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प्रदीप कुमार साह की कहानी - आकांक्षा

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आजकल कामकाजी जीवन में घर और दफ्तर के व्यस्ततम काम-काजों के इतर बमुश्किल किसी को वो पल नसीब होता है जब कोई कुछ समय फुर्सत से कहीं बैठ सके. आज मुझे वो पल नसीब हुए, जब मैं किसी काम से छुट्टी लेकर गाँव आया और भाभीजी भी किसी संबंधी के शादी समारोह में शरीक होने सपरिवार गई. तब मैं घर में अकेला रहा. आदमी फुर्सत में जब बैठा हो तब पुरानी खट्टी-मीठी यादें ताजा हो जाना स्वाभाविक है. उस क्षण में उन बातों पर भी ध्यान चला आता है,जिसपर अपने व्यस्ततम जिंदगी में ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया. अन्नु मेरी प्यारी भतीजी है. उस मासूम ने एकदिन मुझसे तोतली बोली में पूछा था कि आकांक्षा  और स्वप्न देखने में क्या अंतर है? तब उसका सही-सही जवाब मैं नहीं दे पाया और शहर चला आया था. फिर गृहस्थी में इस कदर फँसा कि एक लंबे अर्से से दुबारा मुलाकात न हो पाई.

आज मुझे महसूस होता है कि वो लोग निश्चय ही कितना खुशनसीब होते हैं जिन्हें फुर्सत के कुछ पल मिल पाते हैं और कुछ क्षण वह शांतचित्त रह सकते हैं. जब मनुष्य शांतचित्त होते हैं, वास्तव में वह आत्म-चिंतन की ओर अग्रसर होते हैं. अभी मुझे अन्नु के प्रश्न पर चिंतन करने का अवसर मिला है. मुझे पुरानी बातें भी याद आ रहे हैं. जब मैं अपने भतीजी के उम्र का था, तब पढ़ने-लिखने से बिल्कुल जी चुराता था. जब कोई पूछता कि मैं क्या बनना चाहता हुँ ,तब झटपट जवाब देता कि मुझे मजिस्ट्रेट बनना. उन दिनों पिताजी मुझपर गुस्सा भी बहुत होते थे. वे गुस्से में अक्सर कहते थे,"इच्छा करना उचित है, क्योंकि इच्छा जगाने से कार्य करने के प्रति भाव जागृत होता है. इच्छा-पूर्ति हेतु कड़ी मेहनत करनी होती है. किंतु बिना कर्म किये बड़ी-बड़ी बातें सोचना केवल स्वप्न देखना है."

किंतु मुझमें अपेक्षित सुधार नहीं आ पाया. बमुश्किल विद्यालय जाने लगा तो सही से पाठ्य का गृह कार्य (होम वर्क) नहीं करता.किंतु मुझमें कुछ बड़ा बनने का लालसा बना रहा,जिसके फलस्वरुप मुझे किसी निजी कंपनी में नौकरी मिली. किंतु मनमाफिक पद नहीं था,न तनख्वाह. इससे मैं संतुष्ट नहीं था. अच्छे पद और अच्छी तनख्वाह के लिये कोशिश करने लगा. एक दिन आकांक्षा के अनुरूप कुछ अच्छी नौकरी मिली. सफलता मिलने से मेरी महत्वाकांक्षा बढ़ गई. मेहनत करना जारी रखा. फिर एक-एक कर मुझे कई प्रोन्नत्ति मिले. मुझे खुशी हुई किंतु संतुष्टि अब भी न था. मुझे अधिकाधिक ख्याति और धन की इच्छा होने लगी.

एक बार विधान सभा चुनाव का समय आया. एक राजनीतिज्ञ से अपनी तुलना कर उनके ख्याति एवं धन के बारे में सोचा. तब मुझे भी एक राजनेता बनने का लालसा जगा. चुनाव का समय था सो नौकरी और पद त्याग कर पूरे जी-जान से पार्टी टिकट लेने के जुगत में लग गया. पार्टी का टिकट पाने में सफल हुआ. फिर चुनाव हुआ और नतीजा आया. चुनाव में मेरी हार हुई. मेरा सारा मेहनत और धन बर्बाद गया. चिंताकुल मेरी कई दिनों तक भूख-प्यास भी जाती रही. मैं बीमार पड़ गया .अंततः मुझे अस्पताल में इलाज के लिये भर्ती होना पड़ा.मेरी अतिमहत्वाकांक्षा ने मुझे ले डुबा था.

अस्पताल से छुट्टी मिली तो घर आकर आर्थिक तंगी से घिर गया. राजनेता बनने के चक्कर में नौकरी और पद पहले ही त्याग चुका था. अब दुबारा नौकरी ढूँढ़ना प्रारंभ किया. काफी मशक्कत के बाद नौकरी मिली और अपनी आजीविका चला रहा हुँ.अब उस मासूम के सवालों का क्या जवाब दूं? मेरी समझ से यही न कि, किसी इच्छा-पूर्ति हेतु कर्म करते हुए उसे (इच्छा) बनाए रखना आकांक्षा है अर्थात् कर्म का प्रश्रय प्राप्त इच्छा आकांक्षा है और यह भी कि कर्म विहीन इच्छा दिवा स्वप्न.उसे यह समझना होगा कि जो हमें चाहिए उसे पाने हेतु मन में उठने वाला भाव इच्छा है.भाव जीवित प्राणीमात्र के जीवन का परिचायक होता है.इस तरह इच्छा एक सहज मानसिक भाव है. अब मैं उसे यह बताऊँगा कि एक कार्य में सफलता मिलने के पश्चात् कुछ और अच्छा पाने या करने की इच्छा महत्वाकांक्षा है. आकांक्षा से मनुष्य का कर्म के प्रति जागृति व्यक्त होता है और महत्त्वाकांक्षा लक्ष्य एवं सफलता का मार्ग है.किंतु लोभ एवं अज्ञानतावश लोग इस मार्ग से भटक जाते हैं.

मैं उसे यह भी बताना चाहूंगा कि अति का सभी जगह त्याग करना चाहिए. लोभादिक से परिपूर्ण अति-महत्त्वाकांक्षा मदांध व्यक्ति को कष्ट और पतन की ओर ले जाता है.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

(ऊपर का चित्र - अर्चना झा, इंदौर की कलाकृति)

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