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दीपक आचार्य का आलेख - रूप-सौन्दर्य चाहें तो मन बुहारें


- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

सौन्दर्य पाने, सौन्दर्यशाली दिखने और दिखाने की चाहत हर इंसान की पहली इच्छा होती है जिसके लिए वह सब कुछ करने को तैयार रहता है। रूपवान और रूपसी बनने के लिए हम लोग साल भर में रोजाना ढेरों जतन करते रहते हैं।

हमारी जिन्दगी का बहुत बड़ा समय और ढेर सारा धन इसी सौन्दर्य को पाने में खर्च हो जाता है। इस सौ फीसदी सत्य को स्वीकार करने से कोई इंकार नहीं कर सकता। रूप का आकर्षण अपने आप में दूसरे सारे आकर्षणों से कहीं अधिक होता है। जहाँ दृष्टि मात्र से सौन्दर्य भरे बिम्बों के बीच एक ऎसा रिश्ता कायम हो जाता है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

इसीलिए रूप-सौंदर्य की चाहत इंसान की वह कामना है जिसे प्राप्त कर लेने के बाद उसे औरों की निगाह में आने और अपने प्रति दिली आकर्षण जगाने के लिए और कुछ भी नहीं करना होता। स्त्री और पुरुष के बीच रूप का आकर्षण वह प्रथम दृष्ट्या सम्पर्क-सेतु है जो ‘‘फस्र्ट इम्प्रेशन इज लास्ट इम्पे्रशन’’ के सिद्धान्त को परिपुष्ट करता है।

यह पहला आकर्षण और मुलाकात का सर्वप्रथम दौर ही हर इंसान के बारे में दूसरों की धारणाओं की पहचान करता है और सामीप्य लाता है। यही कारण है कि दुनिया की अधिकांश आबादी सौन्दर्य पाने और अपने आपको दूसरों के मुकाबले अधिक सौंदर्यशाली दिखाने की चाहत में हमेशा लगी रहती है। करोड़ों लोग हैं जिनका काफी कुछ समय ब्यूटी पॉर्लरों और आइनों के सामने बीतता है।

जन-जन की इसी चाहत का प्रतीक है - रूप चौदस पर्व। धनतेरस से शुरू होने वाले पंचदिवस पर्व का यह दूसरा दिन अपना रंग-रूप निखारने का वार्षिक अवसर है। इस दिन हर तरह से अपना सौन्दर्य निखारने का प्रयास हम लोग करते हैं।

हमारी यही कोशिश रहती है कि शारीरिक स्वच्छता और सुन्दर छवि दर्शाने की परंपरा को अपनाएं और उसी के अनुरूप हमेशा साफ-सफाई तथा सौन्दर्य पाने के लिए प्रयत्नशील बने रहें। रूप चौदस का परंपरागत रूप निखार पर्व पहले जमाने में किसी ब्यूटी पॉर्लर का मोहताज नहीं होता था, न अपनी ब्यूटी निखारने और सुन्दर दिखने-बनने के लिए किसी और के सहारे की कोई आवश्यकता ही होती थी।

हमारे आस-पास प्रकृति का खुला आँगन था जिसमें वह सब कुछ उपलब्ध था जो हमारे रूप को बढ़ाने में कारगर था। इनमें पंचतत्वों की भरपूर उपलब्धता, वानस्पति सौन्दर्य निखार तत्व, काली एवं मुलतानी मिट्टी, पंचगव्य, हल्दी, चंदन और पीठी से लेकर वह सब कुछ था जिसका उपयोग करने पर इंसान का रूप आकर्षण जगाने वाला हो जाता था।

हमने इस प्रकृति की घोर उपेक्षा की और साबुन, इत्र-फुलैल, कॉस्मेटिक्स, असंख्य प्रकार के क्रीम, पॉवडर, कितने ही प्रकार के जीवों के अण्डे, जीव-जन्तुओं के रक्त, माँस, हड्डियों और अंग-उपांगों से निर्मित जात-जात के रसायन और घातक मिश्रणों से अपने आपको सुन्दर दिखाने की ऎसी कोशिश की कि इससे सुन्दर तो दिखने लग गए लेकिन कुछ मिनटों और घण्टों के लिए ही। और बाद में ऎसे कुरूप दिखते हैं कि घर वाले भी हमें देखकर भूतों और चुड़ैलों को याद करने लगे।

चेहरे का सौन्दर्य हमारे शरीर और आस-पास के क्षेत्रों की साफ-सफाई तथा चित्त की निर्मलता से सीधा संबंध रखता है। जो आदमी गंदे घरों और स्थलों के आस-पास या गंदगी, प्रदूषण और सडान्ध के बीच रहता है, गंदे माहौल में पला-बढ़ा होता है, जिसका दिमाग खुराफातों और शैतानियत से भरा होता है, जिसका मन मलीनताओं का डेरा बना होता है, उन लोगों के चेहरों पर सौन्दर्य कभी आ ही नहीं सकता।

ऎसे लोग यदि सुन्दर दिखते भी हैं तो यह मानकर चलें कि ये लोग रसायनों के थथेड़ कर तथा ब्यूटी पॉर्लरों का सहयोग पाकर ही अच्छे दिखते हैं। वरना इन्हें बिना कॉस्मेटिक्स के कभी अचानक देख लें तो वास्तविकता सामने आ ही जाएगी। दुर्भाग्य यही है कि आजकल हम लोग आकर्षक पैकिंग के दीवाने हैं, इसलिए चाहे हम भीतर से कैसे भी हों, अच्छे और सुन्दर दिखना हमारे जीवन का पहला और अंतिम दैनंदिन कर्म हो गया है।

रूप के मामले में हम सभी लोग बहुरूपिये होकर रह गए हैं। हम हैं तो कुरूप, टकले, टाटले और मलीन, लेकिन जब भी बाहर निकलते हैं तब ऎसे फब कर निकलते हैं जिससे कि आयु कम दिखे, बुढ़ापा ढंका रहें, साफे-टोपियों और पगड़ियों से सर के टकले और मुण्डे होने का आभास किसी को न होने पाए।

इस मामले में सारे लोग हद से ज्यादा डुप्लीकेट हो गए हैं। इनके शरीर का असली राज वे ही जानते हैं जो इनके आस-पास रहते हैं, बाकी लोग तो इनके सौन्दर्य और शारीरिक सौष्ठव के मामले में भ्रमित ही रहते हैं। इन मुखौटा पसंद और कृत्रिमता को अपनाने वाले लोगों के जीवन का हर कर्म, स्वभाव और व्यवहार भी छद्मता लिए होता है।

ये लोग सच्चाई, धर्म और यथार्थ से कोसों दूर रहने वाले होते हैं और इनका हर कार्य भी ऎसा ही होता है। अपने बारे में ये लोगों को सायास गुमराह करते हैं और जमाने भर में दोहरे-तिहरे चरित्र के माध्यम से बहुरूपिया अभिनय करने में सिद्ध हो जाते हैं।

एक आम इंसान जितनी शुद्धता, यथार्थ और मौलिकता में जीने और आनंद पाने का अभ्यासी होता है, उससे भी ये लोग जिंदगी भर वंचित रहते हैं क्योंकि इन लोगों का हर कर्म और व्यवहार केवल दूसरों को अच्छा दिखाने के लिए होता है इसलिए ये अपना आत्म आनंद खो चुके होते हैं और किसी रंगमंच पर उस कलाकार की तरह काम करते हैं जिसके लिए कोई एक पात्र निश्चित नहीं होता बल्कि जहां जिसकी जरूरत आन पड़ती है, उसका अभिनय ये कर लिया करते हैं और पूरी क्षमता के साथ।

ऎसे लोग यदि किसी नाट्यशाला, फिल्मों और रंगमंचीय अभिनय में होते तो अब तक कितने ही विश्व रिकार्ड कायम कर लेते। असल में हमारा सब कुछ आडम्बरों और कृत्रिमता पर आधारित हो गया है। मन में कुटिलता, क्षुद्र स्वार्थों, लूट-खसोट, पराये माल पर मौज उड़ाने की तस्करी वृत्ति, मुफ्तखोरी, हरामखोरी तथा तमाम प्रकार की मलीनताओं के रहते हुए चेहरे की सुन्दरता पाना कल्पना ही है। चाहे इसके लिए हम ब्यूटी पॉर्लरों पर लाखों रुपए ही खर्च क्यों न कर डालें।

रूपवान वे ही होते हैं जिनका चित्त निर्मल, निश्चिन्त, निरहंकारी और शुचिता से परिपूर्ण होता है। चित्त की निर्मलता से प्राप्त रूप स्थायी होता है तथा यह केवल अच्छा दिखता ही नहीं, बल्कि औरौं को आकर्षित कर अच्छा बनाने का माद्दा भी रखता है।

इस बार की रूप चतुर्दशी पर संकल्प लें कि मन से मलीनताओं का सफाया कर मानवीय मूल्यों और दिव्यत्व की प्रतिष्ठा करेंगे, ताकि आने वाली रूप चतुर्दशी तक हमें रूपवान या रूपसी के रूप में अपने आपको स्थापित करने के लिए किन्हीं अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत न रहे और देखने वाले भी हमसे प्रेरणा पाते रहें। इसके लिए अपने भीतर मौलिकता लाएँ, मनः सौन्दर्य की आराधना करें।

सभी को रूप चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएँ ...।

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