रविवार, 1 नवंबर 2015

मुकुल कुमारी अमलास की कविता - मुझे इसी क्षण में जीने दो

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मुझे इसी क्षण में जीने दो

डाल डाल पर फूल खिल रहे
कण कण मृदु पराग झड़ रहे
शेफालिका के पुष्प सदृश ही
धरती पर मुझे बिखड़ने दो  

वनस्पतिहीन है वंजर धरती
घनघोर प्रलय की  बेला में
अमृतकोश में संचित घट सा
बूँद बूँद  मुझे टपकने दो ।

मौजें उंची घुप्प अँधेरा
अमावश की तूफानी बेला
दिशाहीन,दिगभ्रमित नाव सा
सागर में आज भटकने दो ।

पर्वत  पिछे दूरस्थ गाँव में
नीरव और एकांत ताल में
सुबह सुबह जब कोयल बोले
नीलकमल सा खिल जाने दो ।

नील गगन में मेघ तीर रहे
चारो ओर घनघोर घटा है
बूंद बूंद पिघल बादल सा
धरती पर आज बरसाने दो ।

बड़ा सुनहरा भाल गगन का
बड़ी प्रीतिकर प्रात की  बेला
प्रकृति है सुंदर जीवन है छोटा
मुझे इसको दृग में भरने दो |

शुभ्र सफेद बादल उड़ रहे
जैसे नीले जल में हंस तीर रहे
सफेद कपोत के जोड़े सा
मुझे नील गगन में उड़ने दो ।

माँ के लहू से सिंचित होकर
जैसे गर्भ में पलता जीवन
लगकर वक्ष से अपनी माँ के
मुझे अमिय रस पीने दो  ।

कण कण अणु अणु में स्थित
जो कर्णधार जीवन का है
उस परमपिता निराकार तक
बिन बाधा आज पहुंचने दो ।

झिर झिर कर हवा चल रही
कृष्णकमल की गंध उड़ रही
सबकुछ है इस पल में समाया
इस पल को खुद में समोने दो ।

मुझे इसी क्षण में जीने दो | 

                  - मुकुल कुमारी अमलास 

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