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सुदर्शन कुमार सोनी का व्यंग्य : दाल: दिल जलो के दिल जल रहे हैं !

मैं सुपर मार्केट में दालों के काऊंटर के सामने खडा़ था । रेट देखकर सोच रहा था कि कितनी दाल लूं लूं कि नहीं ? अचानक ही मुझे एैसा लगा कि दाल मेरे से कुछ बात कर रही है ! मैंने थोडे़ से कान दिये तो दिलचस्प बयां सुनायी दिया।

मैंने गुमनामी की लम्बी यात्रा तय की है तब कहीं जाकर यह मुकाम हासिल हुआ है , सालों इंतजार किया है तब मेरे में इतनी चैधराहट आयी है , इतना निखार आया है , इतना ग्लैमर मेरे साथ आ जुडा़ है । मेरे पहले प्याज कहर बरपा चुकी है उसके पहले कभी टमाटर व आलू तक ने कहर बरपाया है। धनिया भी हर साल एकाध बार चुपके से मौका देखकर आसमां छू लेती है किसी को हवा नहीं लगती। अब बमुश्किल मेरी हवा बनी है।

मेरी हालत तो इतनी पतली बनाकर रखी गयी थी कि सालो पहले मुझे ’पूअर मेनस् मीट’ तक की उपाधि से नवाजा गया और इस तरह मेरी खिल्ली उडा़यी जाती थी कि जो गरीब आदमी मीट नहीं खा सकता वह अपनी प्रोटीन की कमी मुझसे पूरी करे। इतना नीचे गिरा दिया गया था मुझे ? आज तो मीट सस्ता है और मैं मंहगी हूं ! तो कई लोगों को यह भी नहीं पच रहा है कहते है दाल नहीं अबके समय की काल है। सारी चैनल सारे अखबार बस मेरी ही चर्चा कर रहे है अब मैं ’टाक आफ दा टाऊन’ हूं । जिसका बटुआ हाऊसफुल नहीं है वे मेरे से दूर ही रहे ! जो मांसाहारी है वे मीट ज्यादा खाये, बटुआ सही सलामत रहेगा और जो नहीं है उनकी वे जाने।

अब मेरा समय आया है , मेरी पतंग आसमां में उड़ चली है अब इसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं। अब किसी की नींद हराम यदि हो रही है तो मेरी बला से! मेरा भी अधिकार कुछ दिनों सुर्खियों में बने रहने का है न कि केवल प्याज और टमाटर का ही है।

वैसे भी अखबारों में आजकल रहता ही क्या है तीन पन्ने बाद तो अखबार शुरू होता है फिर बाद के हर पन्ने में भी विज्ञापन या फिर वही गेंगरेप की घटनाये , किसी नये घोटाले का खुलासा , बम विस्फोट से इतने मरे , मंदिर में भगदड़ से इतने मरे , तीर्थ यात्रियों से भरी बस खाई में गिरी इतने मरे , या फिर राजनेताओं के मर्यादा को ताक में रखकर एक दूसरे के बारे में दिये जाने वाले उटपटांग बयान । इससे तो बेहतर है कि मैं छायी रहूं मीडिया में कम से कम निगेटिव मायने तो नहीं है मेरे ? यदि मैं मंहगी हो गयी हूं तो क्या हुआ आदमी न जाने कितनी मंहगी चीजें शौक से खरीदता है । दौ सौ रूपये किलो में इतनी हाय तौबा और कई जो रोज पांच सौ हजार की शराब पी जाये , लजीज खाने में हजार खर्च कर दे तो कुछ नहीं । मैं तो वैसे भी प्रोटीन की खान हूं । दाल रूक नहीं रही थी अपनी भडा़स लगातार निकाल रही थी आगे बोली । किसान चाहे तो मेरे को अपनाकर आन बान शान से रह सकता है । अभी सूखे से सब परेशान है मेरे को पहले से अपनाया होता तो मैं तो नाममात्र के पानी में हल्की जमीं में भी अच्छा फलती फूलती हूं । जैसे ऊंट रेगिस्तान का जहाज है मैं वैसे ही किसान की खुशहाली का जहाज बन सकती हूं लेकिन पता नहीं क्यों मेरी खेती को यहां बढा़वा न देकर मेरा आयात करने को ही पा्रथमिकता दी जाती है ?

चलो अच्छा है , इससे मुझे मौका तो मिला इतराने का , इठलाने का गर्व से सिर उठाने का अब तो मध्यम वर्ग भी मेरे से खौफ खाने लगा है खाना बगैर मेरे खाने लगा है । अब यह मेरे दिन है , मेरी जवानी व ग्लैमर के दिन है मैं नाच तो नचाऊंगी , नहीं तो कोई पूछता था क्या मुझे , यहां इस देश में उसे ही पूछा जाता है जिसकी कोई न्यूसेन्स वेल्यू होती है । जो चिल्लाता है , ध्यान आकृष्ट करता है उसी की पूछ होती है मेरे भाव बढ़ने से तो एैसा लग रहा है कि मेरे सींग उग आये है ! हर कोई मेरे ही नाम की माला जप रहा है । देखो तो मेरे कारण हत्या तक हो गयी दाल का ट्रक लूट लिया गया ! अब उनकी दाल नहीं गल रही है जो मुझे दबा कर रखे थे । अभी तक मुझे तो मेरे उत्पादन को बढा़वा न देने की नीति नहीं होने व आयात को बढा़वा देने में ’दाल में कुछ काला’ ही नजर आता है।

मैं अब कुछ दिन तो सोने नहीं दूंगी लोगों को नींद हराम कर रखूंगी । मैं अब नये जमाने का सोना बनने जा रही हूं। दीवाली आ रही है अपने दोस्तों संबंधियों को सूखे मेवों व मिठाईयों की जगह अब मुझे गिफ्ट करे । बस थोडा़ मेरा इस तरह से मान सम्मान हो गया तो फिर मैं अपनी चैधराहट की रौशनी को दीपपर्व की रौशनी में विलीन कर दूंगी मतलब आसमां से जमीं पर आ जाऊंगी । वादा है यह मेरा मेरे निखार के दिनों में मुझे कुछ तो इतरा लेने दो रे।

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सुदर्शन कुमार सोनी

डी- 37 चार ईमली

भोपाल

9425661035

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