दीपक आचार्य का आलेख - भूलते जा रहे हैं नैमित्तिक कर्म

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धर्मशास्त्रों में उपासना पद्धतियों से जुड़े सभी मार्गों में आम इंसान के लिए नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्म का प्रावधान है। नित्य कर्म से अर्थ उस पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड तथा परंपराओं का निर्वाह है जो कि  रोजाना करने होते हैं। इनसे बचना नहीं चाहिए जब तक कि बीमारी या दूसरी कोई अपरिहार्य परिस्थितियां हमारे सामने न हों।

इसी प्रकार काम्य कर्म या काम्य अनुष्ठान वे हैं जिनमें किसी कामना विशेष से देवी-देवता और प्रकृति की पूजा की जाती है और इसका संचित पुण्य या ऊर्जा कामना पूरी हो जाने तक ही बना रहता है।

तीसरे प्रकार में आते हैं नैमित्तिक कर्म। इनमें साल भर में आने वाले व्रत-उपवास, तिथि-पर्व, संस्कारों आदि पर की जाने वाली सम सामयिक उपासना शामिल है।

आजकल नित्य और नैमित्तिक कर्म का ह्रास होता दिखाई  देता है जबकि अधिकांश लोग बारहों मास काम्य उपासना में ही डटे रहते हैं। उनका जीवन कामनाओं के इर्र्द-गिर्द पेण्डुलम की तरह भटकता रहता है। हर छोटे-मोटे काम के लिए वे किसी न किसी की उपासना करते रहते हैं।

फिर आजकल कामना पूर्ति के लिए देवी-देवता को प्रसन्न रखने की बजाय भूत-प्रेतों और पितरों को अधिक पूजा जाने लगा है, देवी-देवता इसके बाद की श्रेणी में रखे जाने लगे हैं।

आज की परिस्थितियों में नैमित्तिक कर्म सर्वाधिक पिछड़ा हो गया है। अव्वल बात तो यह है कि जिन लोगों के जिम्मे धर्म, संस्कृति और परंपराओं के संवहन का काम रहा है वे लोग अपने कामों को भुला कर अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे हुए हैं या वे यही चाहते हैं कि इनके बारे में उनका एकाधिकार बना रहे, और कोई उनके कामों को सीख न पाए।

और इससे भी बड़ी बात ये कि इन लोगों ने धर्म की सारी व्यवस्थाओं को धंधा बना डाला है। इस धंधे में कामना पूर्ति के बैकडोर प्रलोभन हैं, देवी-देवता का भय है। कोई लालच या प्रलोभन से नहीं पट पाए तो उसके लिए कोई न कोई तगड़ा और सर्वस्वीकार्य भय दिखाने का इंतजाम है ही।

इस भय के मारे अच्छे-अच्छे लोग पस्त होकर अनुचर और दास हो जाते हैं। इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं रहता। फिर कितने लोग बचे हैं जो सत्य और धर्म पर चलते हैं  जिन्हें इन धंधेबाजों से न भय लगता है, न वे इन धूर्त और पाखण्डियों के झाँसे में आते हैं।

साल भर में होली, दीवाली, राखी, दशहरा, जन्माष्टमी, रामनवमी, नवरात्रि, तीज-त्योहार आदि असंख्य अवसर  आते रहते हैं और उन सभी का अपना विशिष्ट महत्व है, साथ ही इन सभी के लिए विशिष्ट व्रत, साधना, कथाश्रवण और दूसरी सारी प्रक्रियाएं जुड़ी हुई हैं।

इनमें से जो उत्सव, त्योहार और तिथि पर्व लोक परंपराओं का हिस्सा बन गए उनका निर्वाह तो किसी न किसी रूप में हो रहा है लेकिन अधिकांश को हम केवल औपचारिकता मात्र मानकर निभा रहे हैं। इस मामले में महिलाएं आगे हैं जो कि परिपालन कर रही हैं, पुरुष तो केवल द्रष्टा और भोक्ता ही होकर रह गए हैं।

और यही कारण है कि किसी भी तिथि-पर्व के लिए किए जाने वाले नैमित्तिक कर्म का हमें  न कोई फायदा मिल रहा है, न कोई पुण्य प्राप्ति हो रही है। हम सारे नैमित्तिक कर्म भुला कर उत्सवों और तिथियों को केवल मनाने भर तक सीमित रखे हुए हैं जिनमें मौज उड़ाना और लोकानुरंजन करना ही हमारा मूल उद्देश्य होकर रह गया है।

हममें से बहुत सारे लोग एकादशी, प्रदोष आदि व्रत करते हैं, लेकिन न कथा का श्रवण करते हैं न भगवान के लिए किसी प्रकार की कोई उपासना। मामूली उपचार कर लिया करते हैं और यह मान बैठते हैं कि भगवान इसी से खुश हो जाएगा। 

दीपावली, देवदीवाली, अन्नकूट, भाई दूज, लाभ पंचमी हों या फिर साल भर आते रहने वाले कोई से नैमित्तिक पर्व, हम केवल औपचारिकता निर्वाह ही कर रहे हैं। हमें इन तिथि पर्वों और अवसरों की वैज्ञानिकता, सूक्ष्म रहस्यों और आवश्यकताओं के बारे में न कोई जानकारी है, न जानकारी रखना चाहते हैं।

दरअसल हमारे भीतर अपने बीज तत्वों और परंपराओं के परमाण्वीय ऊर्जाओं के समकक्ष महत्व के प्रति न गौरव है न गर्व अभिमान।  उन लोगों को भी लानत है जो लोग समाज और देश को जगाने, संस्कृति और परंपराओं के बारे में लोक जागरण करने और सांस्कृतिक उन्नयन के लिए उत्तरदायी तो हैं मगर अपने लाभों और ऎषणाओं में रमे हुए अपने कर्तव्यों को भुला चुके हैं।

जिस दिन या तिथि को जो कोई पर्व-त्योहार, उत्सव और परंपरा हो, उसके बारे में जानें, विधिवत पालना करें और हर निमित्त को बेहतर ढंग से निभाएं, तभी नैमित्तिक कर्म हमारे जीवन के लिए सुनहरे स्वप्नों को साकार करने के सशक्त माध्यम बन पाएंगे।

आज हम सभी को अपनी संस्कृति और इतिहास को जानकर नैमित्तिक कर्मों को अपनाने तथा इनके बारे में वर्तमान पीढ़ी को ऎतिहासिक एवं पौराणिक कथानकों, कथाओं और अन्तर्कथाओं के बारे में जानकारी देने तथा इन सभी के पीछे छिपे महान वैज्ञानिक रहस्यों के बारे में बताने के लिए समर्पित होकर काम करने की आवश्यकता है।

ऎसा करना ही धर्म है, अन्यथा केवल औपचारिकता निभाने भर के लिए होने वाले आयोजन और उत्सव मनोरंजन और खान-पान तथा स्वाद तक ही सीमित होकर रह जाने वाले हैं।

धर्म के नाम पर धींगामस्ती करने वाले बाबाओं, पण्डितों और झण्डाबरदारों को भी अपनी भूमिकाओं के बारे में फिर से सोचने की जरूरत है जिनकी नालायकियों के कारण धर्महीनता का माहौल फैलता जा रहा है और पाखण्ड का साया पसरने लगा है। धर्म, सत्य और न्याय की प्रतिष्ठा करते हुए अपनी गौरवशाली परंपराओं को अपनाने की जरूरत है।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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