति समुद्र की तरह है जिसमें अनेक धाराएँ आकर विलीन होती रही हैं। मैंने उनसे निवेदन किया कि आप जिन आगत धाराओं को गंदे नालों के रूप में देखते हैं, हम उनको इस रूप में नहीं देखते। उन समस्त धाराओं को जिन्हें आप गंदे नालों एवं ´मल' के रूप में देखते हैं उनको हम 'ऐसे मल´ की श्रेणी में नहीं रख सकते जो हमारी भाषा, धर्म, एवं संस्कृति रूपी गंगा को ´गंदा नाला' बनाते हैं। आगत धाराएँ हमारी गंगा की मूल स्रोत भागीरथी में आकर मिलने वाली अलकनंदा,धौली गंगा,अलकन्दा, पिंडर और मंदाकिनी धाराओं की श्रेणी में आती हैं।

जहाँ तक भारतीय संस्कृति के महत्व और उसकी वैश्विक दृष्टि का सवाल था, उस पर हमारा और उनके विचार में मतैक्य था। मैंने उनके समक्ष हिन्दू धर्म की परात्पर परब्रह्म की अवधारणा की व्याख्या की और उसके माध्यम से वैश्विक स्वरूप की मीमांसा की।

सन् 1992 में, मैं आगरा आ गया। वहाँ के लाजपत कुंज में अशोक सिंघल जी का अपनी बहन के आवासगृह पर जब जब आना होता था, तब तब मेरी उनसे मुलाकात होती थी। सन् 1996 में वाणी प्रकाशन से “विश्व चेतना सर्व धर्म समभाव” शीर्षक पुस्तक का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ। मुझे श्री अशोक सिंघल जी का दिनांक 15 मई, 2000 का लिखा पत्र प्राप्त हुआ जो पाठकों के अवलोकन के लिए प्रस्तुत है –

पत्र

विश्व हिन्दू परिषद

संकट मोचन आश्रम ;श्री हनुमान मंदिर

रामकृष्णपुरम, सेक्टर-6

नई दिल्ली-110022

दिनांक 15 मई 2000

आदरणीय श्री महावीर सरन जी,

सादर नमस्कार।

आपकी पुस्तक ‘विश्व चेतना तथा सर्वध्रर्म समभाव’ देखने को मिली। आपके द्वारा दी गई भारतीय दृष्टि आज के संदर्भ में और भी महत्व की हो जाती है। राष्ट्र संघ द्वारा एक सेमिनार अगस्त अंत में है वहाँ आध्यात्मिक और धर्मिक संतों को बुलाया है और निमंत्रण उनके यहाँ से आ रहे हैं। विद्वानों को उन्होंने निमंत्राण नहीं दिया है।

विश्व में शांति का आधार क्या हो सकता ? यह तो भारतीय मनीषी ही देने में समर्थ हैं। अत्यधिक स्वार्थ से प्रेरित और परस्पर भू-मण्डल पर वर्चस्व कायम करने की होड़ लगाने वाले आक्रामक मजहब स्वयं शांति भंग करने के मूल में हैं। तब इस कांफेंस से क्या निकलता है, यह देखना है। हमारे संत आग्रहपूर्वक भारतीय दृष्टि विश्व को दे, यह तो आवश्यक है ही। परिषद के कार्य में आप रुचि लें। शेष कुशल।

भवदीय

अशोक सिहंल

(डॉ. अनूप सिंह – महावीर सरन जैन: पत्रों के दर्पण में, पृष्ठ 20, प्रगति विचार और साहित्य मंच, सन् 2011)

श्री अशोक सिंघल जी के इस पत्र को पाकर मुझे अतीव प्रसन्नता हुई। मुझे प्रतीति हुई कि हमारे और उनके बीच अनेक मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद उनको मेरी विश्व चेतना तथा विश्व शांति की स्थापना में भारतीय मनीषियों के अहिंसा परमो धर्म की प्रासंगिकता की स्थापना पसंद आई। दूसरी बात मुझको यह प्रीतिकर लगी कि मुझको पत्र लिखते समय उन्होंने मेरे मत को ध्यान में रखकर “हिन्दू दृष्टि” शब्द का नहीं अपितु “भारतीय दृष्टि” शब्द का प्रयोग किया। इस नाते भी उनके इस पत्र का मेरे लिए मूल्य है। जिस महान व्यक्ति से मेरे अनेक मुद्दों पर मत भेद रहे, उनकी इस सदाशयता, उदारमनस्कता, हार्दिक विशालता, मेरे प्रति उनके मन की शुभ कामना और सौजन्य से मेरा मन भावित है और उनके आकस्मिक निधन पर मैं उनकी स्मृतियों को नमन करता हूँ।

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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