रविवार, 29 नवंबर 2015

अनुज कटारा की कविता - ना वो चंद्रमुखी

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ना वो चंद्रमुखी

ना वो है परियों की कोई कहानी

है अगर कुछ तो,

लफ़्ज है वो मेरे गीतों के

दबे हुए जज्बात है मेरे

कहीं गुम हो रही साँस है वो मेरी

मेरे कोरे कागज की कल्पना है वो

मेरी मुस्कान की वजह तो नहीं पर जीने की आस है वो ।

 

तुम पूछते हो कोन लगती है वो मेरी...?

मुझे आनंदित करने वाली सूरज की किरण है वो

मेरे धड़कते दिल की धड़कन है वो

ख़्यालो में दस्तक देने वाली एक ख्याब है वो

कोई नशा तो नहीं मेरा पर बनती हुई लत है वो मेरी ।।

 

वो पगली किसी और को चाहती है

पर मेरी कभी तो होगी , क्योंकि मेरे जीने की उम्मीद है वो

दर्द भरे नगमों का संगीत है वो

स्वंय को जीवित रखने के लिये प्रेरित करने वाले जज्बात है वो

प्रश्न तो नहीं मेरा , पर हर प्रश्न का उत्तर है वो...

 

कवि परिचय-अनुज कटारा, व्यवसाय:छात्र(राजकीय अभियांत्रिकी कॉलेज)
वर्तमान पता: H.N. 548/12 महुकलां,गंगापुर सिटी,सवाई माधोपुर,राजस्थान
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