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महावीर सरन जैन की दो कविताएँ

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दो कविताएँ
       1. चिन्तन और मैं
           प्रोफेसर महावीर सरन जैन
 
जब होते हो,
मन में रह रहकर
पलने वाला कम्पन
सिगरेट धुएँ की भाँति-
सुलगता है।
जलता नहीं।
ज़ीरो बाल्ट के बल्ब की
मद्धिम रोशनी की भाँति-
कोठरी के अनेक खुरदुरे चिह्नों को,
धुँधला देता है;
ढाँक लेता है।
होलिका दहन की
तेज रोशनी की भाँति-
अतीत की परम्परा से बने
अन्तर्जगत के गह्वरों को-
कौंधाता नहीं।
मन के पट भिड़ जाते हैं।
महानगरों के पड़ौसियों की भाँति-
बन्द दरवाजे के सामने होकर
मैं,
अपने को,
कनखियों से निहार भर पाता हूँ


नयनों में चित्र नहीं बनते,
कानों में राग नहीं बजते,
जड़ता, मरघट सी शान्ति,
अजीब, निगूढ़, काले वलयों में-
भावों की रेखायें आबद्ध हो जाती हैं।


इन्द्रियेत्तर बोध के मोह में,
बर्फीली श्वेतता की आभा में,
अहसास होता है -
मेरा ‘मैं’ जीने लगा है।
इन्द्रियों की शिथिलता,
अन्तर की निष्क्रियता,
जड़ता की योगिनी,
लगता है -
मूलाधार पर कुंडली मारी हुई प्रज्ञा
फन उठा रही है।
चिन्तन का स्फीत्कार साँप
अन्न से आनन्द की ओर
दौड़ रहा है।
अब,
सब,
निःशेष हो गया है।
निर्मल,
असीम,
मेरा ‘मैं’ बचा है।


घुमड़ता नीलापन,
लालिमा सा पगलाकर,

फैलता चला जाता है
दिग-दिगन्त।
मेरे ‘मैं’ में-
असीम के कण कण,
प्रकाशित से होते लगते हैं।


मगर,
उसी मैं
सबके सब
तिरोहित से हो जाते हैं।


 
2.             संवेदना और मैं
                 

 
बुद्धि की राख के
हटते ही-
स्वप्निल पंखो के यान,
सहज,
सचेष्ट,
सजग हो उठते हैं।


मेरा ‘मैं’-
दब जाता है।
अन्य बहुत से ‘मैं’
जो कभी मेरे ‘मैं’ पर
साधिकार छाए थे
आत्मीय भाव से,
उभरने लगते हैं।


चित्रलिपि,
धीमे-धीमे,
चोंच खोलती है।
अनुभूति की यादों का दबाव
बढ़ने लगता है।
ओस की बूँदें
थरथराती सी हैं।


फूलों को चूमने
तितलियाँ,
ललचाती सी हैं।
कामनाएँ
तरल होने लगती हैं।
उन्मादिनी सी हवा,
थिरकने लगती है।
मन-सूर्य की-
प्रखर प्रज्जवलता
बन्द शत दल को
बिखेर-बिखेर देती है।


अबाध्य,
मधु स्मृतियों का पीड़न।
तर्कों की तख्ती के नीचे,
सिसकता जीवन।
अस्तित्व के सागर में,
कराहती लहरें।
सब घेर लेती हैं।
सब लील जाती हैं।
कोलाहल के वात्याचक्रों से
जड़ता मिट जाती है।
रिक्तता भर जाती है।


व्यष्टि,
समष्टि,
‘मैं’ और ‘तू’
सारे भेद मिट जाते हैं।


दौड़ में,
गति में,
सक्रियता में,
‘मैं’-
स्मृतियों के रथ में-
घूमने वाला,
एक पहिया मात्र होता हूँ।

--

प्रोफेसर महावीर सरन जैन, सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

Professor Mahavir Saran Jain                                 
( Retired Director, Central Institute Of Hindi )
Address:
India:  Address:   Sushila Kunj, 123, Hari Enclave, Chandpur Road, Buland Shahr-203001, India.         
                       Mobile: 09456440756 / 08938840864 / 07409562277
USA :  Address: 855 De Anza Court, Milpitas CA 95035 - 4504
Email:     mahavirsaranjain@gmail.com

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