शनिवार, 7 नवंबर 2015

दीपक आचार्य का आलेख - आतिशबाजी देती है अभिशप्त जिन्दगी

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इन दिनों यत्र-तत्र-सर्वत्र आतिशबाजी का जोर है। दीवाली का त्योहार जो है। फिर आतिशबाजी कोई एक दिन की ही बात नहीं है बल्कि यह पखवाड़े भर तक यों ही चलती रहती है।

हाल के वर्षों में यह पागलपन इतना अधिक जोर पकड़ चुका है कि अब आतिशबाजी को खुशी का प्रतीक, पर्याय और पूरक माना जाने लगा है। खुशी हो न हो, औरों के सामने इसे जताना हो तो आतिशबाजी से बढ़कर आजकल और कोई रास्ता लोगों के पास बचा ही नहीं है। 

कहीं कुछ खुशी का प्रकटीकरण करना हो, पटाखे चला दो। एक जमाने में पटाखे, बम और धमाकों का सीधा संबंध किसी युद्ध से ही माना जाता था जहाँ जिस किसी इंसान या क्षेत्र को खत्म करना होता था वहाँ बम गिरा दिए जाते, तोपों के गोलों से भेद दिया जाता  और जहाँ-तहाँ विध्वसं का भीषण स्वरूप देखते ही देखते सामने आ जाता।

आज युद्ध होने बंद हो गए हैं, लेकिन विध्वंसात्मक मानसिकता और धमाकों को देख-सुन कर पेट भरने और खुश होने वाले लोगों की मनःस्थिति नहीं बदली है। ये लोग आज भी उन पुरानी सदियों में जी रहे हैं और गोला-बारूद की गंध सूंघकर तथा सूंघाकर अपनी धमाकों भरी विध्वंसात्मक सोच और तलब को पूरा करने के लिए आतिशबाजी का सहारा ले रहे हैं।

हम सभी दूसरों की देखा-देखी यही सब कुछ करते आ रहे हैं। हमने कभी यह समझने की कोशिश नहीं कि जो हम कर रहे हैं उसके पीछे क्या तर्क, आधार और प्रामाणिकता है, हम यह क्यों कर रहे हैं और इसका क्या प्रभाव सामने आएगा। 

अव्वल बात यही है कि हममें से बहुत सारे लोग छिद्रान्वेषी, विघ्नसंतोषी, अशांतिदाता और आसुरी वृत्तियों वाले हैं जिन्हें अशांति, धमाके और नकारात्मक माहौल  पसंद है और यही कारण है कि ये लोग अपनी दूसरी नकारात्मक वृत्तियों के साथ ही आतिशबाजी को भी दिल और दिमाग दोनों से पसंद करते हैं और साल में कई बार अपनी विध्वंसवादी मानसिकता का पूरा-पूरा परिचय देते रहते हैंं।

आतिशबाजी अपने आप में आदमी के दिमाग के भीतर पसरी हुई विध्वंस दृष्टि, हृदय में जमा अंधेरों, मलीनताओं तथा  आसुरी हरकतों की प्रतीक है।  इसका खुशी से कोई मतलब नहीं है बल्कि खुशी के नाम पर औरों को मानसिक युद्ध में पछाड़ने और इसके बहाने अपनी मिथ्या वफादारी या कृत्रिम प्रसन्नता के इजहार की ही प्रधानता है।

खुशी का संबंध दिल और दिमाग से होता है। जिसे खुशी होती है वह प्रफुल्लित और मुदित रहता भी है तथा औरों को खुश रखने का हरसंभव प्रयत्न भी करता है।  उसे किसी भी बाहरी आडम्बरों से अपने आपको प्रसन्न दर्शाने की कोशिश करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

प्रसन्नता, सुकून और उल्लास के पीछे शांति होनी चाहिए, मद्धिम स्वर लहरियां होनी चाहिएं, हर प्राणी को इससे सुकून मिलना चाहिए, तभी सच्चे अर्थों में हम खुशी को साकार कर सकते हैं।  लेकिन आतिशबाजी के साथ ऎसा नहीं होता।

बहुधा हम अपने दिल और दिमाग को सुकून पहुंचाने के लिए तरह-तरह की आतिशबाजी करते हैं लेकिन हम यह नहीं सोचते कि इससे केवल हमें ही सुकून मिल रहा है। बच्चे-बूढ़े और आस-पास रहने वाले सभी प्रकार के दूसरे लोगों को यह पसंद नहीं होता। इसके साथ ही इनके अंग-उपांगों के लिए भी खतरनाक है। 

यही नहीं तो हम केवल और केवल अपनी विध्वंसात्मक मनोवृत्ति, उन्मादी व्यववहार और मानसिक विकारों को परितृप्त करने के लिए अलग-अलग आवाजों भरे धमाकों वाले पटाखे छोड़ते रहते हैं। और तो और हमारे द्वारा चलाए जाने वाले पटाखों से पशु-पक्षियों तक भयग्रस्त होकर इधर-उधर भागने लगते हैं, परिन्दों के लिए तो दीवाली के दिनों में बस्तियों में रह पाना तक संकटमय हो जाता है।

और बात दीपावली के दिनों की ही क्यों करें, शादी-ब्याह, किसी न किसी प्रकार के खुशी के मौके आदि पर भी यही सब होता है।  उत्सव, त्योहारों, पर्वों और आयोजनों की खुशी तब है जब इसमें आस-पास रहने वाले सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक शामिल हों न कि अपने कारण औरों को दुःख और पीड़ाओं का अनुभव हो तथा दूर भागने को विवश हो जाएं। जैसा कि आजकल हो रहा है।

फिर पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा संकट हैं ये पटाखे। गोला-बारूद की  अजीब सी गंध के भभकों से वायु प्रदूषण और धमाकों से ध्वनि प्रदूषण घातक स्तर पर पहुंच जाता है। यों भी अब लोग कमजोर दिल और कच्चे दिमाग वाले होते जा रहे हैं, अंग-प्रत्यंग सब कुछ कमजोरी के शिकार हैं। इस स्थिति में हमारी आतिशबाजी किसी के जीवन के लिए संकट पैदा कर सकती है।

यह सब केवल हमारी विध्वंस भरी सोच का परिणाम है। हम सभी के लिए यह शर्मनाक और निन्दनीय है लेकिन हम ही लोग इन कर्मों में जुटे हुए समाज और देश के लिए घातक नासूर बनते जा रहे हैंं। हममें से आधे से अधिक लोग केवल इसलिए पटाखे फोड़ते हैं ताकि दूसरों की नकल कर सकें और अपने आपको आधुनिक या खुशी प्रदाता के रूप में स्थापित कर सकें।

आतिशबाजी अपने आप में भीषण संहार का प्रतीक है, नकारात्मकता देती है और इसके धमाके ब्रह्माण्ड से लेकर प्रत्येक पिण्ड तक अशांति के भण्डारों में अभिवृद्धि करते रहते हैं। आतिशबाजी से आगजनी, शारीरिक क्षति और धन क्षय तो अपने आपमें बड़े मुद्दे हैं ही।

किसी भी दृष्टि से आतिशबाजी को उचित नहीं ठहराया जा सकता। हर हिसाब से यह सभी के लिए घातक है। पहले से ही वायु और ध्वनि प्रदूषण के मारे हम परेशान हैं, जाने कितनी बीमारियों को भुगत रहे हैं। ऊपर से पिशाचवृत्ति और नकारात्मक भावनाओं वाले लोग आतिशबाजी के माध्यम से सभी प्रकार का प्रदूषण फैला रहे हैं, शांति भंग कर रहे हैं, समाज की फिजूलखर्ची को बढ़ा रहे हैं।

रावण पर विजय पाने के बाद अयोध्या आने पर किसी भी तरह की आतिशबाजी नहीं हुई थी, न राम के विवाह के वक्त आतिशबाजी हुई थी, न कृष्ण विवाह के समय। उस समय शुद्ध गौघृत से यज्ञ-यागादि जरूर हुए थे जिससे वातावरण की शुद्धि के साथ ही देवी-देवताओं की तृप्ति ने उन्हें प्रसन्नता का वरदान दिया।

आज हम जो कुछ कर रहे है। उससे असुरों की तृप्ति हो रही है। यही कारण है कि जिस पैमाने पर खुशी की छद्म प्रतीक आतिशबाजी का जोर बढ़ रहा है, उसी के अनुरूप इंसान, घर-परिवार, समाज, क्षेत्र, अंचल और देश-विदेश तक में अशांति, धमाकावृत्ति, आसुरी भाव, अशांति, उन्माद, उद्विग्नता और असंतोष बढ़ता जा रहा है।

देवी-देवता और सुकून देने वाली सारी शक्तियां हमसे मुँह फिराये बैठी हैं। हमें समझना होगा कि आतिशबाजी से जीवन अभिशप्त होता है, परिवेश प्रदूषित होता है और लड़ाई-झगड़ों वाली विध्वसं भरी मानसिकता अपने पाँव पसारती जा रही है।

आतिशबाजी को अपनाने वालों की जिन्दगी कालजयी श्रेयवान होने की बजाय चार दिनों की चाँदनी जैसी ही होती है। आतिशबाजी पसंद लोगों का पूरा जीवन अभिशप्त होता है। ऎसे लोग शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की बीमारियों से ग्रसित रहा करते हैं। आतिशबाजी से बचें और त्योहारों का परंपरागत रीतियों से आनंद पाएं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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