बुधवार, 25 नवंबर 2015

दीपक आचार्य का आलेख - जो निश्चिंतता न दे वह भक्ति है पाखण्ड

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हम सभी लोग किसी न किसी धर्म-सम्प्रदाय और उनकी परंपराओं को जीवन में सर्वोपरि मानकर चलते हैं और उसे जीवनाधार मानते हुए अपने कर्म करते हैं।

भगवान के प्रति आस्था सभी को होती है, कुछ नास्तिकों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर लोग किसी न किसी के प्रति आस्था रखते हैं।

यह आस्था सर्वशक्तिमान परमात्मा, देवी-देवताओं, पितरों, सिद्धों या तपस्वी महात्माओं किसी के भी प्रति हो सकती है। भगवान के प्रति आस्था का ग्राफ सभी में न्यूनाधिक होता ही है। किसी में कम, किसी में ज्यादा।

पर अधिकांश लोगों की श्रद्धा और आस्था अपने स्वार्थ या कामों के पूरे होने तक ही सीमित रहती है। सफल हो जाएं तो ठीक है, वरना कुछ दिनों या महीनों के लिए निराशा छा जाती है। फिर कोई काम आ जाए तो हो जाए तो गाड़ी पटरी पर वापस लौटने लगती है।

यह स्थिति कमोबेश इन सभी की होती है। हममें से अधिकांश लोग भगवान पर आश्रित रहते हैं, उनका नाम लेकर काम करते हैं और ऎसे बताते हैं कि जैसे भगवान उन्हीं के लिए बैठे हैं।

दिन भर में भगवान को ढेर सारे काम बताते हैं जैसे कि भगवान उनके नौकर ही हों, जो चुटकी बजाते ही उनके सारे काम कर डालें और उसकी एवज में न कुछ लें, न अपेक्षा रखें।

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि हम लोग भगवान को श्रद्धा से मानते हैं और दूसरी तरफ अपने भविष्य और रोजमर्रा के कामों को लेकर आशंकित भी रहते हैं। यह दुविधापूर्ण स्थिति अधिकतर लोगों के जीवन की नियति बन चुकी है।

जबकि यथार्थ यही है कि एक बार जो भगवान के प्रति अनन्य भाव से श्रद्धा का भाव अपना लेता है उसे अपने किसी कर्म या भविष्य के प्रति चिंतित होने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए क्योंकि उसके जीवन के समस्त कर्मों की गारंटी भगवान ले लिया करते हैं।

हम अपने भजनों में राग अलापते हैं - अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे चरणों में, सब भार तुम्हारे चरणों में ....। इसी प्रकार भगवान के सामने नत मस्तक होते हुए हम उत्साह से गाते हैं - त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमे बन्धुश्चसखा त्वमेव, त्वमेवविद्याद्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वम् मम देव देव। अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम् ....।

इसी प्रकार भगवान के सामने हर प्रकार से विनयी और करुण भाव में आकर हम अपने आपको दास तक कह डालते हैं।

यही नहीं तो हम भगवान को कहने भर के लिए अपने आपको भगवान का अपना मानते हैं, भगवान के प्रति सर्वस्व समर्पित मानते हैं और दुनिया के सामने यह जताते हैं कि हमसे बढ़कर दुनिया में कोई दूसरा भक्त है ही नहीं।

जो भगवान के प्रति अनन्य श्रद्धा रखता है, अपने आपको भक्त मानता है उसके लिए जीवन भर किसी प्रकार की कोई चिन्ता या आशंका होनी ही नहीं चाहिए।

गीता में भी भगवान द्वारा यही कहा गया है कि जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करता है उसके जीवन के सारे योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। इतनी बड़ी उद्घोषणा और गारंटी के बाद भी हम लोग अपने रोजमर्रा के जीवन से लेकर भविष्य तक के लिए तमाम प्रकार की आशंकाओं, भ्रमों और चिन्ताओं में डूबे रहते हैं, यह अपने आप में हमारी श्रद्धा-भक्ति का भी अपमान है और भगवान का भी।

भगवान का भक्त होने के बाद इन सभी की समूल समाप्ति होनी चाहिए तभी भक्ति, भक्त और भगवान का साकार स्वरूप सामने आ सकता है। या तो भगवान के प्रति श्रद्धा और समर्पण होगा या आशंकाएं और चिन्ताएं।

जो लोग भक्त होकर अपने जीवन या और किसी भी प्रकार की आशंकाएं पाले बैठे होते हैं उनकी भक्ति ढोंग, पाखण्ड, आडम्बर और दिखावे के सिवा कुछ नहीं है।

या तो वास्तविक भक्ति और ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से जीते हुए मस्ती पाएं या शंकाओं में रमे रहें। भक्त और श्रद्धालु होकर चिन्ताओं में डूबे रहना न भक्ति है,  न श्रद्धा। यह केवल लोक दिखावन स्वाँग से ज्यादा कुछ नहीं।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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