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उमेश चन्द्र का आलेख - 'हिन्दी बाल कविताओं में राष्ट्रीय चेतना'

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हिन्दी साहित्य का क्षेत्र विस्तृत और विविधता लिए हुए है। बाल साहित्य पंचतंत्र, हितोपदेश, कथासरितसागर आदि अपनी श्रेष्ठता के कारण आज भी महत्त्वपूर्ण स्थान बनाए हुए है। दादी-नानी की कहानियों से बाल साहित्य की शुरुआत हुई। भारतेन्दु युग ने इस साहित्य को समृद्ध किया, फिर बाद के दशकों में इसमें निरंतर जागरूकता और गंभीरता आती गई। बच्चे देश के भावी कर्णधार हैं। बच्चों का वर्तमान के साथ-साथ उसका भावी जीवन भी बहुत महत्त्व रखता है। उसे अपने को हर स्थिति में मज़बूत रखना है, सुदृढ़ रखना है। ऐसी स्थिति में बाल-साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो जाती है। उसका दायित्त्व और भी बढ़ जाता है। बच्चों के लिए लिखना आसान नहीं है। बाल साहित्य रचना एक कला है। बीसवीं सदी के महत्त्वपूर्ण और बालपत्रिका 'बालसखा' के संपादक लल्ली प्रसाद पांडेय का कहना है- ''बाल साहित्य वही लिख सकता है जो अपने को बच्चों जैसा बना ले। बड़े होकर बच्चा बनना मुश्किल है और उससे भी मुश्किल है बच्चा बनकर उसके अनुकूल लिखना।''1

बाल साहित्य में मनोरंजन भी अहम कड़ी है। बाल साहित्य को लेकर विभिन्न विद्वानों ने अपने मत प्रस्तुत किए हैं। बाल साहित्य के पुरोधा निरंकारदेव 'सेवक' के अनुसार- ''जिस साहित्य में बच्चों का मनोरंजन हो सके, जिसमें वे रस ले सकें और जिसके द्वारा वह अपनी भावनाओं एवं कल्पनाओं का विकास कर सकें, वह बाल साहित्य है।''2 बाल रचनाओं में बच्चों में सहजता, सरलता, सज्जनता, सहनशीलता, सहिष्णुता, दयालुता तथा परोपकार आदि उदात्त भावनाओं का बीजारोपण करे, उन्हें अन्याय, अनीति, अनाचार, हिंसा तथा ईर्ष्या-द्वेष आदि कुत्सित भावनाओं से विरत करे, उनके कौतूहल का तार्किक शमन करे, उनका ज्ञानवर्द्धन करे, उनकी कल्पनाशक्ति का विकास करे, उन्हें आशावादी बनाए, उनमें आत्मसम्मान, आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता की भावना का संचार करे तथा अपने परिवेश के प्रति जागरूक, जिम्मेदार एवं संवेदनशील बनाए। लल्ली प्रसाद पांडेय ने 'बालसखा' पत्रिका के जनवरी 1917 के अंक में लिखा था- ''बाल साहित्य का उद्देश्य है बालक, बालिकाओं में रुचि लाना, उनमें उच्च भावनाओं को भरना और दुर्गणों को निकाल कर बाहर करना, उनका जीवन सुखमय बनाना और उनमें हर तरह का सुधार करना।''3 कविता के रूप में घटनाओं या पात्रों के माध्यम से कही गई वही बातें बच्चों को भाती हैं तथा बलमन पर सीधा असर करती हैं। महान कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं- ''बालक तो स्वयं एक काव्य है, स्वयं ही साहित्य है।''4

वीर शिवाजी को इनकी माताजी द्वारा सुनाई गई वीर रस की कहानियों ने ही इतना वीर योद्धा बनाया। वे राष्ट्रभक्ति की कविताएं, गीत पढ़कर, कितने युवा देश के लिए शहीद हो गये। प्रभावकारी साहित्य को पढ़कर बालक, भावी जीवन जीने की कला, युक्ति, अनुभव ग्रहण करता है। हिन्दी बाल काव्य में राष्ट्रीय चेतना के भावों की सबल एवं समृद्ध स्वरों में अभिव्यक्ति हुई है। पन्द्रह अगस्त का दिन-स्वाधीनता दिवस, आजादी का पर्व, राष्ट्रीय दिवस के रूप में स्वतंत्रता का स्वागत करता, बलिदानों का पुण्य स्मरण करता, शहीदों को नमन करता, सेना, सैनिक के प्रति मातृभूमि की रक्षा का उत्तरदायित्त्व पूर्ण यशोगान करता, आजादी को सुरक्षित रखते हुए संकल्प करता एवं सर्वस्व न्योछावर करने की भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त हुआ है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ 'भारत अपना' की भावनाएं बलवती हुई है। डॉ. श्रीप्रसाद के शब्दों में-

''भारत अपना देश, देश की माटी कितनी प्यारी।

भारत बने महान, कामना रहती यही हमारी।''5

भारत देश महान बना और बना रहेगा, उसकी पृष्ठभूमि में वीरों का उत्सर्ग है। डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने अपनी लेखनी में 'वीरों का देश-भारत कहा है-

''वीरों का है देश हमारा

जय-जय भारत देश हमारा।''6

डॉ. विनोदचंद्र पाण्डेय भारत की रक्षा करने वाले वीर सेनानी को पूरा सम्मान प्रदान करते हैं-

''सुंदर स्वर्ग समान देश यह, भारतवर्ष हमारा।

इसकी रक्षा सदा करेंगे, हम बच्चे सैनानी।''7

नेहा वैद देश को सर्वोपरि और वंदनीय मानती हैं। वह बच्चों में जोश भरती है और उनके साहस की सराहना करती हैं-

''विजय-पताका लेकर बढ़ते

पाँव न पीछे इनके पड़ते।

सोया साहस रोज जगाते,

साथ सत्य का सदा निभाते।

राह स्वयं पर्वत ने खोली,

यह नन्हे वीरों की टोली।''8

राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओत-प्रोत बाल कविताओं के माध्यम से बालसाहित्यकारों ने बच्चों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया है। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी झरने, पहाड़ियों के दर्शन कराते हुए देश भावना को दिखते हैं-

''झरने अनेक झरते, जिसकी पहाड़ियों में

चिड़िया चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयाँ घनी हैं, कोयल पुकारती है,

बहती मलय पवन है, तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी

वह कर्मभूमि मेरी

वह जन्मभूमि मेरी

वह मातृभूमि मेरी।''9

डॉ. मित्रेशकुमार गुप्त देशप्रेम की अभिव्यक्ति के लिए माटी का कर्ज चुकाने के हेतु धरती माँ के चरणों में अपना सब कुछ अपर्ण कर देने, मातृभूमि पर मर मिट जाना आदि भावनाएँ शब्दों के माध्यम से प्रकट करते हैं-

''हमको अपना देश मनोरम,

प्राणों से भी प्यारा है।

तन मन धन न्योछावर कर दें,

यह कर्त्तव्य हमारा है।''10

प्रभाष मिश्र 'प्रियभाष' देशभक्ति को नित्य कर्म मानते हैं और देश हित में प्राण त्याग करने की भावना को प्रबल करते। वह लिखते हैं-

''रहें प्रयास नित्य-प्रति जिनसे

भारत बने महान।

अंतिम अभिलाषा यह मेरी,

तजूँ देश-हित प्राण।''11

हमारे भारत के जवान सरहद पर देश की रक्षा जाग-जागकर और अपने प्राण न्योछावर करके करते हैं और हम अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं। हम भारतीय जो काम एक बार ठान लेते हैं वह करके ही दम लेते हैं। राजनारायण चौधरी 'नमन तुम्हें शत बार' में लिखते हैं-

''तुम स्वदेश के वीर सिपाही

स्वतंत्रता के रक्षक।

हँस-हँस करते न्योछावर

अपना अमूल्य जीवन तक।

देशभक्ति के सिवा कहाँ कुछ

तुमको सूझा करता ?

शत्रु तुम्हारे सम्मुख आने

से हरदम है डरता।''12

बालक देश की आधारशिला हैं। इनकी सुचित शिक्षा, संवेगिक व बौद्धिक विकास पर ही देश का विकास संभव है। प्रारंभ से ही इन्हें राष्ट्रीय, जनतांत्रिक मूल्य आधारित शिक्षा देने की भी आवश्कता पड़ती है जिससे एक जागरूक नागरिक के रूप में इनका उत्तरोत्तर विकास हो। आज बालसाहित्यकारों ने आनी बाल कविताओं के माध्यम से बच्चों में राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया है। देशबन्धु शाहजहाँपुरी की बाल कविताओं में राष्ट्रीय चेतना उभर कर आई है। वे लिखते हैं-

''पन्द्रह अगस्त आया है फिर से,

लेकर खुशियों का उपहार।

बलिदानों के गीतों से अब,

गूँज उठे ये गगन अपार।''13

अपनी कविता 'मेरा देश है सोना-चाँदी' में प्रमोद लायटू ने भारत की सोने-चाँदी से तुलना करते हुए भारत को शांति-अहिंसा वाला देश कहा है-

''मेरा देश है सोना-चाँदी, मेरा देश है हीरा,

यहीं जन्मते गौतम-गाँधी, यहीं जन्मती मीरा।

रामकृष्ण की पावन भूमि, लक्ष्मीबाई का यह देश,

शांति अहिंसा प्रेमभाव का, सदा दिया सार्थक संदेश।

ईद, दिवाली, होली मनती, बजते ढोल-मजीरा।।''14

देश की एकता-अखण्डता को बाल साहित्यकारों अपनी कविताओं में बड़े ही सुन्दर ढंग से पिरोया है। डॉ. रोहिताश्व आस्थाना ने 'बालवाणी' के नवीन अंक में अपनी 'झंडा' कविता में झंडा का यशोगान किया है-

''हम बच्चों के स्वर में हरदम,

जन-गण-मन है गाता झंडा।

अपने वीर शहीदों की है,

हमको याद दिलाता झंडा।।''15

रमेश चन्द्र पन्त अपनी बाल कविता 'तिरंगा कभी न झुकने देंगे' में भारत को हमेशा आगे बढ़ते रहे देखना चाहते हैं। वे बच्चों से कहलवाते हैं-

''भारत के उत्थान-प्रगति का,

रथ न रुकने देंगे।

खाते हैं हम शपथ तिरंगा,

कभी न झुकने देंगे।''16

हमारा भारत देश संतों का देश रहा है। यहाँ पर देवता भी जन्म लेने के लिए तरसते हैं। 'बाल भारती' मासिक पत्रिका के जनवरी 2015 के अंक में प्रशान्त अग्निहोत्री कहते हैं-

''गंगा यमुना ज्यों मणिमाला,

हरियाली की नवल दुशाला।

ओढ़े अपनी भारत माता,

जन्म यहाँ ले स्वयं विधाता।

भक्त, संत, कवि करते रहते,

इसकी सुषमा का गुणगान।

देश हमारा बहुत महान।।''17

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' अपने कविता संकलन 'यदि ऐसा हो जाए' में अपनी कविता 'हिंदुस्तान हमारा देश' में देश को दुलारा कहते हैं और देश को ताज कहते हुए बच्चों को इसका पहरेदार बतलाते हैं-

''प्यारा देश, दुलारा देश,

हिंदुस्तान हमारा देश।

हमें देश पर नाज है,

देश हमारा ताज है।

हमें देश पर गर्व अपार,

हम सब इसके पहरेदार।''18

विमला जोशी 'विभा' राष्ट्रीय पर्व को मिलजुल कर मनाने का आह्वान करती हैं। वे लिखती हैं-

''आओं साथियो मिलजुल कर,

हम आजादी का पर्व मनाएँ।

तीन रंग का झंडा प्यारा,

आज खुशी से हम फहराएँ।''19

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि बालक की मनोदशा, उसकी आजादी, उसकी किलकारी, उसके सपने, उसकी हलचलें सब बाल साहित्य की मूल्यवान पूँजी है। बाल साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है। बच्चों को एक ठोस धरती मिले, उड़ान भरने के लिए स्वच्छंद आकाश मिले, धूप भी छांव-सी लगने लगे, फूलों के साथ कांटे भी सुहाने लगे, ऐसा जो बाल साहित्य करता है वह शाश्वत रचना हो जाती है। हम सभी का कर्त्तव्य है कि जो देश पर न्योछावर हुए हैं, उनको प्रणाम करें तथा देश को प्रगति के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाते हुए देश की सुरक्षा के भाव को सर्वोपरि जीवनमूल्य मानें।

संदर्भ ग्रन्थ

1- अखिलेश श्रीवास्तव चमन, ऐसा हो बच्चों का साहित्य, संपादक-फ़रहत परव़ीन, आजकल पत्रिका, नवंबर 2014, प्रकाशन विभाग, सूचना भवन, नई दिल्ली, पृष्ठ 12

2- वही, पृष्ठ 12

3- वही, पृष्ठ 12

4- वही, पृष्ठ 15

5- हिन्दी बालकाव्य में राष्ट्रीयता की भावना, डॉ. रमेश मयंक, बालवाटिका मासिक पत्रिका, अगस्त 2012, पृष्ठ 16

6- वही, पृष्ठ 16

7- वही, पृष्ठ 16

8- नेहा वैद, बोल रही जन-गण की बोली, बालवाटिका मासिक पत्रिका, अगस्त 2012, पृष्ठ 15

9- धरोहर कविताएं- सोहनलाल द्विवेदी, प्रस्तुति कृष्ण शलभ, बालवाटिका मासिक पत्रिका, अप्रैल 2013, पृष्ठ 36

10- डॉ. मित्रेशकुमार गुप्त, वीर बालक, बालवाटिका मासिक पत्रिका, अप्रैल 2012, पृष्ठ 12

11- प्रभाष मिश्र 'प्रियभाष', अभिलाषा, बालवाटिका मासिक पत्रिका, अप्रैल 2012, पृष्ठ 36

12- राजनारायण चौधरी, नमन तुम्हें शत बार, बालवाटिका मासिक पत्रिका, अप्रैल 2012, पृ. 42

13- डॉ. देशबन्धु शाहजहाँपुरी, बाल कविता-'पन्द्रह अगस्त', बालवाटिका मासिक पत्रिका, स्वातंत्र्य चेतना अंक, अगस्त 2015, नंदभवन कावाँखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा (राज.), पृ. सं. 14

14- प्रमोद लायटू, बालवाणी मासिक पत्रिका, जुलाई-अगस्त 2015, संपा. अनिल मिश्र, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, हिन्दी भवन, महात्मा गाँधी मार्ग, लखनऊ, पृष्ठ 02

15- वही, पृ. सं. 46

16- रमेश चन्द्र पंत, बाल कविता- 'तिरंगा कभी न झुकने देंगे', बालवाटिका मासिक पत्रिका, स्वातंत्र्य चेतना अंक, अगस्त 2015, नंदभवन कावाँखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा (राज.), पृ. सं. 20

17- प्रशांत अग्निहोत्री, देश हमारा बहुत महान, बाल भारती मासिक पत्रिका, संपा. आभा गौड़, जनवरी 2015, सूचना भवन, लोधी रोड, नई दिल्ली, पृष्ठ 25

18- डॉ. नागेश पांडेय 'संजय', 'हिंदुस्तान हमारा देश' कविता 'यदि ऐसा हो जाए' संकलन में संकलित कविता।

19- विमला जोशी 'विभा', बाल कविता- 'आजादी का पर्व', बालवाटिका मासिक पत्रिका, स्वातंत्र्य चेतना अंक, अगस्त 2015, नंदभवन कावाँखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा (राज.), पृ. सं. 23

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उमेश चन्द्र सिरसवारी

संपर्क- उमेशचन्द्र सिरसवारी

पिता- श्री प्रेमपाल सिंह पाल

ग्रा. आटा, पो. मौलागढ़, तह. चन्दौसी, जि. सम्भल

उ.प्र.- 244412

शोधार्थी, हिन्दी-विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़

ईमेल- umeshchandra.261@gmail.com

09720899620, 08171510093

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