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प्रदीप कुमार साह की लघुकथा - प्रायश्चित


प्रायश्चित (लघु कथा)-प्रदीप कुमार साह
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एकबार अति कुख्यात दस्यु दल (डकैतों का समुह) किसी मरणासन्न व्यक्ति के पास आया. किंतु मरणासन्न व्यक्ति को थोड़ा भी सशंकित, भयाक्रांत  अथवा हत्तोतसाहित नहीं देख कर उनके आश्चर्य  का ठिकाना न रहा. उनलोगों ने मरणासन्न  व्यक्ति से इसका कारण जानना चाहा.

मरणासन्न व्यक्ति ने उनलोगों से प्रतिप्रश्न किया कि उनलोगों द्वारा निर्ममता से लोगों से लुटे गये धन का वेसब कितना समुचित लाभ क्या पाते हैं? लोगों से निर्मम व्यवहार करने वाले दस्यु कब किस चीज से भयमुक्त रहता है?

दस्युओं से उसके प्रतिप्रश्न का जवाब नहीं बना. तब मरणासन्न व्यक्ति ने कहा कि दस्यु कभी सुखी और भयमुक्त नहीं रहते. उनका विकारों से भरा मन निर्बल हो जाता है जिससे वह सत्य का सामना करने योग्य नहीं रहता.जबकि लोग दस्यु द्वारा अपना धन हरण होने पर भी जीते हैं. कुछ लोग वैसे भी हैं जो मृत्यु समीप रहने पर भी भयमुक्त और शांतचित होते हैं.

यह सुनकर दस्यु और भी आश्चर्यचकित हुआ. तब उसने आगे कहने लगा कि इसका कारण है कि वेसब श्रीगीताजी का यह श्लोक आत्मसात् कर लिये हैं ,कि  मनुष्य को सत्कर्म प्रभु की सबसे बड़ी  सेवा, अपना परम कर्तव्य और सु-अवसर एंव सद्मार्गगामी  समझकर करना चाहिये. इससे मनुष्य में कर्म के प्रति लगाव, समर्पण, सावधानी एंव हृदयमें दया और बुरे भाव तथा बुरे  कर्म के प्रति विरक्ति जन्म लेता है.

इतना कहकर वह चुप हो गया. मर्म की बातें जानकर दस्युओं ने आगे बताने की प्रार्थना की. उसने आगे बताया,'वेसब  दृढ़  विश्वास करते हैं कि प्रतिफल देना प्रभु का परम दायित्व है. इससे वे प्रतिफल की कामना से तटस्थ होते हैं. इससे प्रतिकूल समय में भी वे शांतचित्त रहकर अगला लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं और सदैव आशान्वित, कार्यान्वित और चिंतामुक्त रहते हैं. वे किसी का अहित कभी नहीं करते. गलती होने पर स्वतः सुधार कर प्राश्चित करते हैं. अपनी गलती पर उन्हें दुःख और ग्लानि होता है, क्योकि उनके हृदय में दया और लज्जा होती है.प्राश्चित करने से हृदय का विषाद मिट जाता है और अत्मबल बढता है."

इतना कहकर उसके प्राण- पखेरु उड़ गये. किंतु जाते-जाते उसने सबकी ऑखें खोल दी.
(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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