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प्रदीप कुमार साह की कहानी - अविवेक

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सम्बंधित प्राधिकार द्वारा सरकारी सेवा में नियुक्ति प्राप्त करने हेतु रोहित से उसका किसी सक्षम पदाधिकारी,जिसकी न्यूनतम अर्हता कार्यपालक दंडाधिकारी से कम न हो द्वारा निर्गत चरित्र प्रमाण पत्र समर्पित करने कहा गया. प्राधिकार के समक्ष उक्त प्रमाण पत्र समर्पित करने हेतु शेष अवधि कम दिनों की थी. किन्तु उक्त प्रमाण पत्र प्राप्ति निमित्त आवेदन प्रक्रिया के सम्बंध में उसे (रोहित को) पर्याप्त ज्ञान न था. इस वजह से उसका चिंतित होना स्वाभाविक था. उस संबंध में उसने अपने मित्र मोहित से बात की. उसकी बातें सुनकर मोहित ठँठाकर हँस पड़ा,"अरे यार, इतनी सी बात के लिए इतना परेशान !"

रोहित बड़े मासूमियत से मोहित का मुँह तकने लगा. अल्प ज्ञानी जिस तरह अविवेक पूर्वक स्वयं को बड़ा(ज्ञानी) प्रदर्शित करने हेतु सदैव उद्यत रहता है अथवा वृक्ष का फल रहित डाली जिस तरह हमेशा उतंग रहता है, ठीक उसी तरह मोहित दंभ से सीना तानकर रोहित से उक्त प्रमाण पत्र प्राप्ति हेतु आवेदन प्रक्रिया का अपना अल्प ज्ञान बढ़ा-चढ़ाकर बखान करने लगा. तदुपरांत अपने प्रमाण पत्र का छायाप्रति रोहित को पकड़ा कर बोला कि उस प्रारूप के अनुरूप अपना प्रमाण पत्र टन्कित (टाइप)करवाकर आवेदन पत्र में संलग्न कर दे.

मोहित के सलाह और मदद पाकर रोहित मन ही मन बहुत खुश हुआ, मानो उसने अपना प्रमाण पत्र अभी प्राप्त कर लिये. कहते हैं न कि वर्षा के मौसम में अल्प जल राशि पाकर ही नाले और क्षुद्र नदी अपनी सीमाएँ लांघने लगती है, उसी तरह अविवेकी मनुष्य अल्प ज्ञान पाकर ही संतुष्ट और मदमस्त हो जाते हैं. यदि आंशिक सफलता भी मिल जाये तो फिर क्या कहने? आवेदन प्रक्रिया के पहले चरण (स्टेप) में मोहित के कहे अनुसार सफलता पाकर वही स्थिति रोहित के हुए.

उस दिन अनुमण्डल दफ्तर के कार्यावधि के प्रथम पाली (फस्ट ऑवर)में रोहित सक्षम पदाधिकारी के पास अपना आवेदन करने पहुँचा. यहाँ आकर उसने अनुमण्डल कार्यालय के चक्कर लगाये. किंतु उसे कुछ भी समझ में न आया. इस समय वहाँ भीड़-भार न बराबर थी, किन्तु वह जिसे कुछ पूछना चाहता वह स्वयं ही काफी व्यस्त होता. थक-हार कर रोहित एक स्टाम्प वेंडर के पास आकर रुका. स्टाम्प वेंडर एक नजर उसे प्रश्नात्मक निगाह से देखा किंतु पुन: अपने व्यवसाय में व्यस्त हो गया. तब उसने ही वेंडर से पूछा," भाई साहब, एस.डी.एम.साहब के इजलास कहाँ है?"

"क्यों? क्या काम है?" वेंडर प्रतिप्रश्न किया.

"मुझे चरित्र प्रमाण पत्र हेतु आवेदन करने हैँ." रोहित वेंडर से बताया.

वेंडर अपने दुकान पर कागजात खरीदते एक अधिवक्ता के तरफ इशारा करते हुए रोहित से कहा,"इनसे मिलो,सर तुम्हें सब कुछ बता देंगे."

रोहित से इतना बताकर वेंडर अपने काम में व्यस्त हो गया. रोहित उस अधिवक्ता से अपने कागजात दिखाने लगा. सब कुछ देखने के बाद अधिवक्ता बोले,"आपको चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्ति हेतु साहब (कार्यपालक दण्डाधिकारी)के नाम एक आवेदन पत्र भी लिखने होंगे जिसके साथ इन पेपर को संलग्न करना है. इसके साथ ही अपना एक चरित्र प्रमाण पत्र भी टन्कित करवा कर आवेदन पत्र के साथ संलग्न करना होगा."

बगल के टेबल के तरफ इशारा करते हुए अधिवक्ता पुन: बोले,"अपना प्रमाण पत्र उस टाइपिस्ट से टंकित करवा सकते हो. आवेदन पत्र स्वयं लिखेंगे या मुझसे लिखवाना चाहेंगे?"

अधिवक्ता साहब के प्रश्न सुनकर रोहित ऐसा भाव-भंगिमा बनाया मानो वह अधिवक्ता से आवेदन पत्र लिखवाने की अपेक्षा रखता हो, किन्तु कहने में संकोच हो रहा. यद्यपि रोहित शब्दों में कुछ बोला नहीं तथापि अधिवक्ता वैसा ही समझ रोहित के आवेदन पत्र लिख दीये. आवेदन पत्र लेकर रोहित जाने लगा तो अधिवक्ता बोले,"मुझे सुबह के सगुण हेतु दस रुपये तो देते जाओ."

"किस बात के पैसे?" रोहित पलटकर पूछा.

"तुम्हारे आवेदन पत्र लिख दिये न?" अधिवक्ता थोड़े हैरान होकर बोले.

"मैं आपको आवेदन पत्र लिखने थोड़े न बोला था. वह तो मैं स्वयं ही लिखता पर बीच में बिना कुछ कहे आपने ही लिख दिये...." रोहित तमक कर बोला.

"मैं तुमसे अपना फ़ीस थोड़े न मांग रहा हूँ. मैं तो बस सुबह के सगुण हेतु दस रूपये कह रहा हूँ. तुम्हारी जो स्वयं की इच्छा हो उतना ही सगुण कर दो." अधिवक्ता सकुचाते हुये बोला. किन्तु रोहित इतने पर भी कुछ भी देने तैयार न हुआ. अंतत: अधिवक्ता निराश होकर रोहित से कहा:"वेंडर के ब्लैंक पेपर के पैसे तो उसे दे दो."

रोहित वेंडर को ब्लैंक पेपर के दो रूपये दे दिये और अधिवक्ता वहाँ से यूँही चले गये. रोहित के वैसे व्यवहार वहाँ मौजूद किसी भी व्यक्ति को सही प्रतीत न हुआ, किन्तु रोहित को इन सब से क्या लेना-देना था. अब रोहित टाइपिस्ट के पास आया और उससे अपना चरित्र प्रमाण पत्र टाइप कर देने बोला. टाइपिस्ट पूछा,"क्या टाइप करने हैं, टाइपिंग मैटर लिखकर लाये हैं?"

रोहित अपने बैग से मोहित के दिये हुए चरित्र प्रमाण पत्र की छायाप्रति निकालकर नये प्रमाण पत्र में नाम-पता बदलने हेतु टाइपिस्ट को समझाने लगा. सबकुछ सुनने और वह प्रारूप देखने के बाद टाइपिस्ट रोहित से बताया कि वह प्रारूप अधूरी है और वैसे प्रारूप यहाँ चलन में नहीं है. उसने रोहित को किसी उचित जानकर से प्रमाण पत्र लिखवाकर लाने की सलाह दी.किन्तु रोहित उसके सलाह नजर अंदाज कर दिये. फिर टाइपिस्ट रोहित के बिलकुल कहे अनुसार ही प्रमाण पत्र टाइप कर दीये.

अब रोहित के पास चरित्र प्रमाण पत्र निर्गत करवाने हेतु आवेदन पत्र में पर्याप्त संलग्नक कागजात थे. अपना आवेदन पत्र जमा देने हेतु वह कतार में खड़ा हो गया. काफी देर बाद जब आवेदन जमा करने की उसकी बारी आई तो आवेदन जमा लेने वाले कर्मचारी उसके आवेदन पत्र में बिना कार्बन कापी के चरित्र प्रमाण पत्र पाये. इस वजह से उसने आवेदन पत्र जमा लेने से मना करते हुए कहा कि वह दुबारा से आवेदन पत्र कार्बन कापी युक्त चरित्र प्रमाण पत्र के साथ जमा करे.

रोहित भागा-भागा टाइपिस्ट के पास वापस आया और दुबारा अपना कार्बन कॉपी युक्त चरित्र प्रमाण पत्र टाइप कर देने कहा. किन्तु अभी टाइपिस्ट के पास काम ज्यादा था, इसलिए वह तुरंत टाइप करने में अपनी असमर्थता जताई. यद्यपि रोहित के बार-बार अनुरोध करने पर उसने समय निकाल कर उसके प्रमाण पत्र दुबारा टाइप कर दीये. वह अपना आवेदन जमा करने गया तो वहाँ उसे दुबारा कतार में खड़ा होना पड़ा. खैर इस बार कर्मचारी ने उसके आवेदन पत्र जमा ले लीये और स-हिदायत उसे साहब के सामने हाजिर रहने के नियत समय बता दिये.

रोहित वहीं रुककर अपने नाम के पुकार का इंतजार करने लगा. नियत समय पर एक-एक कर नाम पुकार होने लगा. जब रोहित के नाम का पुकार हुआ तो वह साहब के सामने उपस्थित हुआ. साहब उसके आवेदन का निरीक्षण करने लगे. किन्तु आवेदन में संलग्न चरित्र प्रमाण पत्र आधे-अधूरे और गलत प्रारूप में अंकित पाकर उसे ख़ारिज कर दिये.

आवेदन खारिज होने से रोहित बहुत परेशान हुआ. बाहर आकर वह कर्मचारी से अपनी मजबूरी बताते हुए अपना प्रमाण पत्र निर्गत करवाने हेतु उनके सख्ती से मना करने के बावजूद सिफारिश करने का बारंबार आग्रह करने लगा. अंततः कर्मचारी ही उसे समझाने में सफल हुये कि उसे सही प्रारूप में ही प्रमाण पत्र संलग्न करने होंगे तभी प्रमाण पत्र निर्गत हो सकेगा.

अब रोहित फिर से टाइपिस्ट के पास आया. उसके रुआँसा सूरत देखकर इस बार तो टाइपिस्ट भी चौंक गया कि अब क्या हुआ. रोहित उसे सब कुछ बताकर एक बार फिर अपना चरित्र प्रमाण पत्र जल्दी में सही प्रारुपानुसार टाइप कर देने का आग्रह किया. टाइपिस्ट को उसके अवस्था पर तरस आ रहा था. किन्तु उसके पूर्व कृत्य को समझते हुए जी कड़ा कर बोला,"उसके लिये तो अपना प्रमाण पत्र किसी जानकर से लिखवाकर लाना होगा, मैं तो केवल लिखी हुई बातें ही टाइप कर सकता हूँ."

टाइपिस्ट की बातें सुनकर रोहित के घिग्घी बन्ध गए. कचहरी का कार्यावधि घँटे भर में समाप्त होने वाला था,और कोई भी अधिवक्ता अव्यस्त नजर नहीं आ रहे थे. उसकी बेसुध सी हालत देखकर अंततः टाइपिस्ट को ही दया आई. उसने रोहित से कहा,"यदि तुम कहो तो मैं अपने अल्प ज्ञानानुसार तुम्हारा प्रमाण पत्र टाइप कर दूँ, पर आगे मेरी कोई जिम्मेवारी न होगी."

रोहित के पास अन्य उपाय न थे. उसने टाइपिस्ट से उन्हीं के शर्त पर अपना प्रमाण पत्र टाइप कर देने का आग्रह किया. टाइपिस्ट उसके प्रमाण पत्र टाइप कर दिये. अब रोहित फिर से अपना आवेदन जमा करने गया. उन्हीं कर्मचारी ने रोहित के आवेदन का निरीक्षण किया. इस बार सब कुछ सही था, किन्तु तब तक उस दिन के कचहरी का कार्यावधि समाप्त हो चूका था.इसलिए उससे अपना आवेदन दूसरे दिन आकर जमा देने कहा गया. रोहित बोझिल कदम से वापस लौट गया.

वह बेहद मुश्किल में फंस गया. आज किसी भी तरह उसके चरित्र प्रमाण पत्र निर्गत हो नहीं सकता था और उधर प्राधिकार के समक्ष प्रमाण पत्र समर्पित करने हेतु मात्र दो दिन की अवधि शेष बची थी. तब तक कचहरी से काफी भीड़ छँट चूका था. टाइपिस्ट भी राहत से बचे हुए काम निपटा रहा था. तभी उसकी नजर रोहित पर पड़ा तो उसने आवाज देकर उसे पास बुलाकर उसके आवेदन के सम्बंध में पूछा. रोहित उसे सब कुछ बताते-बताते रो पड़ा. टाइपिस्ट उसके अविवेक पर अफ़सोस जताया और उसे ढाढ़स भी बंधाया. टाइपिस्ट बोला,"किसी व्यक्ति के पास बहुत सी बातों की जानकारी हो सकती है, किन्तु समुचित जानकारी तभी आ सकता है जब उस कार्य में व्यक्ति पूर्णतया मशरूफ हो जाते हैं. वैसे ही व्यक्ति के प्रैक्टिकल नॉलेज होते हैं और वही ज्ञान समय पर स्वयं और दूसरों के काम आते है. इस बात का स्मरण प्रत्येक व्यक्ति को विवेक पूर्वक रखनी चाहिये."

थोडा ठहर कर टाइपिस्ट पुन: बोला,"वास्तव में विवेक ही मनुष्य के सच्चे मित्र हैं. तुम्हारे पास अब भी दो दिन के वक्त हैं और कहा गया है कि मनुष्य को अंतत: आशा और हिम्मत का त्याग नहीं करना चाहिये." टाइपिस्ट की बातों से अब रोहित को प्रेरणा मिल चूका था.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन. तत्काल लेखक के अन्यान्य कहानी गूगल स्टोर>मात्रु भारती>हिंदी>प्रदीप कुमार साह पर पढ़ सकते है.)

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